विज्ञान शिक्षा

लर्निंग कर्व हिन्दी अंक 1 दिसम्बर,2009 : विज्ञान शिक्षा पर केन्द्रित अंक

व्यापक मुद्दे
एनसीएफ के तरीके से विज्ञान सीखना * इन्दु प्रसाद
ज्वलंत प्रश्न और उनमें छिपी ज्ञान की लौ * कृष्णन बाल सुब्रह्मणयम
वैज्ञानिक सोच का विकास * दिलीप रांजेकर

13,14एवं 15 अक्‍टूबर,2018 को मोहाली में'विज्ञान एवं विज्ञान शिक्षा' पर संगोष्‍ठी आयोजित की गई थी। इस संगोष्‍ठी का आयोजन अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय, बेंगलूरु एवं भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान मोहाली,पंजाब ने मिलकर किया था। संगोष्‍ठी हिन्‍दी तथा पंजाबी में भाषाओं में थी।

इस संगोष्‍ठी में प्रस्‍तुत हिन्‍दी परचों के एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट की एक पुस्तिका इस अवसर पर जारी की गई। इन एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट को पढ़कर इस बात का अन्‍दाजा लगाया जा सकता है कि संगोष्‍ठी में किन विषयों पर विमर्श हुआ।

इस लेख में यह दिखाने का प्रयत्न किया गया है कि बच्चों के लिए विज्ञान करने का तरीका सीखना अधिक लाभकर है बनिस्बत इसके कि वे दूसरों के द्वारा निकाले या बताए तथ्य, व्यापकीकरण, धारणाएँ, सिद्धान्त और नियम सीखें। अर्थात् बच्चों के लिए विज्ञान के बारे में जानने से बेहतर है कि वे विज्ञान करें। लेकिन विज्ञान करने का अर्थ क्या है? बच्चे ‘विज्ञान करने’ के लिए दरअसल, करेंगे क्या? इन्हीं प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ने के लिए हम ‘विज्ञान की प्रक्रियाओं’ पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे।

हृदय कान्‍त दीवान हाल के दिनों में बच्चों के सीखने की प्रक्रिया के बारे में विमर्श इस बात की तरफ मुड़ा है कि सीखना पुराने ज्ञान व समझ के आधार पर ही हो सकता है। यह बात भी मानी जा रही है कि कक्षा में बच्चों को सोचने व अपने विचार व्यक्त करने का मौका होना चाहिए। यह आवश्यक है कि सिखाने की प्रक्रिया में गहराई से सोचने, विश्लेषण करने, अपना मत बनाने व विचारों को अपने शब्दों में व्यक्त करने के लिए पर्याप्त मौके हों और इन सभी पहलुओं में

स्‍कूल में विज्ञान शिक्षा कैसी हो..यह सवाल शिक्षकों,शिक्षाविदों तथा शिक्षा में काम करने वाले लोगों को लगातार सताता रहा है। इस सवाल को लेकर बहुत विमर्श भी हुआ है।
मध्‍यप्रदेश में 1972 से 2002 तक माध्‍यमिक विद्यालयों में चले होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम में इस सवाल के बहुत सारे उत्‍तर सामने आते हैं।

स्‍कूल में विज्ञान शिक्षा कैसी हो..यह सवाल शिक्षकों,शिक्षाविदों तथा शिक्षा में काम करने वाले लोगों को लगातार सताता रहा है। इस सवाल को लेकर बहुत विमर्श भी हुआ है।
मध्‍यप्रदेश में 1972 से 2002 तक माध्‍यमिक विद्यालयों में चले होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम में इस सवाल के बहुत सारे उत्‍तर सामने आते हैं।

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मध्‍यप्रदेश में 1972 से 2002 तक माध्‍यमिक विद्यालयों में चले होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम में इस सवाल के बहुत सारे उत्‍तर सामने आते हैं।

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मध्‍यप्रदेश में 1972 से 2002 तक माध्‍यमिक विद्यालयों में चले होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम में इस सवाल के बहुत सारे उत्‍तर सामने आते हैं।

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