सामाजिक अध्‍ययन

बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए यूनीसेफ ने मीना नामक एक चरित्र की रचना की है।
स्‍कूलों में मीना मंच बनाए गए हैं। मीना को केन्‍द्रीय पात्र के रूप में रखकर विभिन्‍न चित्रकथाएं रची गई हैं। वीडियो भी बनाए गए हैं। ये सब बहुत लोकप्रिय हुए हैं।

ऐसा ही एक उपयोगी वीडियो यहॉं प्रस्‍तुत है। सहज और सरल कहानी के माध्‍यम से यह बताने की कोशिश है कि लड़कियों को पढ़ना चाहिए, चाहे वे अपने घर में हों या कहीं और।

उच्‍च प्राथमिक कक्षाओं में सामाजिक अध्‍ययन के शिक्षण में  विद्यार्थियों को जोडि़यों में बिठाकर बेहतर परिणाम प्राप्‍त किए जा सकते हैं।

आप भी आजमाकर देखें।

मध्‍यप्रदेश में कार्यरत शैक्षिक संस्‍था 'एकलव्‍य' 1985 से बच्‍चों के लिए मासिक 'चकमक' बाल विज्ञान पत्रिका का प्रकाशन कर रही है। पत्रिका के हर अंक में  'मेरा पन्‍ना' स्‍तम्‍भ में बच्‍चों की लिखी हुई कहानी,कविताएं और उनके बनाए चित्र भी विशेषतौर पर प्रकाशित किए जाते हैं। बच्‍चों की यह अभिव्‍यक्ति न केवल बच्‍चों की सोच के बारे में बहुत कुछ कहती है, वरन वयस्‍कों को बच्‍चों को समझने का एक मौका देती है। शिक्षक अगर चाहें तो बच्‍चों की इन अभिव्‍यक्तियों की मदद से वे उनके बारे में ज्‍यादा जान सकते हैं,उन्‍हें समझ सकते हैं।  वे चाहें तो उनकी अभिव्‍यक्तियों के माध्‍यम से शिक्षण कर सकते हैं।

नक्‍शे काफी दिलकश होते हैं! किसी नक्‍शे को अपने हाथ में लेना पूरी दुनिया को अपने हाथों में लेने जैसा है। सोचो खुद किसी चीज का नक्‍शा तैयार करना कितना दिलचस्‍प होता होगा ना! यहाँ दी गई गतिविधि विद्यार्थियों को अपने स्‍कूल को बेहतर तरीके से देखने के लिए प्रेरित करेगी और अपनी पाठ्यपुस्तकों से उन्‍होंने नक्‍शे के बारे में जो कुछ भी सीखा है उसे इस्‍तेमाल करने में उनकी मदद करेगी।

खेल बच्‍चों के पढ़ने-लिखने, गिनने व भाषा कौशल को विकसित करने के बहुत बढि़या तरीके हैं। ये समन्‍वयन कौशल को बढ़ाने, समीक्षात्‍मक सोच और समस्‍या को हल करने के कौशल को पुख्‍ता करने में भी मदद करते हैं और बच्‍चों को हार-जीत, बारी-बारी से खेलने व समूह में काम करने के बारे में सिखाते हैं। यहाँ कक्षा में खेले जा सकने वाले कुछ ऐसे खेल दिए गए हैं जिनके जरिए आप विद्यार्थियों को कक्षा में सक्रिय रूप से भागीदारी करने में मदद कर सकते हैं।

शोभन सिंह नेगी

हम उत्तरकाशी जिले में दिशा कार्यक्रम के तहत शैक्षणिक प्रक्रियाओं को समझने के उद्देश्य से एक विद्यालय में पहुँचे थे। वहाँ पता चला कि विद्यालय के मुख्य अध्यापक अनुपस्थित हैं। हमने निर्णय लिया जैसी भी परिस्थिति बनेगी, योजना में बदलाव कर लेंगे। इतना तो तय था कि हम सामाजिक अध्ययन विषय में बच्चों की समझ को जानने की कोशिश करेंगे।

शिक्षा की बुनियाद अंक 11-12 अप्रैल, 2015 में

उत्‍पादक काम,भाषा और ज्ञान * अनिल सद्गोपाल

बचपन,काम और स्‍कूलिंग : एक चिंतन * डी. वसंता

बदलते समाज में शिक्षा * अमन मदान

शिक्षा : कितना सर्जन, कितना विसर्जन * अनुपम मिश्र

अनुराग मुद्गल यहाँ जो वृतान्‍त प्रस्तुत किया जा रहा है वह महीने भर के अन्‍तराल पर हुई दो चर्चाओं से उभरा है। करीब एक महीने पहले रमाकान्‍त जी और मैं सामूहिक रूप से बच्चों के साथ कक्षा चर्चा में शामिल होते थे। एक दिन रमाकान्‍त जी जब बच्चों के साथ चर्चा कर रहे थे तो कुछ समय बाद मैं भी उस चर्चा का हिस्सा बन गया। शुरू में उस चर्चा को कराने का औचित्य मुझे समझ नहीं आया परन्तु बच्‍चों के एक के बाद एक तर्कों ने मुझे उसकी अहमियत और गर्

योजनाबद्ध भ्रमण ज्ञानार्जन की एक सार्थक प्रक्रिया को जन्म दे सकता है।

रघुवेन्‍द्र सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को जितना सहज एवं सरल समझा जाता है वास्तव में यह उतनी सरल नहीं है। सही मायने में यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। मेरे पास दो कक्षाओं कक्षा 3 व कक्षा 4 के कुल 50 विद्यार्थियों को शिक्षण कार्य का उत्तरदायित्व होने के कारण शिक्षण कार्य मेरे लिए बहुत बोझिल व चुनौतीपूर्ण हो रहा था।

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