शिक्षक

आजकल दिनों-दिन नई नई तकनीक खोजी जा रही हैं। एेसे में हमारे विद्यालयों की कक्षाएँ भी इनसे अछूती नहीं रह सकती हैं।
यह पीपीटी बताती है कि कक्षा में प्रौद्योगिकी का उपयोग कैसे किया जा सकता है।

प्रत्येक बच्चे का आदर करना और उसे महत्त्व देना। मुझे लगता है कि यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। यही सबसे चुनौतीपूर्ण भी है क्योंकि लोगों को यह विश्लेषण करना होगा कि वे अपने से अलग बच्चों/लोगों के साथ अलग तरह का व्यवहार क्यों करते हैं - क्या यह सामाजिक या आर्थिक तबके में अन्तर की वजह से है या क्षमताओं में अन्तर की वजह से? हमारे व्यवहार की गहरी सांस्कृतिक जड़ें हैं। यह निश्चित तौर पर एक चुनौती है कि हम सामाजिक जीवों के तौर पर जो दुराग्रह पाल लेते हैं, उन्हें खुलेपन से परिवर्तित कर पाएँ।

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स्कूल में शैक्षणिक माहौल को बेहतर बनाए रखने के लिए प्रतिदिन की शैक्षिक योजना में बच्चों की भागीदारी को स्थान दिया गया। इसके तहत बच्चों से चर्चा करने पर लगता है कि वह आज (किसी भी खास दिन) पढ़ने के बजाए कुछ और करना चाहते हैं, तो उनके साथ कुछ अलग तरह की गतिविधियाँ की जाती हैं। जैसे कुछ उदाहरण - गीत, कविताएँ, नृत्य, मिट्टी के खिलौने व मॉडल बनाना, खेल-खेलना आदि।

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आज छुट्टी का दिन था लेकिन बच्चे स्कूल आए थे। मैंने एक बच्चे से पूछा कि छुट्टी के दिन स्कूल क्यों आए हो तो बोला कि घर में मन नहीं लगता है।

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प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने वाली एक शिक्षिका के सामने अपनी पदोन्न्ति के लिए दो विकल्‍प थे- पहला, कि वह बतौर सहायक शिक्षका जूनियर हाईस्‍कूल में चली जाए। दूसरा, वह प्राथमिक विद्यालय में ही प्रधानाध्‍यापिका की जिम्‍मेदारी संभाले।

उत्‍तराखण्‍ड में मुक्‍तेश्‍वर की अनुराधा सक्‍सेना ने दूसरा विकल्‍प चुना...क्‍यों ? यह वे इस वीडियो में बता रही हैं।

अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन में कार्यरत जितेन्‍द्र शर्मा ने उनसे बात की है।

विमला

बी.एड. की पढ़ाई के दौरान हमें समूह बनाकर विभिन्न स्कूलों में पढ़ाने हेतु भेजा जाता था। साथ में हमारे समूह के प्रभारी शिक्षक भी जाते थे।

कल्‍याणसिंह मनकोटी उत्‍तराखण्‍ड के एक सुदूर गॉंव के युवा अध्‍यापक हैं। अपने विद्यालय में सीमित संसाधनों और समुदाय के सहयोग से वे जो कुछ कर रहे हैं,उसके बारे में जानकर लगता है कि हम गिजुभाई के प्रतिरूप से मिल रहे हैं। वास्‍तव में हमें तो ऐसा कहने में कोई संकोच नहीं है। बाकी आप उनकी यह डायरी पढ़कर खुद ही तय कर सकते हैं। -सम्‍पादक

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मार्जोरी साइक्स

कुछ ही समय में शिक्षिका द्वारा समुदाय के लोगों से किया गया सतत सम्‍पर्क और आजमाए गए तरीकों का असर नजर आने लगा। दोनों ही समुदाय से कुछ बच्चों ने स्कूल में दाखिला लिया। इन बच्चों को स्कूल आता देख कुछ और अभिभावकों ने भी अपने बच्चों को विद्यालय भेजना प्रारम्भ किया। आज की स्थिति में सत्र 2013-14 में विद्यालय में 69 बच्चे नामांकित है और इनमें 28 बालिकाएँ हैं।

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