शिक्षक

अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन ने 2015 में उत्‍तराखण्‍ड के सुदूर पहाड़ी इलाकों में कार्यरत नवाचारी और उत्‍साही शिक्षकों के कामों का दस्‍तावेजीकरण करके 'उम्‍मीद जगाते शिक्षक' नाम से एक पुस्तिका का प्रकाशन किया था। इसमें 11 शिक्षक-शिक्षिकाओं से बातचीत के आधार पर उनके काम का जायजा लिया गया था। बातचीत करने वाले साथियों ने उनके स्‍कूलों में जाकर उनके काम को भी देखा था। जिसने भी इस पुस्तिका को देखा-पढ़ा, उसने इस प्रयास की सराहना की।

 टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल ने एक क्‍यूब टेबिल कैलेंडर,2016  बनाया है। यह नवाचारी शिक्षकों को सम‍र्पित है। दो क्‍यूब हैं। क्‍यूब की एक सतह पर किसी एक शिक्षक के विचार और किसी एक महीने की तारीखें दी गई हैं। कैलेंडर की बेसिक डिजायन यहाँ दी गई है। आप उसे डाउनलोड करके,प्रिंट करके यह कैलेंडर बना सकते हैं।

9 सितम्‍बर, 2016 को दाऊद खान रामायणी जी का निधन हो गया। उन्‍हें 1972 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था। वी.वी.गिरि उस समय राष्ट्रपति थे। उन्होंने फर्स्ट क्लास की टिकिट भेजी और पूरा इंतजाम किया। वे बताते हैं, 'मैं राष्ट्रपति भवन में आठ दिन मेहमान रहा और राष्ट्रपति भवन में मेरा रामायण पाठ हुआ। राष्ट्रपति ने पूछा कि हम आपको पुरस्कार दे रहे हैं, आप क्या महसूस कर रहे हैं। मैंने कहा, दाऊद खान जगतपति से पुरस्कृत है और आज राष्ट्रपति से पुरस्कार ले रहा है।'

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इन दो शिक्षिकाओं ने मिलकर यह जानने की कोशिश की कि बच्‍चे स्‍कूल क्‍यों नहीं आते हैं। कारण खोजकर उन्‍होंने उसके समाधान भी खोजे। यह अनुभव वीडियो हमें सोनिया सूर्यवंशी के सौजन्‍य से प्राप्‍त हुआ है। 

लोकतंत्र किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूँजी होती है, और लोकतंत्र की बुनियाद स्कूल ही है। हमने स्कूल में विद्यार्थियों की एक परिषद शुरू की। हर वर्ष सभी विद्यार्थी इस परिषद के लिए छह या सात विद्यार्थियों को चुनते हैं। फिर पूरे स्कूल का प्रबन्धन इन विद्यार्थियों के हाथ में ही रहता है। हमने स्कूलों में होने वाले कामों को तय कर दिया है जैसे स्कूल की साफ-सफाई, पीने के पानी की व्यवस्था, प्रार्थना करवाना, मेहमानों की देखभाल, स्कूल के बगीचे का रखरखाव इत्यादि, ये सभी काम विद्यार्थियों द्वारा ही देखे जाते हैं और उनके पास निर्णय लेने का अधिकार होता है।

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वृजेश सिंह

क्या आप भी दो-तीन बच्चों को पूरी क्लास समझते हैं?

मध्‍यप्रदेश के खरगोन जिले के झिरन्या विकास खण्‍ड का एक गाँव - दामफल्या। आदिवासी इलाके में जहाँ  कुछ घरों की बस्ती होती है उसे फल्या के नाम से जाना जाता है। मैं और राकेश कारपेण्‍टर बिना किसी योजना के मानो अँधेरे में तीर चलाते हुए झिरन्या से उत्तर दिशा में चैनपुर से आगे की ओर निकल जाते हैं यह सोचकर कि कोई स्कूल तो मिल ही जाएगा। और ऐसा ही हुआ भी। सड़क के दाँई ओर एक स्कूल के बाहर कुछ आदिवासी बच्चे खेलते हुए दिखाई दिए। ये बच्चे मध्यान्ह भोजन के बाद स्कूल के मैदान में खेल रहे थे। हमें देखकर कुछ ठिठके। कुछ हँसे। कुछ सहम गए। स्कूल के कमरे मे

शुरुआत अपने घर से ही करते हैं। जिस तरह घर में खाना पकाने के लिए रसोईघर और बातचीत करने, टी.वी. देखने व अन्य सामाजिक गतिविधियों के लिए बैठकखाना और सोने के  लिए शयन कक्ष का अपना महत्‍व है, उसी तरह सीखने-सिखाने के  लिए एक क्लासरूम कैसा होना चाहिए- इसका भी उतना ही महत्‍व है। अगर आपके  रसोईघर में केवल गैस हो, एक नल हो और कुछ बर्तन तो आप कितने भी रचनात्मक क्यों न हों, इससे आप क्या पका सकते हैं?

रामरतन बच्चों के बीच बैठकर पढ़ाते हैं। सारे बच्चे अपने जूते-चप्पल बाहर निकालते हैं और शिक्षक खुद भी अपने जूते कक्षा से बाहर निकालते हैं। रामरतन बताते हैं कि स्कूल वह जगह है जहाँ बच्चे को मजा आना चाहिए और अगर उसे मजा या आनन्द नहीं आएगा तो वह स्कूल मन से नहीं आएगा। बच्चे को आनन्द आए इसके लिए उन्होंने सोचा कि टी.एल.एम. से पढ़ाया जाना चाहिए। जब उनके पास संसाधन नहीं थे, तो उन्होंने शुरुआत में राखी रखने के पुष्‍टों का उपयोग कर अंक कार्ड, स्थानीय मान कार्ड, मात्रा कार्ड, अँग्रेजी के शब्द कार्ड आदि बनाए, कैमरा बनाया और उसमें अंकों और वर्णों की रील बनाकर लगाई ताकि वह बच्चों के लिए मजेदार बन सके। बच्चों के पढ़ाने के दौरान इस सामग्री का भरपूर प्रयोग किया।

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धीरेन्द्र सिंह

बच्चों का साथ अच्‍छा लगता है

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