सांगली

कोई सौ कदमों की दूरी से एक सुन्‍दर और छोटी शाला का भवन दिखने पर हमें खुशी होती है, लेकिन इस जिज्ञासा के साथ कि यहाँ पढ़ने के लिए कितने बच्चे आते होंगे? नजदीक आने पर शाला के शिक्षक सुनील गायकवाड़ हमारा स्वागत करके शाला के भीतर के एक कमरे में ले जाते हैं। इस कमरे में कुल 12 बच्चे पढ़ाई में तल्लीन हैं, जबकि दूसरे कमरे में 8 बच्चे बिना शिक्षक के पढ़ रहे हैं। 20 बच्चे और दो कमरों की शाला में सुनील गायकवाड़ अकेले शिक्षक हैं। यह जब एक कमरे में साथ बैठे दो कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाते हैं तो दूसरे कमरे में बैठे दो अलग-अलग कक्षाओं के बच्चे एक साथ बगैर शिक्षक के अनुशासित ढंग से खुद पढ़ना-लिखना सीख रहे होते हैं।

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यह शिक्षा के निजीकरण का दौर है। यह देश के अभावग्रस्त परिवारों के बच्चों से उनके डॉक्टर, इंजीनियर बनने के सपनों के छिन जाने का दौर है। यह महँगी फीस, महँगे स्कूल और उम्दा पढ़ाई के नाम पर अमीर तथा गरीब बच्चों के बीच शिक्षा की खाई को और भी ज्यादा चौड़ा कर देने का दौर है। यह अमीरों के बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों का दौर है। इसलिए, यह गरीब बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों को उनके हाल पर छोड़ देने का दौर है। इस दौर में हम देख रहे हैं कि सरकारी स्कूलों की हालत किस तरह बद से बदतर बना दी जा रही है। लेकिन, जरा ठहरिए! यह दूर—दराज के ग्रामीण इलाकों में ऐसे शिक्षक और समुदायों के साझा संघर्षों का भी दौर है जो सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता की नींव बन रहे हैं। महाराष्ट्र के सांगली जिले के गाँवों से ऐसे ही स्कूलों की कहानियाँ, जिनमें बदलाव की आहट साफ सुनाई दे रही हैं।

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