शिक्षक

आशु गुप्ता

पहले दिन ही बच्चों से सीख मिली

प्रभारी प्रधानपाठक राकेश चन्‍द्राकर का मानना है कि,“ जब हम लाख कोशिश के बाद भी बच्चों को सिखा नहीं पाते हैं तो इसका मतलब होता है कि सिखाने के तरीकों मे बदलाव की जरूरत है। अगर हम यह जान लेते हैं कि विद्यालय के कौन से बच्चे की सीखने की गति अन्य बच्चों से कम है तो शिक्षक का लक्ष्य तय हो जाता है कि मुझे अन्य बच्चों कि अपेक्षा उस या उन बच्चों के लिए कुछ बेहतर गतिविधि या शैक्षिक प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता है। हमारे लिए कोई भी बच्चा आगे या पिछड़ा नहीं होता है। बच्चे तो बच्चे होते हैं। हमें हरेक बच्चे को समान अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है बच्चे प्राकृतिक रूप से सीखने के लिए उत्साहित होते है। बच्चे असीमित क्षमताओं के साथ पैदा होते है हमे उनके मित्र बनकर मदद करना है। फिर देखें बच्चे कैसे सीखते हैं। ”

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नीलम शुक्ल

बच्चों ने मुझे अपना बना लिया

कैलाश ने खुद यहाँ की झाड़ियों और पेड़ों को काटा और सफाई की। सुबह से ही स्कूल में आकर बैठ जाते ताकि लोग शौच के लिए यहाँ न आएँ, पशु अन्‍दर न घुसें। पशुओं की नाकाबन्‍दी के लिए चारों ओर से काँटों की बागड़ लगाई। स्कूल के बगीचे को तो सजाया-संवारा ही साथ ही स्कूल भवन में लड़कियों के शौचालय का प्रबन्‍ध भी किया। ये शौचालय एकदम साफ मिलेंगे। शौचालयों में पानी की माकूल व्यवस्था है। पानी के लिए स्कूल भवन में ही एक बड़ी टंकी बनाई गई। स्कूल में एक भी भृत्य का पद नहीं है। तो फिर इनकी सफाई कौन करता होगा? कैलाश कहते हैं, ‘मैं ही करता हूँ।’ रायबिड़पुरा के कन्या माध्यमिक विद्यालय के शौचालयों के प्रबन्‍धन से डायट और बी.आर.सी.कार्यालयों को सीख लेने की जरूरत है कि कैसे एक ग्रामीण विद्यालय सही अर्थों में साफ-सफाई को तवज्‍जो देता है। इसके लिए संस्थान के लोगों को ही नेतृत्व की बागडौर अपने हाथों में लेनी होती है।

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रोहित धनकर

पहले तो विचार आया कि बच्चों को स्वतंत्रता देकर हम अनुशासनहीनता को तो नहीं बढ़ा रहे, पर कुछ ही समय बाद हमें अकादमिक सन्‍दर्भ समूह में सदस्य के रूप में बैठकों में प्रतिभाग करने और कई जगहों के भ्रमण का अवसर मिला। कई बातें बच्चों और वर्तमान शिक्षा के बारे में जानने को मिली। जैसे यह भी धारणा हमारे बीच है कि नौकरी के बाद क्या पढ़ना? तो मैंने भी नौकरी पाने के बाद पढ़ना लगभग बन्‍द ही कर दिया था। तो इस भ्रमण ने दो महत्वपूर्ण सीखें दी, एक तो बच्चों को देखने के प्रति नजरिया, दूसरा पढ़ने की इच्छा होना।

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मनस्वनी श्रीधर

शर्मीले या संकोची स्वभाव वाले विद्यार्थियों को सभी के सामने सहज बनाना एक आम  समस्‍या है जिससे शिक्षकों का अक्‍सर सामना होता है। लेखिका ऐसे तरीके सुझा रही हैं जिन्हें शिक्षक आजमा सकते हैं।

अलका तिवारी

या राठौड़

अट्ठारह साल पहले

उमा शर्मा कहती हैं जब पीपरछेड़ी में आई तब मुझे लगा कि गाँव में ही रहकर बच्चों और उनके पालकों से सीधे मुलाकात कर कुछ अलग करना चाहिए। पालकों से नियमित मिलने-जुलने और पारिवारिक वातावरण को जानने-समझने का सिलसिला आरम्‍भ करने का यह असर दिखा कि बच्चे खुलकर अपनी बातें मुझसे कहने लगे।

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