सामाजिक अध्‍ययन

 

मुहम्मद तुग़लक चारित्रिक विरोधाभास में जीने वाला एक ऐसा बादशाह था जिसे इतिहासकारों ने उसकी सनकों के लिए खब़्ती करार दिया। जिसने अपनी सनक के कारण राजधानी बदली और ताँबे के सिक्के का मूल्य चाँदी के सिक्के के बराबर कर दिया। लेकिन अपने चारों ओर कट्टर मज़हबी दीवारों से घिरा तुग़लक कुछ और भी था। उसमे मज़हब से परे इंसान की तलाश थी। हिंदू और मुसलमान दोनों उसकी नजर में एक थे। तत्कालीन मानसिकता ने तुग़लक की इस मान्यता को अस्वीकार कर दिया और यही ‘अस्वीकार’ तुग़लक के सिर पर सनकों का भूत बनकर सवार हो गया था।

रायपुर, छत्‍तीसगढ़ में अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन एवं पंडित रविशंकर शुक्‍ल विश्‍वविद्यालय द्वारा संयुक्‍त रूप से आयोजित कार्यक्रम में हिन्‍दी के प्राध्‍यापक पुरुषोत्‍तम अग्रवाल ने 'आधुनिक भारत-एक विचार' पर व्‍याख्‍यान दिया। उसे यहाँ सुना जा सकता है।

बात कुछ पुरानी है। कुछ दिनों से कक्षा में रोजाना 7-8 बच्चे अनुपस्थित रह रहे थे। ऐसा कभी-कभी ही होता था जब कक्षा में इतनी कम उपस्थिति रहती हो। मैंने बच्चों से जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि आजकल शादियों का सीजन चल रहा है, शायद बच्चे शादियों में गए होंगे। एक बच्चा पिछले तीन दिनों से अनुपस्थित था तो मैंने उसके बारे में पूछा कि ये इतने दिनों से स्कूल क्यों नहीं आ रहा है ? एक बच्चा बोला कि उसके बड़े भाई की शादी है आज। मैंने अनुपस्थित बच्चे के Best Friend से मजाक के लहजे में कहा कि, “आज तो माल-मिठाइयों में हाथ रहेगा तेरा।”

भोजन और हम

अंजना त्रिवेदी

बच्‍चों को गाँधी जी के बारे में बताने का एक तरीका तो पाठ्यपुस्‍तक का है। जो बेहद ऊबाउ हो सकता है। दूसरा तरीका है कि कुछ राेचक और अलग ढंग से बताया जाए। यह वीडियो एक ऐसे ही तरीके के बारे में बता रहा है।

अमेरिका के भूतपूर्व राष्‍ट्रपति अब्राहम लिंकन के पुत्र ने जब स्‍कूल जाना शुरू किया तो उन्‍हाेंने शिक्षक के नाम एक पत्र लिखा। यह पत्र पिछले कई दशकाें से चर्चा में रहा है। शिक्षक दिवस पर इसे सुना और गुना जाना चाहिए।

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