शिक्षक

दिनेश कर्नाटक उत्‍तराखण्‍ड में शासकीय शाला में शिक्षक हैं। वे एक कहानीकार भी हैं। इस नाते वे  शिक्षा और समाज के रिश्‍ते को एक अलग दृष्टि से भी देखते हैं। जब समाज की बात होती है, तो उसकी जो चुनौतियॉं और संकट हैं, वे हमारे सामने आ खड़े होते हैं। दिनेश जी ने इस वीडियो में शिक्षा और समाज के बीच की इन चुनौतियों और संकट को सामने रखने की कोशिश की है। यह वीडियो अपनी बात लोगों तक कैसे पहुँचाई जाए, इसका भी एक उदाहरण है।

यह उनके वीडियो का दूसरा भाग है।

दिनेश कर्नाटक उत्‍तराखण्‍ड में शासकीय शाला में शिक्षक हैं। वे एक कहानीकार भी हैं। इस नाते वे  शिक्षा और समाज के रिश्‍ते को एक अलग दृष्टि से भी देखते हैं। जब समाज की बात होती है, तो उसकी जो चुनौतियॉं और संकट हैं, वे हमारे सामने आ खड़े होते हैं। दिनेश जी ने इस वीडियो में शिक्षा और समाज के बीच की इन चुनौतियों और संकट को सामने रखने की कोशिश की है। यह वीडियो अपनी बात लोगों तक कैसे पहुँचाई जाए, इसका भी एक उदाहरण है।

“बदलाव अथवा परिवर्तन एक बहुत बड़ी स्थिति है, जीवन के हर क्षेत्र में समय के साथ वैचारिक एवं व्यवहारिक बदलाव आते रहते हैं। इन बदलावों का प्रभाव हमारी कार्य शैली मे स्पष्ट दिखाई देता है।’’ ऐसा मानना है राजस्‍थान के टोंक जिले के उनियारा ब्लॉक में पद स्थापित शिक्षक हंसराज जी का।

हिन्दी

यह सब मानते हैं और जानते भी हैं कि शिक्षकों का क्षमता वर्द्धन होना चाहिए। लेकिन वास्‍तव में उसके मायने क्‍या हैं ? वह कैसे किया जाता है? कैेसे किया जाना चाहिए ? कौन करेगा ? कैसे करेगा ? कब करेगा ? ऐसे तमाम सवाल हैं। इनमें से कुछ का जवाब अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के सीईओ अनुराग बेहार इस वीडियो में दे रहे हैं। 

भवानी रघुनन्दन

 फ्रांसिस कुमार

कृष्ण हरेश

2012 में बी.टी.सी. करने के पश्चात मैंने खूब विज्ञान मेले आयोजित किए। इसी बीच मुझे राजकीय प्राथमिक विद्यालय तोलिख्वा कोट, ब्लॉक कनालीछीना में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली और बच्चों के साथ, उनके परिवेश से जुड़ने का मौका मिला। इसी दौरान एक दिन मुझे डायट डीडीहाट से श्रीमती सुनीता पाण्डेय का फोन आया कि आपको मुख्य सन्दर्भदाता के प्रशिक्षण हेतु देहरादून जाना है। मैंने कहा, “मैडम मेरी उम्र तो बहुत कम है और इस क्षेत्र में अनुभव न के बराबर है, मैं कैसे कर पाऊँगा।” उनका जवाब सुन मैं भौंचक्का रह गया। वे बोलीं, “तुम्हारी पहचान उम्र से नहीं तुम्हारे काम से है। तुम्हारी इस कला को जिले के शिक्षकों के बीच पहुँचाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा, तैयार हो जाओ।”

हिन्दी

गिजु भाई बधेका भारत के प्रथम प्रयोगशील शिक्षक कहे जाते हैं। उनका जन्‍म 15 नवम्‍बर 1885 में हुआ था। उनकी कर्मभूमि गुजरात के भावनगर के करीब रही है। 1939 में जून में उनका निधन हो गया था।

बच्‍चों के साथ विद्यालय में उन्‍हाेंने जो काम किया, वह उनके द्वारा लिखी गई कई सारी किताबों के रूप में सामने अाया है। उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब है 'दिवास्‍वप्‍न' । इस किताब में एक प्रयोगशील शिक्षक समाज और व्‍यवस्‍था से किस तरह संघर्ष करता है, उसका विवरण दर्ज है।

मनोज उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं, ‘‘मेरे दिमाग में तूफान मचा हुआ था। मैं कारण जानना चाह रहा था कि आखिर क्यों अभिभावक बच्चों का नामांकन नहीं करवा रहे हैं। बहुत कोशिश करने के बाद भी विद्यालय का नामांकन 71 तक जा सका। मैं उन कारणों की तह तक जाना चाहता था। बस फिर, एक दिन जैसे बिजली चमकी, पथ का अंधकार छंटा और मुझे मेरा रास्ता बिल्कुल साफ-साफ दिखाई देने लगा। मैंने निर्णय लिया कि अब अभिभावक सम्पर्क का यह औपचारिक तरीका बदलना होगा। मैं विद्यालय समय से एक घण्‍टे पहले आऊँगा और एक घण्‍टे बाद जाऊँगा और गाँव के लोगों से खुलकर बातचीत करूँगा। स्वाभाविक था कि यह समय मैं अपने परिवार के हिस्से से काटने वाला था तो मैंने अपनी पत्नी श्रीमती रीना सेनानी से बात करना उचित समझा। मैं थोड़ा असहज और डरा हुआ था कि पता नहीं उनकी क्या प्रतिक्रिया हो पर उनके सकारात्मक उत्तर ने मुझे ऊर्जा और मजबूती प्रदान कर दी।’’

हिन्दी

पृष्ठ

19281 registered users
7632 resources