शिक्षक

जिन्‍दगी ने कभी इतना वक्त ही नहीं दिया कि वो क्या चाहते हैं, यह सोचा जा सके। बस जो सामने आता गया, उसी रास्ते पर चलते गए। ‘मैं यह नहीं कह रहा कि मैं टीचर नहीं बनना चाहता था लेकिन मुझे यह भी नहीं पता था कि मैं टीचर बनना चाहता हूँ।’

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शिक्षक ने पालकों के साथ जिस तरह से बातचीत की पालकों को बात करने के मौके दिए उनकी भावनाओं का सम्मान किया व उनकी बातें सुनी। शिक्षक के इस तरीके ने मुझे काफी प्रभावित किया। इस शिक्षक के बारे में और जानने समझने की मेरे मन में जिज्ञासा पैदा हुई।

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शिक्षक दिवस के अवसर पर हमने चर्चा मंच में कहा था कि ‘शिक्षक होने का अर्थ क्‍या है ?'  इस विषय पर अपने विचार अधिक से अधिक ढाई सौ शब्‍दों में लिखें और हमें भेजें। पोर्टल पर आपके नाम के साथ इन्‍हें प्रकाशित किया जाएगा।

तीन साथियों ने इस बारे में अपने विचार व्‍यक्‍त किए हैं। उन्‍हें हम यहाँ दे रहे हैं।

बांदा,उप्र के नरैनी से प्रमोद दीक्षित मलय ने लिखा :

अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन न्याय व समतापूर्ण समाज के निमार्ण की जिस मुहिम में जुटा है, उसमें शिक्षा की भूमिका को केन्द्रीय माना जा रहा है। संस्थान का मानना यह है कि शिक्षा ही एक ऐसा उपकरण है जिसके द्वारा सामाजिक बदलाव किया जा सकता है। इसी अवधारणा के तहत वर्ष 2012-13 से देश के चार राज्यों (कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड और राजस्थान) में कुल छह स्कूल संचालित किए जा रहे हैं। इनमें से दो राजस्थान के टोंक व सिरोही में हैं।

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धतुरी रामनगर स्कूल भी एक सरकारी स्कूल ही है और इस स्कूल को भी शासन द्वारा वही सुविधाएँ प्राप्त हैं जो अन्य स्कूलों को मिलती हैं। लेकिन यहाँ सिर्फ अलग है तो इस स्कूल का प्रबन्धन व स्कूल के शिक्षकों का साझा प्रयास जो इसे खास बनाता है। जिसका असर स्कूल के वातावरण व शैक्षणिक स्तर पर दिखाई देता है।

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लखन लाल बताते हैं, 'भुंजिया आदिवासी लड़कियों के साथ भी कई परेशानियाँ हैं। उन्हें स्कूल नहीं भेजा जाता था और उनके परंपरा के अनुसार वे चप्पल नहीं पहनती थीं। भुंजिया समुदाय के मुखिया से बात हुई। वे एक शर्त पर तैयार हुए कि अगर मध्यान्ह भोजन उनके ही समुदाय का व्यक्ति कोई पकायेगा तो ये लोग खाना खाएँगे और तभी आएंगे।'

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लोकेश स्कूल आने के लिए अपनी मोटर साइकिल का उपयोग करते हैं। यह मोटर साइकिल भी बच्चों को बुलाने में उनकी मदद करती है। लोकेश जैसे ही गाँव में पहुँचते हैं वे अपनी मोटर साइकिल का हॉर्न बजाना शुरु कर देते हैं। हॉर्न की आवाज सुनकर बच्चे समझ जाते हैं कि गुरुजी आ गए हैं। बच्चे घर से अपना बस्ता लेकर गुरुजी की गाड़ी के पीछे-पीछे दौड़े चले आते हैं। लोकश भी बच्चों के घर के बाहर जाकर हॉर्न बजाते हैं और अगर कोई बच्चा हॉर्न की आवाज सुनकर बाहर नहीं आता है तो उनके घर वालों से बच्चे के बारे में जानकारी लेते हैं।

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जब किसी कार्य को पूरी मेहनत व लगन से किया जाए तो उस कार्य में सफलता अवश्य हासिल होती है। अध्ययन कार्य करवाते समय हमें समस्त बच्चों का सहयोग लेते हुए एवं बच्चों की भावना को समझते हुए शिक्षण कार्य करवाना चाहिए।

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लर्निंग कर्व का विशेष अंक जो स्‍कूल शिक्षा में कला पर केन्द्रित है, हिन्‍दी में उपलब्‍ध है।

इस अंक को चार भागों में प्रस्‍तुत किया गया है।

पहले भाग में आवरण, सम्‍पादक टीम आदि की जानकारी,

सम्‍पादकीय तथा इस अंक में प्रकाशित लेखों की सूची है।
 

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