विज्ञान

राष्‍ट्रीय विज्ञान दिवस पर कुछ करें न करें, अरविन्‍द गुप्‍ता को जरूर सुना जाना चाहिए। इस बरस उन्‍हें पद्मश्री से सम्‍मानित किया गया है। उनसे बेहतर विज्ञान का प्रचारक शायद ही आज कोई हो। वे केवल विज्ञानकर्मी नहीं हैं, उनमें एक चिंतक और सजग शिक्षाविद भी है।

विज्ञान के दो घटक होते हैं - एक ज्ञान का संगठन (विषय वस्तु), और दूसरा, वह प्रक्रिया जिसके द्वारा उस ज्ञान का उत्पादन किया जाता है। विज्ञान के इस दूसरे घटक ‘वैज्ञानिक प्रक्रिया’ से हमें सोचने और दुनिया के बारे में जानने के एक तरीके की समझ मिलती है। लेकिन आमतौर पर, हम केवल विज्ञान का ‘ज्ञान का संगठन’ घटक देखते हैं। वैज्ञानिक अवधारणाएँ हमारे सामने एक कथन के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं जैसे - पृथ्वी गोल है, इलेक्ट्रॉनों पर ऋणात्मक आवेश पाया जाता है, हमारे आनुवंशिक कोड हमारे डीएनए में निहित हैं, ब्रह्माण्ड 13.7 अरब साल पुराना है। लेकिन

मैं जयपुर के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, नृसिंहपुरा महल में पिछले कुछ दिनों से जा रही थी। वहाँ बच्चों के साथ विज्ञान में कुछ काम करने का प्रयास कर रही थी। विज्ञान विषय का अध्ययन करते समय हम बच्चों में कुछ क्षमताओं के बारे में बात करते हैं- जैसे अवलोकन, दर्ज करना, वर्गीकरण, व्याख्या करना, प्रयोग करना, निष्कर्ष निकालना आदि। इसी को आधार बनाते हुए मैंने बच्चों के साथ एक खेल खेलने का विचार किया। मैंने अपने थैले में नाना प्रकार की चीजों को एकत्रित कर लिया। इनमें पेंसिलें, पेन, रबर, कागज, एल्युमिनियम फोइल, कटोरी, चाबी, पत्ते, फ़ूल, लकड़ी

"जुगनू क्यों चमकता है , किया उसके पास छोटी सी टोर्च होती है? या आग? जुगनू के अंडे और बच्चे भी किया इसी तरह चमकते हैं? किया अगर हम जुगनू को छूएंगे तो हाथ जल जाएंगे?" 

सुशील जोशी

अवलोकन-आधारित दुनिया

सुशील जोशी

माध्‍यमिक विज्ञान कक्षाओं में विद्यार्थियों के शिक्षण की प्रगति किस तरह हो रही है, अगर उसका आकलन करना हो तो कैसे करेंगे। यह वीडियो इसका एक उदाहरण है।

पिछले कुछ समय से विभिन्न प्रशिक्षणों व कार्यशालाओं में सतत् एवम् व्यापक मूल्यांकन की अवधारणा पर चर्चा होती रही है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या-2005 की संस्तुतियों से इस विचार को बल मिला है। सामान्यतः हम सभी मूल्यांकन प्रक्रिया को प्राप्त दिशा-निर्देशों के अनुसार सम्पन्न करते रहते हैं लेकिन मूल्यांकन व शिक्षण हेतु बार-बार पुनः सोचने समझने की आवश्यकता है। पूर्व में शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में समझा जाता था कि शिक्षक सर्वज्ञाता है, शिक्षक एक ज्ञान से भरा बर्तन है और विद्यार्थी एक खाली बर्तन है या कोरी स्लेट है जिसे शिक्षक को अप

मुकेश मालवीय

बाड़मेर में विज्ञान मेले का आयोजन किया जाना था।  इसकी तैयारी ग्‍यारह दिन पहले शुरू की गई। इस दौरान जो अनुभव हुए उन्‍हें मैंने दिनवार दर्ज करने की कोशिश की है।

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