शिक्षक

 

'खोजें और जानें' के इस अंक में है :

विमर्श

साझी समझ, साझे प्रयास * वंदना सिंह

बच्‍चे की शिक्षा और पालक * केवलानंद कांडपाल

ओमप्रकाश जब इस स्कूल में आए, तब कुछ ही दिनों के अनुभवों में उन्होंने पाया कि अभिभावक बच्चों की ओर कोई खास ध्यान नहीं देते हैं। इसके साथ ही दो विशेष बातों पर भी उनका ध्यान गया। एक, गाँव के सभी लोग बाल विवाह पर एकमत हैं। दो, लड़कियों को पढ़ाने पर रुझान नहीं के बराबर है।

गाँव की अधिकतर लड़कियाँ कक्षा पाँच में भी नहीं पहुँच पाती हैं और जो पहुँच भी जाती हैं, वे भी कक्षा पाँच से आगे नहीं पढ़ पाती हैं। गाँव की लगभग 90 प्रतिशत आबादी धाकड़ और जाट समुदाय की है और बाकी 10 प्रतिशत में मंसूरी, भील, लुहार आते हैं। इन दोनों ही बातों के संदर्भ में आज की स्थिति पर नजर डालें तो आज गाँव में एक भी लड़की ऐसी नहीं है, जिसने कम से कम कक्षा आठ तक पढ़ाई न की हो। लगभग 30 बालिकाएँ ऐसी हैं जो गाँव से तीन किलोमीटर दूर स्थित बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय, बासू में अध्ययनरत हैं। कुछ बालिकाएँ ऐसी भी हैं जो दसवीं से आगे भी पढ़ रही हैं। बालविवाह के प्रति समुदाय के नजरिये में भी बदलाव आया है।

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अपने पढ़ाने के तरीकों के बारे में रश्मि बताती हैं कि वे बच्चों को पहले मौखिक रूप से बोलना और बातें करना सिखाती हैं, फिर लिखना और पढ़ना साथ-साथ सिखाती हैं। अक्षर ज्ञान कराने के लिए तरह-तरह के कार्ड बनाकर रखे गए हैं। कविताएँ और कहानियाँ तो रोज ही सुनाती हैं, इसके अलावा कुछ कविताओं के जरिये गिनती या अन्य बातें भी सिखाती हैं। बच्चों को गणित सिखाने के लिए आड़ू-खुबानी की गुठलियों का पयोग किया जाता है। इस विद्यालय में कक्षा एक से ही बच्चों को जोड़, घटाव, गुणा और भाग करना सिखाया जाता है। यहाँ के लगभग सभी बच्‍चों की लिखावट आश्चर्यजनक रूप से साफ और बहुत सुंदर है। शिक्षण विधि को रुचिकर तथा अधिक उपयोगी बनाने के लिए स्थानीय परिवेश पर आधारित शिक्षण सहायक सामग्री विकसित की गई जिससे बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि और अधिक प्रगाढ़ हुई है। बाल अखबार तथा बाल पुस्तकालय को संकलित कर तथा स्थानीय तीज-त्योहारों को आधार मानकर शिक्षण कार्य को नवीनता प्रदान की गई। ‘सर्व शिक्षा’ परियोजना के अन्‍तर्गत विद्यालय में शिक्षिकाओं, बच्चों तथा समुदाय के कुछ उत्साही व्यक्तियों द्वारा मिलकर अपने परिवेश से बालोपयोगी और पाठ सहयोगी सामग्री तैयार की गई।

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जो शिक्षक अच्छा कर रहे हैं, उनके पास उसे बताने को कोई मंच न होना बहुत अखरता है। ऐसा कोई अखबार तो दुनिया में होना चाहिए, जो शिक्षकों के अच्छे काम को सामने लाये। प्राथमिक स्कूलों में शिक्षण कोई मामूली काम नहीं। मेरा तो प्रयास यही रहता है कि दोस्ती से काम लूँ। मैंने देखा है ऐसा करने से काम हो जाते हैं। सीआरजी में 14 शिक्षक अपनी इच्छा से आए हैं। इनमें अच्छे और गम्‍भीर मुद्दों पर चर्चा होती है। अधिकतर शिक्षक ऐसे प्रयोग चाहते हैं, लेकिन व्यावहारिक दिक्कतों की वजह से कर नहीं पाते। जिन स्कूलों में अभिलेखीकरण का काम अच्छा है, वहाँ दूसरे स्कूलों के शिक्षक भेजे जाते हैं। सीखने और सिखाने वाले दोनों को लाभ होता है। मैं जोर देकर कहूँगा कागजों से कुछ नहीं होता। ऐसे काम कागज दौड़ाकर नहीं हो सकते। असल प्रभाव तो शिक्षकों की आँखों में दिखता है।

