सत्‍यपाल

वे कहते हैं कि, "मैंने नौकरी को नैतिक कर्त्तव्य के हिसाब से लिया है। हमेशा अपनी अन्तरात्मा से सोचा कि मुझे और बेहतर करना चाहिए। मैं उसके लिए प्रयासरत रहा हूँ। मैंने खुद को कभी समय में नहीं बाँधा। मेरे लिए विद्यालय सिर्फ 9 बजे से 5 बजे तक नहीं है। मैंने अपने पूरे सेवाकाल में हरदम या कोशिश की कि मैं अपना अधिक से अधिक समय विद्यालय को दूँ। जितना समय मिलता है कोशिश यही रहती है कि हम बच्चों के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयास कर सकें। सिर्फ समय की पाबंदी बेहतर काम करने के लिए काफी नहीं।’’

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