कक्षा 3 - 5

हिंदी प्रदेशो में संख्यावाचक शब्दों के उच्चारण और लेखन में एकरूपता का अभाव दिखाई देता है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित “ए बेसिक ग्रामर ऑफ मॉडर्न हिंदी” में भी इस एकरूपता का अभाव था। अतः निदेशालय में 5-6 फरवरी ,1980 को आयोजित भाषा विज्ञानियों की बैठक में इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने के बाद इनका जो मानक रूप स्वीकार हुआ, वह इस प्रकार है।

एक से सौ तक संख्यावाचक शब्दों का मानक रूप
एक, दो, तीन, चार, पाँच।
छह, सात, आठ, नौ, दस।।

ग्‍यारह, बारह, तेरह, चौदह, पन्द्रह।
सोलह, सत्रह, अठारह, उन्नीस, बीस।।

बच्‍चे घरों में हैं। वे भी स्‍कूल नहीं जा पा रहे हैं। उन्‍हें घर पर रहकर ही पढ़ाई करनी है। तो पर्यावरण अध्‍ययन के लिए कक्षा 3 तथा 4 के विद्यार्थियों को ध्‍यान में रखकर यह वर्कशीट बनाई गई हैं।

समय एक ऐसी अवधारणा है जो मानव द्वारा प्रतिदिन इस्‍तेमाल की जाती है और सम्‍भवत: जानवरों व पौधों के जीवन में भी सहज रूप से इसका इस्‍तेमाल होता है। मुर्गे को पता होता है कि उसे बाँग कब देनी है। फूलों को पता होता है कि उन्‍हें कब अपनी पंखुडि़याँ खोलनी हैं। पेड़ों को पता होता है कब अपने पत्‍ते झड़ाने हैं।

बहुत से बच्‍चों के लिए इबारती सवाल किसी अवरोध की तरह होते हैं। इनमें वे बच्चे भी शामिल हैं जो संक्रियात्‍मक (संक्रियाओं का इस्‍तेमाल कर गणना करना) और प्रक्रियात्‍मक कौशलों में निपुण होते हैं। कई बच्‍चे संकेत शब्‍दों जैसे कुल मिलाकर, अन्‍तर, जोड़ इत्‍यादि की तलाश के आधार पर इबारती सवालों को हल करने का तरीका विकसित कर लेते हैं। लेकिन इस तरीके का महत्‍व बहुत ही सीमित होता है। ऐसे बच्‍चे सवाल हल करने के लिए कौन-सी संक्रिया इस्‍तेमाल करनी है यह जानने के लिए आमतौर पर अनुमान का सहारा लेते हैं। इबारती सवालों से सामना होने पर ऐसे बच्‍चे गणि

क्षेत्रफल और परिमाप मापन के वो रूप हैं जो आमतौर पर रोजमर्रा की कई गतिविधियों में इस्‍तेमाल होते हैं। विशेष तौर पर क्षेत्रफल बहुत ही सहज तरीके से हमारे रोजमर्रा के कार्यों में शामिल होता है। जैसे कि किसी बरतन को ढँकने के लिए किसी प्‍लेट का चयन करते समय, किसी मेज विशेष के लिए इस्‍तेमाल होने वाले मेजपोश के रूप में, एक किताब पर कवर लगाने के लिए कागज की किसी शीट के रूप में आदि। विशिष्‍ट शब्‍दों को जाने बिना भी बच्चे आमतौर पर ऐसे निर्णय लेते हैं जिनमें क्षेत्रफल की समझ सहज रूप से निहित होती है। ऐसे में एक सवाल स्‍वाभाविक रूप से उठता है कि हम किसी भी जगह की सटीक माप क

हम तेजी से बढ़ती हुई एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी दिशाओं से बड़ी संख्‍याओं की बमबारी हो रही हो। वैश्‍वीकरण और ज्ञान के विस्‍फोट का धन्‍यवाद, जिसकी वजह से नियमित रूप से हमारा सामना बहुत बड़ी-बड़ी संख्‍याओं से होता है। फिर भी, यहाँ एक प्रासंगिक सवाल यह उठता है कि ‘क्‍या इन संख्‍याओं से होता सामना इन संख्‍याओं के आकार की समझ बनाने का कारण बनता है?’ या फिर यह सम्‍भव है कि इन संख्‍याओं के निरन्‍तर उपयोग के कारण हम इनके आकार को कुछ कम करके आँकते हैं।  क्‍या इन संख्‍याओं से अत्‍याधिक परिचय सही दृष्टिकोण विकसित करने में बाधक है?

यह बात अच्छी हो या बुरी, मानव समाजों में स्कूली व्यवस्थाएँ अब स्थापित हो चुकी हैं। घर में ही स्कूलिंग को छोड़ दें तो स्कूल चाहे मुख्य धारा का हो या वैकल्पिक, बच्चे घर और माता-पिता से दूर वयस्कों के एक और समूह के पास जाते हैं, जिन्हें शिक्षक कहते हैं और यहाँ वे एक ऐसी गतिविधि के लिए जाते हैं जिसे हम शिक्षा कहते हैं। स्कूलों में शिक्षा कमोबेश स्पष्ट लक्ष्यों के साथ की जाने वाली गतिविधि है। स्कूलों ने ज्ञानार्जन के इस प्रोजेक्ट के एक बड़े हिस्से को (व्यावसायिक तथा आर्थिक मायनों में) अपने व्यापार के तौर पर ले लिया है। स्कूल व्यक्तियों को भविष्य में किसी पेशे के लिए त

बच्‍चे घरों में हैं। वे भी स्‍कूल नहीं जा पा रहे हैं। उन्‍हें घर पर रहकर ही पढ़ाई करनी है। तो पर्यावरण अध्‍ययन के लिए कक्षा 3 तथा 4 के विद्यार्थियों को ध्‍यान में रखकर यह वर्कशीट बनाई गई हैं।

इनका उपयोग बच्‍चों के साथ किया जा सकता है। यहाँ पाँच वर्कशीट हैं :

आनन्‍द निकेतन स्कूल एक ऐसा स्कूल है जहाँ सभी को सोचने-विचारने और तर्क करने की आजादी है। यह आजादी क्लासरूम से लेकर प्लानिंग बोर्ड तक और किचन से लेकर झूले तक दिखाई और सुनाई पड़ती है। ऐसी ही एक गणितीय आजादी का जिक्र में अपने इस लेख में करने वाला हूँ। इस लेख का नाम दायाँ और बायाँ क्यों है वो आप इस लेख को पढ़ते हुए समझ पाएँगे।
कक्षा 4 की गणित की कक्षा में सभी बच्चे तीन अंकों के गुणा के सवाल को हल करने में लगे हैं। सभी बच्चे अपने सवालों को जैसा उन्होंने हल किया वैसा ही ब्लैक बोर्ड पर समझाते हैं।

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