सामाजिक अध्‍ययन

कई बार हमारी कुछ धारणाऍं ऐसे ही बन जाती हैं। लेकिन जब टूटती हैं, तो पता चलता है कि उनके बनने के पीछे कितने अधकचरे तथ्‍य थे। यह छोटी सी फिल्‍म इस बात को बहुत अच्‍छे से रेखांकित करती है। फिल्‍म शिक्षकों और बच्‍चों दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। जरूर देखनी चाहिए।

 

8 अगस्‍त,1942 को महात्‍मा गाँधी ने मुम्‍बई में अँग्रेजों से कहा था भारत छोड़ो। जिसे भारत छोड़ो आन्‍दोलन नाम दिया गया था। इस साल इस आन्‍दोलन की पचहत्‍तरवीं वर्षगाँठ मनाई जा रही है। राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद द्वारा विद्यार्थियों को इस आन्‍दोलन से परिचित कराने के लिए एक ऑडियो बनाया गया है।

यह उच्‍च प्राथमिक कक्षाओं में बच्‍चों को सुनाया जा सकता है।

हर बरस 31 जुलाई को कथा सम्राट प्रेमचन्‍द का जन्‍मदिन होता है। प्रेमचन्‍द ऐसे कथाकार रहे हैं, जिनकी कहानियॉं प्राथमिक कक्षाओं से लेकर महाविद्यालय तक विभिन्‍न कक्षाआें में पढ़ाई जाती हैं। ईदगाह,पंच परमेश्‍वर,कफन,पूस की रात, नमक का दरोगा, बड़े भाई साहब आदि ऐसी ही कहानियाँ हैं।

'बूढ़ी काकी' भी उनकी ऐसी ही एक कहानी है। काकी जिसने अपनी सारी जायजाद अपने देवर के बेटे के नाम कर दी है। लेकिन वे अब उसका ध्‍यान नहीं रखते हैं। ठीक से खाने को भी नहीं देते। ऐसे में घर की एक बच्‍ची काकी का ध्‍यान रखती है।  

एक छोटी लड़की की कहानी, जिसकी मॉं किसी रेस्‍टोरेंट में वेटर का काम करती है और पैसे जमा करती है कि एक दिन एक आराम कुर्सी खरीदी जाएगी। आगे क्‍या होता है, यह जानने के लिए वेरा बी.विलिअम्‍स की यह किताब पढ़नी होगी।

शिक्षा का माध्यम मातृभाषा क्यों न हो ?

By अमरजीत सिंह | जुलाई 18, 2017

हमारे देश में विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा को बनाया हुआ है ! और अब यह प्रवृति प्राथमिक शिक्षा और माध्यमिक शिक्षा में बढती जा रही है ! क्या इससे शिक्षा का स्तर ऊँचा होता है या और भी खराब होता है ?
शिक्षकों के अनुभव इस विषय पर क्या हैं ?

तेजी सी बदलती दुनिया में बच्‍चों से सामाजिक मुद्दों,रीतियों, कुरीतियों, समस्‍याओं और दुविधाओं पर चर्चा करना उतना ही आवश्‍यक है जितना उन्‍हें पाठ्यपुस्‍तक पढ़ाना। लेकिन कई बार कक्षा में इन बातों की चर्चा करना हमें मुश्किल लगता है। संभव है हम बच्‍चों से सीधे-सीधे इन मुद्दों पर चर्चा न कर पाऍं। ऐसे में किसी अन्‍य माध्‍यम का सहारा लिया जा सकता है। फिल्‍म भी ऐसा ही एक माध्‍यम है।  जरूरत केवल इस बात की है कि हम अपना दिमाग खुला रखें।

पूरी फिल्‍म भी हो सकती है, उसका कोई हिस्‍सा भी या फिर कोई गीत भर।

बच्चों का लिंग निर्धारण कैसे होता है ।

By Ishwargurjar968... | मई 20, 2017

जन्म के दौरन शिशु का अपने लड़का या लड़की होने का बोध नही होता लेकिन धिरे- धिरे उस पता चलता है की उसे समाज किस नजरिएँ से देखता है । शैशवास्था के शिशु को अपने जेण्डर से सम्बन्धी कोई जानकारी नही होती है । समाज में ये काम सब से पहले परिवार के लोग करते है । जैसे की हम शुरू से ही लडके व लडकी के लिए खेलने - कूदने और ओढने पहनने के मापदंड तय कर देते है । यहाँ तक की उन्हें दिए जाने वाले खिलौनों मे भी इसकी झलक मिलती है । हम लडके को बंदूक, ट्रक या गाडी जैसे खिलौने देते है तथा उसे बोध कराते है की वो बहादूर है और उसे चुनौता भरे काम करने है । वही हम लडकी को गुडियाँ , तथा बर्तन जैसे खिलौने देते है और उसे

सड़क पर रहने वाले बच्‍चों का भी जीवन होता है। वे काम तो करते ही हैं, पर साथ में खेलते भी हैं और पढ़ते भी हैं। इतना ही नहीं वे अपनी बात कहने तथा उसे औरों तक पहुँचाने के लिए अखबार भी निकालते हैं। दिल्‍ली की सड़कों पर रहने वाले बच्‍चों का अखबार है 'बालकनामना'। इसमें ऐसी कई बातें होंगी जो शायद आपको भी अपने विद्यार्थियों को समझने में मदद करेंगी। 

 

भौगोलिक दृष्टि से शिक्षित एक व्‍यक्ति में स्‍थान के सन्‍दर्भ में प्रमुख प्राकृतिक व मानव निर्मित वस्‍तुओं के संघटन को देखने की और मानव जीवन के सम्‍बन्‍ध में इनके महत्‍व व निहितार्थ को समझने की क्षमता होती है। उनमें इनसे उत्‍पन्‍न होने वाली जटिलताओं को समझने की भी क्षमता होती है। ‘भूगोल का प्रभाव व महत्‍व’ न केवल उन्‍हें वर्तमान घटनाओं की जटिलता को समझने में मदद करता है बल्कि दीर्घकालिक साधनों व तरीकों के माध्‍यम से ‘भौगोलिक दृष्टि से उपयुक्‍त’ भविष्‍य की योजना बनाने में भी मददगार होगा।

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