विज्ञान एवं तकनॉलॉजी

विज्ञान के दो घटक होते हैं - एक ज्ञान का संगठन (विषय वस्तु), और दूसरा, वह प्रक्रिया जिसके द्वारा उस ज्ञान का उत्पादन किया जाता है। विज्ञान के इस दूसरे घटक ‘वैज्ञानिक प्रक्रिया’ से हमें सोचने और दुनिया के बारे में जानने के एक तरीके की समझ मिलती है। लेकिन आमतौर पर, हम केवल विज्ञान का ‘ज्ञान का संगठन’ घटक देखते हैं। वैज्ञानिक अवधारणाएँ हमारे सामने एक कथन के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं जैसे - पृथ्वी गोल है, इलेक्ट्रॉनों पर ऋणात्मक आवेश पाया जाता है, हमारे आनुवंशिक कोड हमारे डीएनए में निहित हैं, ब्रह्माण्ड 13.7 अरब साल पुराना है। लेकिन

5 से 7 वर्ष की उम्र के बच्‍चों के लिए समय का शिक्षण : एक ऐसी अवधारणा है जो मानव द्वारा प्रतिदिन इस्‍तेमाल की जाती है और सम्‍भवत: जानवरों व पौधों के जीवन में भी सहज रूप से इसका इस्‍तेमाल होता है। मुर्गे को पता होता है कि उसे बाँग कब देनी है। फूलों को पता होता है कि उन्‍हें कब अपनी पंखुडि़याँ खोलनी हैं। पेड़ों को पता होता है कब अपने पत्‍ते झड़ाने हैं।

स्‍कूल आने से ठीक पहले एक महत्‍वपूर्ण घटक के रूप में समय की अवधारणा से बच्‍चों का सामना होता है।

6 अगस्‍त,1945 दुनिया में एक तबाही के लिए जाना जाता है। तबाही जिसने जापान के हिरोशिमा नगर को परमाणु बम की आग में जलाकर भस्‍म कर दिया था। यह वीडियो उसी भयावह त्रासदी से रूबरू कराता है।

मैं जयपुर के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, नृसिंहपुरा महल में पिछले कुछ दिनों से जा रही थी। वहाँ बच्चों के साथ विज्ञान में कुछ काम करने का प्रयास कर रही थी। विज्ञान विषय का अध्ययन करते समय हम बच्चों में कुछ क्षमताओं के बारे में बात करते हैं- जैसे अवलोकन, दर्ज करना, वर्गीकरण, व्याख्या करना, प्रयोग करना, निष्कर्ष निकालना आदि। इसी को आधार बनाते हुए मैंने बच्चों के साथ एक खेल खेलने का विचार किया। मैंने अपने थैले में नाना प्रकार की चीजों को एकत्रित कर लिया। इनमें पेंसिलें, पेन, रबर, कागज, एल्युमिनियम फोइल, कटोरी, चाबी, पत्ते, फ़ूल, लकड़ी

"जुगनू क्यों चमकता है , किया उसके पास छोटी सी टोर्च होती है? या आग? जुगनू के अंडे और बच्चे भी किया इसी तरह चमकते हैं? किया अगर हम जुगनू को छूएंगे तो हाथ जल जाएंगे?" 

25 जुलाई,2017 को जाने-माने वैज्ञानिक प्रोफेसर यश्‍ापाल का निधन हो गया । उसके एक दिन पहले एक अन्‍य वैज्ञानिक प्रोफेसर यू.आर.राव का भी निधन हो गया था। प्रोफेसर यशपाल शिक्षाविद के रूप में खासे पहचाने जाते हैं। 'बस्‍ते का बोझ-कम कैसे हो' पर उनकी अध्‍यक्षता में बनी समिति ने महत्‍वपूर्ण सिफारिशें की थीं। 'राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा -2005' की संचालन समिति के भी वे अध्‍यक्ष थे।

जाने-माने वैज्ञानिक और शिक्षाविद प्रोफेसर यशपाल का 24 जुलाई,2017 को नब्‍बे साल की आयु में निधन हो गया। वे अपने तमाम अन्‍य कामों के अलावा स्‍कूलों में बच्‍चों के बस्‍ते के बोझ पर बनी कमेटी की अध्‍यक्षता करने के लिए जाने जाते हैं।

मध्‍यप्रदेश में 'होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम' के नाम से माध्‍यमिक विद्यालयों में विज्ञान शिक्षण का एक नवाचारी कार्यक्रम 30 साल तक लगभग 1000 विद्यालयों में सफलता पूर्वक चला। इस कार्यक्रम में बच्‍चों तथा शिक्षकों के जिज्ञासापूर्ण सवालों के जवाब देने के लिए एक चरित्र की कल्‍पना की गई थी। इसका नाम था सवालीराम । माध्‍यमिक शाला की विज्ञान की पाठ्यपुस्‍तक 'बालवैज्ञानिक' के पहले पन्‍ने पर सवालीराम की ओर से एक पत्र बच्‍चों के नाम छपा होता था। जिसमें यह अपील होती थी कि उनके मन में जो भी सवाल आते हैं, उन्‍हें वे सवालीराम से पूछ सकते हैं

सुशील जोशी

अवलोकन-आधारित दुनिया

सुशील जोशी

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