शिक्षक

उमाशंकर पेरियोडी

यह धारणा आम है कि शिक्षक अक्‍सर स्‍कूल में अनुपस्थित रहते हैं। इससे बच्‍चों का पढ़ाई का नुकसान होता है। यह बात तो सही है कि अगर शिक्षक ही कक्षा में नहीं होगा, तो पढ़ाएगा कौन ?  हम सब भी यह मान लेते हैं कि हाँ यह सही है। पर वास्‍तव में कितने शिक्षक वाजिब कारणों से स्‍कूल में नहीं आते हैं और कितने गैरवाजिब कारणों से, इस बात पर ठहरकर गौर करने का समय सबके पास नहीं होता है। 

राजस्‍थान के टोंक जिले में अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन ने अपने शैक्षिक काम के तहत स्‍वैच्छिक शिक्षक मंचों को आरम्‍भ करवाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन शिक्षक मंचों ने शिक्षकों के विकास में किस तरह की और किस हद तक भूमिका निभाई है, इसका एक अध्‍ययन किया गया है।

यहाँ प्रस्‍तुत है इस अध्‍ययन की रिपोर्ट। देखें हो सकता है, यह आपके इलाके में आपके लिए भी मददगार हो।

ये चिट्ठी आपको उनसे बचकर रहने की सलाह के लिए लिखी जा रही है। हम नहीं चाहते हैं कि आप भी उनके चंगुल में फँसो। पहले हम आराम से थे जब वे नहीं थे। उनके आने से काम बढ़ गया है। सुबह स्कूल खोलते ही आईना बाहर रखो, उसमें अपनी शक्ल देखो, बाल सँवारो, कक्षा और उसके बाहर का आँगन साफ रखो, खुद के कमरे की लाइट और पंखें उपयोग नहीं हो तो बन्‍द करो। डस्टबिन खाली करो, रोज का कचरा रोज जलाओ। असल में उनके आने से टेंशन और मगजमारी ज़्यादा बढ़ गई है। हम सीबीआई जाँच कराना चाहते हैं कि क्या बीते महीने राज्यभर में लगे सभी हिन्‍दी वाले नए माड़साब इसी टाइप के हैं या हमारी ही किस्मत खराब थी।

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उत्‍तराखण्‍ड के दूरदराज और पहाड़ी इलाकों में शासकीय विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक शिक्षा में नए-नए नवाचार कर रहे हैं। वे अपने सीमित-संसाधनों में बच्‍चों को शिक्षित करने के प्रयासों में लगे हुए हैं।

शिक्षक में बच्चों के अकादमिक स्तर को बदलने के साथ-साथ समाज को बदलने को एक जोश/उत्साह देखा गया। शिक्षक की बातें सुनकर लगता है कि समाज में कुछ चीजों को लेकर बदलाव करना चाहते हैं। इसी पर उनके द्वारा सामाजिक क्षेत्र में जागरूकता लाने के लिए एक पहल की गई और आगे भी इसके लिए प्रयासरत हैं। शिक्षक मृत्युभोज विरोधी सत्याग्रह आन्दोलन ‘मृत्युभोज अभिशाप, समझें व समझाएँ आप’ से जुड़े हैं तथा समाज में जागरूकता व शिक्षा की अलख जगा रहे हैं।

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साल 2016 के सर्वे पर आधारित ‘असर’ की रिपोर्ट यह दावा कर रही है कि राजस्थान में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 6 से 14 साल की उम्र के बच्चों नामांकन बढ़ा है। यही रिपोर्ट यह दावा भी कर रही है कि साल 2014 की तुलना में निजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों की संख्या कम हुई है। इन दावों में अगर सच्चाई है तो इसका श्रेय सरकारी प्रयासों को तो जाता ही है, लेकिन इन प्रयासों को जमीन पर लागू करने वाले मुरारी जी और उनके साथियों जैसे हजारों शिक्षकों को भी जाता है। जो अपने स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मुफ्त की बोलरो में बैठकर निजी स्कूलों की तरफ जाने से रोकने के लिए अपनी ओर से अतिरिक्त प्रयास कर रहे हैं।

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23 से 25 मई, 2017 तक दिल्‍ली के अम्‍बेडकर विश्‍वविद्यालय दिल्‍ली में ‘स्कूली शिक्षा के बदलते परिदृश्य में अध्यापन-कर्म की रूपरेखा’ विषय पर एक तीन दिवसीय संगोष्‍ठी का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्‍न हुआ। शैक्षिक विषयों पर हिन्‍दी में वार्षिक संगोष्‍ठी शृंखला ‘शिक्षा के सरोकार’ के तहत यह पहला आयोजन अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय, बेंगलूरु तथा अम्‍बेडकर विश्‍वविद्यालय दिल्‍ली ने संयुक्‍त रूप से किया।

संगोष्‍ठी की पृष्‍ठभूमि

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