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टोंक जिले के निवाई विकास खण्‍ड के एक माध्‍यमिक विद्यालय के शिक्षक राजेश गूजर अपने विद्यार्थियों को अँग्रेजी शिक्षण करते हुए जो सीख रहे हैं, उसे बता रहे हैं।

28 फरवरी यानि कि विज्ञान दिवस! अजीम प्रेमजी स्कूल,टोंक के बच्चों ने इस दिन मेले का आयोजन किया। लगभग एक सप्ताह का समय लगाकर बच्‍चों जिस तरह से विज्ञान मेले के आयोजन की प्रक्रिया में अपनी भागीदारी दी, यह काफी उत्साह देने वाला रहा। काम की इस पूरी प्रक्रिया व इसके साथ बच्चों की अन्‍तक्रिया का स्वरूप मुझे कुछ इस तरह से प्रतिबिम्‍बित होता नजर आया है।

इस सबमें अहम् बात मुझे जो लगी वह ये कि मेरी बच्चों के प्रति जो सोच थी कि बच्चे कच्ची मिट्टी के घड़े हैं, जिन्हें मनचाहा आकार दिया जा सकता है, में काफी बदलाव आया है। क्योंकि वास्तव में ऐसा नहीं है।

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कक्षा पाँच एक समूह में बैठी हुई थी, जहाँ शिक्षक स्वयं काम कर रहे थे। वे बच्चों को कल दिए गए गृहकार्य को जाँचते हुए उन्हें आगे के लिए काम दे रहे थे। इसी दौरान अन्य कक्षाओं में (प्रत्येक समूह में) एक-एक बच्चा (लड़के-लड़की दोनों) बारी-बारी से सभी बच्चों की कॉपियाँ देख रहे थे। इस दौरान वे कॉपियों में की हुई गलतियों पर निशान लगाते हुए सम्‍‍बन्धित बच्चे से उस पर बात कर रहे थे और उसे बता रहे थे कि उसने क्या-क्या गलतियाँ की हैं। बच्चे अपनी गलतियाँ ठीक कर रहे थे। जिन बच्चों ने सही काम किया हुआ था, उन्‍हें आगे का काम दिया जा रहा था। कॉपियाँ जाँचने वाले बच्चे अपने अनुभव से यह काम करते हुए दिखाई दे रहे थे। इसमें प्रथम दृष्ट्या शिक्षक के किसी निर्देश का आभास नहीं हो रहा था।

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क्या आप उस प्यार से अभिभूत हैं जो आपके विद्यार्थी आपके लिए रखते हैं। और क्या आप इस बात से हैरान हैं कि आखिर आपने ऐसा क्या किया जिससे आप विद्यार्थियों का इतना आकर्षण प्राप्त कर रहे हैं। यहाँ 7 सम्‍भावित कारण दिए जा रहे हैं। पता करें, ये आपमें हैं कि नहीं ।

1. सीखने की उमंग

बगीचे में लगा पपीते का पेड़ फलों से लदा है। छोटी-छोटी बनी क्यारियों में गुजराती केले के पौधे लगे हैं जिनमें फल आना शुरू हो गया है। पीपल का पेड़ अब काफी बड़ा हो चुका है। बच्चों ने चिडि़यों को पानी पिलाने के लिए एक बर्तन टांग दिया है। वे रोज इसमें पानी डालते हैं। गुलाब की कलम तैयार करके और भी पौधे तैयार किए जा रहे हैं। बालू लाल जी बताते हैं कि इन सब कामों में बच्चे और शिक्षक मिलकर योगदान देते हैं। आसपास के सात-आठ स्कूलों के शिक्षक यहाँ से ही पौध ले जाकर अपने स्कूलों में लगाते हैं।

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