शिक्षक विकास

रमाकान्त अग्निहोत्री

23 से 25 मई, 2017 तक दिल्‍ली के अम्‍बेडकर विश्‍वविद्यालय दिल्‍ली में ‘स्कूली शिक्षा के बदलते परिदृश्य में अध्यापन-कर्म की रूपरेखा’ विषय पर एक तीन दिवसीय संगोष्‍ठी का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्‍न हुआ। शैक्षिक विषयों पर हिन्‍दी में वार्षिक संगोष्‍ठी शृंखला ‘शिक्षा के सरोकार’ के तहत यह पहला आयोजन अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय, बेंगलूरु तथा अम्‍बेडकर विश्‍वविद्यालय दिल्‍ली ने संयुक्‍त रूप से किया।

संगोष्‍ठी की पृष्‍ठभूमि

पिछले कुछ समय से विभिन्न प्रशिक्षणों व कार्यशालाओं में सतत् एवम् व्यापक मूल्यांकन की अवधारणा पर चर्चा होती रही है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या-2005 की संस्तुतियों से इस विचार को बल मिला है। सामान्यतः हम सभी मूल्यांकन प्रक्रिया को प्राप्त दिशा-निर्देशों के अनुसार सम्पन्न करते रहते हैं लेकिन मूल्यांकन व शिक्षण हेतु बार-बार पुनः सोचने समझने की आवश्यकता है। पूर्व में शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में समझा जाता था कि शिक्षक सर्वज्ञाता है, शिक्षक एक ज्ञान से भरा बर्तन है और विद्यार्थी एक खाली बर्तन है या कोरी स्लेट है जिसे शिक्षक को अप

कुछ अवलोकन एवं चुनौतियाँ

सड़क पर रहने वाले बच्‍चों का भी जीवन होता है। वे काम तो करते ही हैं, पर साथ में खेलते भी हैं और पढ़ते भी हैं। इतना ही नहीं वे अपनी बात कहने तथा उसे औरों तक पहुँचाने के लिए अखबार भी निकालते हैं। दिल्‍ली की सड़कों पर रहने वाले बच्‍चों का अखबार है 'बालकनामना'। इसमें ऐसी कई बातें होंगी जो शायद आपको भी अपने विद्यार्थियों को समझने में मदद करेंगी। 

 

उत्तराखण्ड  में  सतत  एवं  व्यापक  मूल्यांकन का पायलट कार्यक्रम 44 विद्यालयों के साथ लगभग ढाई साल तक चला। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के उद्देश्य के रूप में जिन मुख्य बातों का सबसे ज्‍यादा ख्याल रखा गया वो थीं:

महमूद खान

पृष्ठ

13038 registered users
5587 resources