सभी शिक्षा बोर्ड

सत्रह हजार सत्रह सौ सत्रह को अंकों में कैसे लिख‍ेंगे ? पहले लिखकर देखिए। फिर निदेश सोनी के इस वीडियो में इस पहेली का हल भी मिलेगा। सामान्‍य सी लगने वाली यह पहेली, अपने में गहरी बात छिपाए हुए है।

हम सभी जानते हैं कि श्वसन सभी जीवों के लिए अतिआवश्यक प्रक्रिया है। जिसमें जीव गैसों का आदान-प्रदान करते हैं। प्राथमिक कक्षाओं में अधिकतर इसे सामान्य रूप से चर्चा करके और कुछ जानकारियों के रूप में बताकर छोड़ दिया जाता है। बच्चों को बता दिया जाता है कि मानव श्वसन के दौरान ऑक्‍सीजन लेते हैं और कार्बन डाई-ऑक्साइड छोड़ते हैं जबकि पौधे हमारे द्वारा छोड़ी गई कार्बन डाई-ऑक्साइड को ग्रहण करते हैं और ऑक्‍सीजन छोड़ते हैं। मैं भी बचपन में ऐसा बच्चा रहा हूँ, जिसे कक्षा में ज्यादा सवाल करने के मौके नहीं मिले थे। इसलिए हम गुरुजी की बात जैसी की तैसी मान लेते थे, चाहे वो इतिहास से जुड़ी हो या विज्ञान से। किन्तु जब से हमें सवाल करने के मौके मिले हैं तब से हर बात का कारण जानने के प्रति हमारी जागरूकता बढ़ी है। कक्षा में भी हम बच्चों को खूब सवाल पूछने और और उनका हल खोजने के प्रति प्रेरित करते रहते हैं। ठीक ऐसे ही स्वयं प्रयोग करके देखना भी बड़ी कक्षाओं में ही हो ऐसा जरूरी तो नहीं। पर्यावरण शिक्षक होने के नाते मैं अपनी हर कक्षा में बच्चों को स्वयं करके देखने का कोई मौका नहीं छोड़ता। और यदि वह प्रयोग उनके परिवेश और उपलब्ध संसाधनों से जुड़ा हुआ हो तो कहने ही क्या। कुछ ऐसा ही एक कक्षा कक्षीय अनुभव आपके साथ यहाँ साझा कर रहा हूँ।

घोंसला बनाने में, हम यूँ मशगूल हो गए !

उड़ने को पंख भी थे, ये भी भूल गए !!

अपनी बात की शुरुआत मैं कुछ बुनियादी बातों के साथ करना चाहूँगी। पहला, राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय चिणाखोली में मेरे अलावा दो अन्य शिक्षक हैं। गणित और विज्ञान शिक्षक के रूप में मेरी तैनाती की गई है, परन्तु इसके अतिरिक्त अन्य विषय जैसे भाषा आदि भी मुझे देखने पड़ते हैं। एक शिक्षक के रूप में इन विषयों की तैयारी एवं अध्यापन एक कठिन प्रक्रिया के रूप में दिखाई देता है। समेकित कक्षा शिक्षण इसके लिए उपयोगी हो सकता है। दूसरा, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 यह सुझाव देती है कि शिक्षक अध्यापन कार्य करते समय बच्चे के परिवेश का खूब इस्तेमाल करे ए

हर बार की तरह इस बार भी नया शिक्षा सत्र अप्रैल में शुरु हुआ। पर यह सत्र कुछ विशेष था। उत्तराखण्ड सरकार ने इसी साल से सभी शासकीय विद्यालयों में कक्षा एक  से  लेकर  आठवीं  तक एन.सी.ई.आर.टी.

यहाँ मुद्दा यह नहीं है कि बच्चे कैसे सीखते हैं ? मुद्दा यह है कि  “हम बच्चों को कैसे सिखाते हैं? क्योंकि जब हम शिक्षक इस मुद्दे पर शैक्षिक विद्वता दिखाने का एक पल भी कभी नहीं छोडते कि बच्चे कैसे सीखते हैं ? तो फिर हमारे लिए यह जानना और समझना भी उतना ही जरूरी हो जाता हैं कि हम बच्चों को कैसे सिखाते हैं ?

माया सभ्‍यता में किस प्रकार से संख्‍याओं को लिखा जाता था, और किन प्रतीकों का उपयोग किया जाता था। देखिये इस वीडियों में और हमारे साथ कुछ संख्‍याओं को लिखने के अभ्‍यास भी कीजिए।

विद्यालय की अवधारणा में बहुत सारी बातों, विचारों व प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है। अक्सर उन पर शिक्षक समाज में हर अवसर पर बात करने के अवसर भी निकाले जाते रहे हैं। विद्यालय की संरचना को और ठोस रूप देने या यूँ कहा जाए, कि विद्यालय के आदर्श स्वरूप को परिभाषित करने को हर शिक्षक तत्पर भी दिखाई देता है क्योंकि शिक्षक तभी शिक्षक है जब विद्यालय है। नहीं तो शिक्षक का अपना कोई स्वरूप समाज में बनता दिखाई नहीं देता। एक समय था जब शिक्षक का स्वरूप समाज में अलग तरह का था। विद्यालय के भौतिक स्वरूप व संसाधनों का इतना महत्व नहीं था

भोपाल में शिक्षकों का रचनात्‍मक मैत्री समूह 'शिक्षक सन्‍दर्भ समूह' नाम से कार्यरत है। इस समूह ने 104 विभिन्‍न शिक्षकों की शैक्षिक यात्रा तथा उनके शैक्षिक अनुभवों को एकत्र किया है। इन्‍हें एड एट एक्‍शन तथा अन्‍य संस्‍थाओं की मदद से एक किताब का रूप दिया गया है। इसका नाम है 'शिक्षकों की शैक्षिक यात्रा'।

किताब की पीडीएफ यहाँ उपलब्‍ध है

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