गणित

हिंदी प्रदेशो में संख्यावाचक शब्दों के उच्चारण और लेखन में एकरूपता का अभाव दिखाई देता है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित “ए बेसिक ग्रामर ऑफ मॉडर्न हिंदी” में भी इस एकरूपता का अभाव था। अतः निदेशालय में 5-6 फरवरी ,1980 को आयोजित भाषा विज्ञानियों की बैठक में इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने के बाद इनका जो मानक रूप स्वीकार हुआ, वह इस प्रकार है।

एक से सौ तक संख्यावाचक शब्दों का मानक रूप
एक, दो, तीन, चार, पाँच।
छह, सात, आठ, नौ, दस।।

ग्‍यारह, बारह, तेरह, चौदह, पन्द्रह।
सोलह, सत्रह, अठारह, उन्नीस, बीस।।

स्वाती सरकार

शैक्षिक पत्रिका 'पाठशाला - भीतर और बाहर' अंक 1, जुलाई,2018 में यह एक रोचक संवाद प्रकाशित हुआ है। इस संवाद में दिल्‍ली सरकार द्वारा संचालित प्राथमिक स्‍कूल के दो शिक्षकों, माध्‍यमिक स्‍तर के एक शिक्षक, डाइट की एक प्राध्‍यापिका और दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के शिक्षा संकाय द्वारा संचालित प्रायोगिक स्‍कूल की शिक्षिका ने भागीदारी की है।

इस संवाद को पढ़ने के लिए नीचे दी गई लिंक से पीडीएफ डाउनलोड कर सकते हैं।

शैक्षिक पत्रिका 'पाठशाला - भीतर और बाहर '  अंक 1 जुलाई,2018 में प्रकाशित यह  लेख एक अच्‍छी विषय आधारित कक्षा के बारे में हमारी धारणाओं पर प्रश्‍न उठाता है। हम एक 'अच्‍छी कक्षा'  किस प्रकार समझते हैं ?  वे कौन से पहलू हैं जो एक 'अच्‍छी कक्षा' को एक 'सफल विषयी कक्षा' भी बनाते हैं?  दूसरे शब्‍दों में हम इस प्रश्‍न को उठाकर यह सन्‍देश देने का इरादा रखते हैं कि सामान्‍यत: एक अच्‍छी कहलाई जाने वाली कक्षा में विषय आधारित भागीदारी भी हो, ऐसा जरूरी नहीं । इस लेख में उपयुक्‍त की श्रेणी में रखी जाने वाली उन गणितीय कक्षाओं के बारे में चर्चा की है जो गणितीय सोच के विकास में नगण्‍य भूमिका निभाती हैं।

समय एक ऐसी अवधारणा है जो मानव द्वारा प्रतिदिन इस्‍तेमाल की जाती है और सम्‍भवत: जानवरों व पौधों के जीवन में भी सहज रूप से इसका इस्‍तेमाल होता है। मुर्गे को पता होता है कि उसे बाँग कब देनी है। फूलों को पता होता है कि उन्‍हें कब अपनी पंखुडि़याँ खोलनी हैं। पेड़ों को पता होता है कब अपने पत्‍ते झड़ाने हैं।

बहुत से बच्‍चों के लिए इबारती सवाल किसी अवरोध की तरह होते हैं। इनमें वे बच्चे भी शामिल हैं जो संक्रियात्‍मक (संक्रियाओं का इस्‍तेमाल कर गणना करना) और प्रक्रियात्‍मक कौशलों में निपुण होते हैं। कई बच्‍चे संकेत शब्‍दों जैसे कुल मिलाकर, अन्‍तर, जोड़ इत्‍यादि की तलाश के आधार पर इबारती सवालों को हल करने का तरीका विकसित कर लेते हैं। लेकिन इस तरीके का महत्‍व बहुत ही सीमित होता है। ऐसे बच्‍चे सवाल हल करने के लिए कौन-सी संक्रिया इस्‍तेमाल करनी है यह जानने के लिए आमतौर पर अनुमान का सहारा लेते हैं। इबारती सवालों से सामना होने पर ऐसे बच्‍चे गणि

क्षेत्रफल और परिमाप मापन के वो रूप हैं जो आमतौर पर रोजमर्रा की कई गतिविधियों में इस्‍तेमाल होते हैं। विशेष तौर पर क्षेत्रफल बहुत ही सहज तरीके से हमारे रोजमर्रा के कार्यों में शामिल होता है। जैसे कि किसी बरतन को ढँकने के लिए किसी प्‍लेट का चयन करते समय, किसी मेज विशेष के लिए इस्‍तेमाल होने वाले मेजपोश के रूप में, एक किताब पर कवर लगाने के लिए कागज की किसी शीट के रूप में आदि। विशिष्‍ट शब्‍दों को जाने बिना भी बच्चे आमतौर पर ऐसे निर्णय लेते हैं जिनमें क्षेत्रफल की समझ सहज रूप से निहित होती है। ऐसे में एक सवाल स्‍वाभाविक रूप से उठता है कि हम किसी भी जगह की सटीक माप क

हम तेजी से बढ़ती हुई एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी दिशाओं से बड़ी संख्‍याओं की बमबारी हो रही हो। वैश्‍वीकरण और ज्ञान के विस्‍फोट का धन्‍यवाद, जिसकी वजह से नियमित रूप से हमारा सामना बहुत बड़ी-बड़ी संख्‍याओं से होता है। फिर भी, यहाँ एक प्रासंगिक सवाल यह उठता है कि ‘क्‍या इन संख्‍याओं से होता सामना इन संख्‍याओं के आकार की समझ बनाने का कारण बनता है?’ या फिर यह सम्‍भव है कि इन संख्‍याओं के निरन्‍तर उपयोग के कारण हम इनके आकार को कुछ कम करके आँकते हैं।  क्‍या इन संख्‍याओं से अत्‍याधिक परिचय सही दृष्टिकोण विकसित करने में बाधक है?

आनन्‍द निकेतन स्कूल एक ऐसा स्कूल है जहाँ सभी को सोचने-विचारने और तर्क करने की आजादी है। यह आजादी क्लासरूम से लेकर प्लानिंग बोर्ड तक और किचन से लेकर झूले तक दिखाई और सुनाई पड़ती है। ऐसी ही एक गणितीय आजादी का जिक्र में अपने इस लेख में करने वाला हूँ। इस लेख का नाम दायाँ और बायाँ क्यों है वो आप इस लेख को पढ़ते हुए समझ पाएँगे।
कक्षा 4 की गणित की कक्षा में सभी बच्चे तीन अंकों के गुणा के सवाल को हल करने में लगे हैं। सभी बच्चे अपने सवालों को जैसा उन्होंने हल किया वैसा ही ब्लैक बोर्ड पर समझाते हैं।

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