राजस्‍थान

कभी बच्चों को विद्यालय के निर्धारित गणवेश में आने को लेकर बाध्य नहीं किया। बच्चे जिस भी प्रकार के कपड़ों में आते, उस पर टीका-टिप्पणी करने की बजाय वे बच्चों के साथ क्या काम करना चाहिए, इस पर ध्यान देते। आरम्भ में जब कोई बच्चा देर से भी (जैसे - लंच के बाद भी) विद्यालय आता तो वे उसे वापिस जाने को नहीं कहते बल्कि वे उसे कक्षा में बैठने की अनुमति देते।बच्चों का पढ़ाने के लिए उन्होंने सीधे पाठ्यपुस्तकों का उपयोग न करते हुए अन्य संसाधनों और गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को सिखाने की कोशिश की।

हिन्दी

इस बार ग्रीष्मकालीन शिक्षक प्रशिक्षण में भाग लेने गया तब मेरी मुलाक़ात एक बहुत जुझारू शिक्षक बिरमपुरी जी से हुई। प्रशिक्षण में उनकी सहभागिता और उनके स्कूल में किए गए कामों के उदाहरण किसी को भी प्रेरित कर सकते थे। मैं भी बहुत प्रभावित हुआ और उनके उदाहरण को लेते हुए मैंने दो पेज लिखे और उनके सामने रखे कि अगर इसमें कोई त्रुटि हो तो आप सही करके कल दे दीजिएगा। अगले दिन वह मुझे छह पेज देते हैं जो उन्होंने ख़ुद लिखे थे अपने साथी शिक्षकों की मदद से, अपने स्कूल में जो जो काम अभी तक किया है उसके बारे में।

हिन्दी

कक्षा पाँच एक समूह में बैठी हुई थी, जहाँ शिक्षक स्वयं काम कर रहे थे। वे बच्चों को कल दिए गए गृहकार्य को जाँचते हुए उन्हें आगे के लिए काम दे रहे थे। इसी दौरान अन्य कक्षाओं में (प्रत्येक समूह में) एक-एक बच्चा (लड़के-लड़की दोनों) बारी-बारी से सभी बच्चों की कॉपियाँ देख रहे थे। इस दौरान वे कॉपियों में की हुई गलतियों पर निशान लगाते हुए सम्‍‍बन्धित बच्चे से उस पर बात कर रहे थे और उसे बता रहे थे कि उसने क्या-क्या गलतियाँ की हैं। बच्चे अपनी गलतियाँ ठीक कर रहे थे। जिन बच्चों ने सही काम किया हुआ था, उन्‍हें आगे का काम दिया जा रहा था। कॉपियाँ जाँचने वाले बच्चे अपने अनुभव से यह काम करते हुए दिखाई दे रहे थे। इसमें प्रथम दृष्ट्या शिक्षक के किसी निर्देश का आभास नहीं हो रहा था।

हिन्दी

स्कूल के शिक्षकों का अधिकतर समय बच्चों के साथ में व्यतीत होता है। बच्चे निसंकोच अपनी बातें सभी शिक्षकों के साथ कर लेते हैं। अभिभावक स्कूल में हो रहे शिक्षण कार्य से संतुष्ट नजर आते हैं। एक स्कूल के बारे में अगर ऐसा कुछ कहा जा रहा है, तो यह साफ है कि वह आज के परिदृश्‍य में एक ठीक-ठाक स्कूल है। लेकिन अगर किसी स्कूल में ऐसा कुछ हो भी रहा है, तो उसके कुछ कारण भी अवश्‍य होते हैं।

हिन्दी

गाँव वालों का कहना है की यहाँ के शिक्षक बहुत ही अच्छे हैं और विद्यालय हमेशा साफ सुथरा रहता है। लोग स्कूल को अपना समझते हैं। छुट्टी के दिन भी बच्चे स्कूल में आकर झूला झूलते हैं, खेलते हैं। पूछने पर बच्चे कहते हैं कि उन्हें घर से अच्छा स्कूल ही लगता है।

हिन्दी

बगीचे में लगा पपीते का पेड़ फलों से लदा है। छोटी-छोटी बनी क्यारियों में गुजराती केले के पौधे लगे हैं जिनमें फल आना शुरू हो गया है। पीपल का पेड़ अब काफी बड़ा हो चुका है। बच्चों ने चिडि़यों को पानी पिलाने के लिए एक बर्तन टांग दिया है। वे रोज इसमें पानी डालते हैं। गुलाब की कलम तैयार करके और भी पौधे तैयार किए जा रहे हैं। बालू लाल जी बताते हैं कि इन सब कामों में बच्चे और शिक्षक मिलकर योगदान देते हैं। आसपास के सात-आठ स्कूलों के शिक्षक यहाँ से ही पौध ले जाकर अपने स्कूलों में लगाते हैं।

हिन्दी

गाँव के शिक्षक पालक संघ के उपाध्यक्ष बद्रीलाल जी पेशे से किसान हैं। आज से 32 साल पहले वे भी इसी स्कूल में पढ़ते थे। तब यहाँ सिर्फ एक मास्टर जी पाँचवी तक की कक्षा पढ़ाया करते थे। उन्हाेंने बताया कि सन 1972 में गाँव के लोगों ने ही आपस में चन्दा करके यह स्कूल शुरू किया था। इतने सालों में आज यह स्कूल आठवीं कक्षा तक हो गया है, और अब यहाँ सात शिक्षक नियुक्त हैं। बद्रीलाल जी की बेटी भी इसी स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ रही है।

हिन्दी

जब किसी कार्य को पूरी मेहनत व लगन से किया जाए तो उस कार्य में सफलता अवश्य हासिल होती है। अध्ययन कार्य करवाते समय हमें समस्त बच्चों का सहयोग लेते हुए एवं बच्चों की भावना को समझते हुए शिक्षण कार्य करवाना चाहिए।

हिन्दी

मेरा यह मंतव्य है कि यदि शिक्षक चाहे तो विद्यार्थियों को बहुत ही योग्‍य बना सकता है। कहते हैं कि जिस शिक्षक का लक्ष्य स्पष्ट है उसको सफलता मिलना असम्भव नहीं है।

हिन्दी

मेरा मानना है कि ