विज्ञान एवं तकनॉलॉजी

डा.सत्यजीत रथ, राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान में वैज्ञानिक रहे हैं। आजकल वे आईसर पुणे से साथ सम्बद्ध हैं और एकलव्य के विज्ञान सम्बन्धित कामों में स्रोत व्यक्ति भी हैं। 9 मई को की शाम डा.सत्यजीत से एकलव्य संस्‍था के साथियों ने कोविड19 के विभिन्न आयामों पर उपयोगी बातचीत की। बातचीत को इस वीडियो में देखा जा सकता है।

जब आप विज्ञान यह सोच कर पढ़ाते हैं कि इसके द्वारा बच्चों में कुछ स्किल्स या क्षमताओं का विकास करना है तो निश्चित ही उसके कुछ परिणाम भी समय-समय पर मिलते रहते हैं। जैसे विज्ञान में प्रश्न पूछने और प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए खोजबीन करना एक विशेष स्किल है।

मोहम्‍मद उमर अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में गणित विषय के स्रोत व्‍यक्ति हैं। उन्‍होंने अपनी गणितीय समझ का उपयोग करते हुए कोरोना वायरस के संक्रमण को इस वीडियो में समझा आया है। सरल भाषा में निश्चित ही यह एक उपयोगी प्रयास है। आप भी देखें और लाभ उठाएँ।

कोरोना वायरस का फैलता संक्रमण तरह-तरह की आंशकाओं को जन्म दे रहा है। इसे लेकर अवैज्ञानिक सूचनाएँ/अफवाहें भी फ़ैलाई जा रही हैं। ऐसे में बच्चों और बड़ों दोनों को कोरोना वायरस और इससे फैलने वाली बीमारी के बारे में सही-सही जानकारी उपलब्ध कराने की जरूरत है। इस जरूरत को देखते हुए

मैं आपको विज्ञान का दर्शन नहीं बताने जा रहा, मैं तो आपको अपने कक्षा अनुभव से रूबरू करवा रहा हूँ। दरअसल मैंने फेसबुक के Teacher Info Point पेज पर ममता अंकित का एक वीडियो देखा जिसमें वे अपने विद्यार्थियों को प्रकाश को सीधी रेखा में चलना दिखा रही थीं। मैं भी इस टॉपिक पर कई बार कुछ गतिविधियाँ करवा चुका था। ये वीडियो मुझे बहुत पसन्द आया और कक्षा में प्रयोग करने लायक भी लगा। तो जैसे ही अवसर मिला मैंने कक्षा 6, 7 व 8 के बच्चों को कंप्यूटर कक्ष में बिठाकर उनके समक्ष ये प्रयोग करने का निर्णय लिया।

Ncert तथा सभी बोर्ड में कक्षा 10 में बच्चों को दिष्ट धारा मोटर तथा दिष्ट धारा जनित्र पढाया जाता है|बच्चों को उनके चित्र बनाने में बेहद कठिनाई का अनुभव होता है|वे उनके चित्रों में अंतर नहीं कर पाते|प्रस्तुत वीडियो में एनीमेशन के द्वारा न सिर्फ दिष्ट धारा जनित्र को बनाना बताया गया है बल्कि दिष्ट धारा मोटर बनाते समय उसमे कितना बदलाव करना है,यह भी बताया गया है|

हम सभी जानते हैं कि श्वसन सभी जीवों के लिए अतिआवश्यक प्रक्रिया है। जिसमें जीव गैसों का आदान-प्रदान करते हैं। प्राथमिक कक्षाओं में अधिकतर इसे सामान्य रूप से चर्चा करके और कुछ जानकारियों के रूप में बताकर छोड़ दिया जाता है। बच्चों को बता दिया जाता है कि मानव श्वसन के दौरान ऑक्‍सीजन लेते हैं और कार्बन डाई-ऑक्साइड छोड़ते हैं जबकि पौधे हमारे द्वारा छोड़ी गई कार्बन डाई-ऑक्साइड को ग्रहण करते हैं और ऑक्‍सीजन छोड़ते हैं। मैं भी बचपन में ऐसा बच्चा रहा हूँ, जिसे कक्षा में ज्यादा सवाल करने के मौके नहीं मिले थे। इसलिए हम गुरुजी की बात जैसी की तैसी मान लेते थे, चाहे वो इतिहास से जुड़ी हो या विज्ञान से। किन्तु जब से हमें सवाल करने के मौके मिले हैं तब से हर बात का कारण जानने के प्रति हमारी जागरूकता बढ़ी है। कक्षा में भी हम बच्चों को खूब सवाल पूछने और और उनका हल खोजने के प्रति प्रेरित करते रहते हैं। ठीक ऐसे ही स्वयं प्रयोग करके देखना भी बड़ी कक्षाओं में ही हो ऐसा जरूरी तो नहीं। पर्यावरण शिक्षक होने के नाते मैं अपनी हर कक्षा में बच्चों को स्वयं करके देखने का कोई मौका नहीं छोड़ता। और यदि वह प्रयोग उनके परिवेश और उपलब्ध संसाधनों से जुड़ा हुआ हो तो कहने ही क्या। कुछ ऐसा ही एक कक्षा कक्षीय अनुभव आपके साथ यहाँ साझा कर रहा हूँ।

अपनी बात की शुरुआत मैं कुछ बुनियादी बातों के साथ करना चाहूँगी। पहला, राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय चिणाखोली में मेरे अलावा दो अन्य शिक्षक हैं। गणित और विज्ञान शिक्षक के रूप में मेरी तैनाती की गई है, परन्तु इसके अतिरिक्त अन्य विषय जैसे भाषा आदि भी मुझे देखने पड़ते हैं। एक शिक्षक के रूप में इन विषयों की तैयारी एवं अध्यापन एक कठिन प्रक्रिया के रूप में दिखाई देता है। समेकित कक्षा शिक्षण इसके लिए उपयोगी हो सकता है। दूसरा, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 यह सुझाव देती है कि शिक्षक अध्यापन कार्य करते समय बच्चे के परिवेश का खूब इस्तेमाल करे ए

उत्तल लेंस द्वारा उसके सम्मुख रखी वस्तु और उनके प्रतिबिम्बों की सामान्यत: 6 स्थितियां होती है|इनमें
(1) वस्तु अनंत पर स्थित हो
(2) वस्तु अनंत और 2 F के बीच हो
(3) वस्तु 2 F पर हो
(4) वस्तु 2 F और F के बीच हो
(5) वस्तु F पर हो
(6) वस्तु F और P अर्थात ध्रुव के बीच हो
इन सभी 6 स्थितियों में उत्तल लेंस द्वारा 6 अलग-अलग प्रकार से प्रतिबिम्ब बनते है|इन्हें समझने में बच्चों को काफी मुश्किल आती है|

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