गिरीश कर्नाड का प्रसिद्ध नाटक तुगलक

अवधि : 
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मुहम्मद तुग़लक चारित्रिक विरोधाभास में जीने वाला एक ऐसा बादशाह था जिसे इतिहासकारों ने उसकी सनकों के लिए खब़्ती करार दिया। जिसने अपनी सनक के कारण राजधानी बदली और ताँबे के सिक्के का मूल्य चाँदी के सिक्के के बराबर कर दिया। लेकिन अपने चारों ओर कट्टर मज़हबी दीवारों से घिरा तुग़लक कुछ और भी था। उसमे मज़हब से परे इंसान की तलाश थी। हिंदू और मुसलमान दोनों उसकी नजर में एक थे। तत्कालीन मानसिकता ने तुग़लक की इस मान्यता को अस्वीकार कर दिया और यही ‘अस्वीकार’ तुग़लक के सिर पर सनकों का भूत बनकर सवार हो गया था।

नाटक का कथानक मात्र तुग़लक के गुण-दोषों तक ही सीमित नहीं है। इसमें उस समय की परिस्थितियों और तज्जनित भावनाओं को भी व्यक्त किया गया है, जिनके कारण उस समय के आदमी का चिंतन बौना हो गया था और मज़हब तथा सियासत के टकराव में हरेक केवल अपना उल्लू सीधा करना चाहता है।

नाटककार गिरीश कर्नाड ने  मुहम्‍मद तुगलक के जीवन पर आधारित इस नाटक को मूलत: कन्‍नड़ में लिखा था, बाद में वह भारत की तमाम भाषाओं में अनूदित हुआ। वह पाठ्यक्रमों में भी पढ़ाया जाता है। यहॉं दिल्‍ली के आचार्य नरेन्‍द्र देव महाविद्यालय में किए गए उसके मंचन का वीडियो उपलब्‍ध है।

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