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लर्निंग कर्व हिन्दी अंक 1 दिसम्बर,2009 : विज्ञान शिक्षा पर केन्द्रित अंक

व्यापक मुद्दे
एनसीएफ के तरीके से विज्ञान सीखना * इन्दु प्रसाद
ज्वलंत प्रश्न और उनमें छिपी ज्ञान की लौ * कृष्णन बाल सुब्रह्मणयम
वैज्ञानिक सोच का विकास * दिलीप रांजेकर

समय एक ऐसी अवधारणा है जो मानव द्वारा प्रतिदिन इस्‍तेमाल की जाती है और सम्‍भवत: जानवरों व पौधों के जीवन में भी सहज रूप से इसका इस्‍तेमाल होता है। मुर्गे को पता होता है कि उसे बाँग कब देनी है। फूलों को पता होता है कि उन्‍हें कब अपनी पंखुडि़याँ खोलनी हैं। पेड़ों को पता होता है कब अपने पत्‍ते झड़ाने हैं।

बहुत से बच्‍चों के लिए इबारती सवाल किसी अवरोध की तरह होते हैं। इनमें वे बच्चे भी शामिल हैं जो संक्रियात्‍मक (संक्रियाओं का इस्‍तेमाल कर गणना करना) और प्रक्रियात्‍मक कौशलों में निपुण होते हैं। कई बच्‍चे संकेत शब्‍दों जैसे कुल मिलाकर, अन्‍तर, जोड़ इत्‍यादि की तलाश के आधार पर इबारती सवालों को हल करने का तरीका विकसित कर लेते हैं। लेकिन इस तरीके का महत्‍व बहुत ही सीमित होता है। ऐसे बच्‍चे सवाल हल करने के लिए कौन-सी संक्रिया इस्‍तेमाल करनी है यह जानने के लिए आमतौर पर अनुमान का सहारा लेते हैं। इबारती सवालों से सामना होने पर ऐसे बच्‍चे गणि

क्षेत्रफल और परिमाप मापन के वो रूप हैं जो आमतौर पर रोजमर्रा की कई गतिविधियों में इस्‍तेमाल होते हैं। विशेष तौर पर क्षेत्रफल बहुत ही सहज तरीके से हमारे रोजमर्रा के कार्यों में शामिल होता है। जैसे कि किसी बरतन को ढँकने के लिए किसी प्‍लेट का चयन करते समय, किसी मेज विशेष के लिए इस्‍तेमाल होने वाले मेजपोश के रूप में, एक किताब पर कवर लगाने के लिए कागज की किसी शीट के रूप में आदि। विशिष्‍ट शब्‍दों को जाने बिना भी बच्चे आमतौर पर ऐसे निर्णय लेते हैं जिनमें क्षेत्रफल की समझ सहज रूप से निहित होती है। ऐसे में एक सवाल स्‍वाभाविक रूप से उठता है कि हम किसी भी जगह की सटीक माप क

हम तेजी से बढ़ती हुई एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी दिशाओं से बड़ी संख्‍याओं की बमबारी हो रही हो। वैश्‍वीकरण और ज्ञान के विस्‍फोट का धन्‍यवाद, जिसकी वजह से नियमित रूप से हमारा सामना बहुत बड़ी-बड़ी संख्‍याओं से होता है। फिर भी, यहाँ एक प्रासंगिक सवाल यह उठता है कि ‘क्‍या इन संख्‍याओं से होता सामना इन संख्‍याओं के आकार की समझ बनाने का कारण बनता है?’ या फिर यह सम्‍भव है कि इन संख्‍याओं के निरन्‍तर उपयोग के कारण हम इनके आकार को कुछ कम करके आँकते हैं।  क्‍या इन संख्‍याओं से अत्‍याधिक परिचय सही दृष्टिकोण विकसित करने में बाधक है?

यह बात अच्छी हो या बुरी, मानव समाजों में स्कूली व्यवस्थाएँ अब स्थापित हो चुकी हैं। घर में ही स्कूलिंग को छोड़ दें तो स्कूल चाहे मुख्य धारा का हो या वैकल्पिक, बच्चे घर और माता-पिता से दूर वयस्कों के एक और समूह के पास जाते हैं, जिन्हें शिक्षक कहते हैं और यहाँ वे एक ऐसी गतिविधि के लिए जाते हैं जिसे हम शिक्षा कहते हैं। स्कूलों में शिक्षा कमोबेश स्पष्ट लक्ष्यों के साथ की जाने वाली गतिविधि है। स्कूलों ने ज्ञानार्जन के इस प्रोजेक्ट के एक बड़े हिस्से को (व्यावसायिक तथा आर्थिक मायनों में) अपने व्यापार के तौर पर ले लिया है। स्कूल व्यक्तियों को भविष्य में किसी पेशे के लिए त

हर युग में शिक्षकों और शिक्षा में उनकी केन्द्रीय भूमिका को मान्यता मिली है। लेकिन समय के साथ शिक्षकों की सामाजिक स्थिति और उनकी भूमिका में जो परिवर्तन आया है उस पर भी सहज ही ध्यान चला जाता है। पहले शिक्षकों को एक निर्विवाद गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था, जो यह जानते थे कि क्या पढ़ाना है और कैसे पढ़ाना है; लेकिन यह स्थिति बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी है।i आज राज्य का आग्रह यह है कि शिक्षक की जवाबदेही के नाम पर शिक्षा में सार्वजनिक निवेश पर अधिकतम लाभ प्राप्त किया जाए जिसका इस्तेमाल शिक्षक की स्वायत्तता को धीरे-धीरे नष्ट करने के लिए किया गया है। राज्य ने शिक्षा की लागत

राजेश कुमार

बच्‍चे घरों में हैं। वे भी स्‍कूल नहीं जा पा रहे हैं। उन्‍हें घर पर रहकर ही पढ़ाई करनी है। तो पर्यावरण अध्‍ययन के लिए कक्षा 3 तथा 4 के विद्यार्थियों को ध्‍यान में रखकर यह वर्कशीट बनाई गई हैं।

इनका उपयोग बच्‍चों के साथ किया जा सकता है। यहाँ पाँच वर्कशीट हैं :

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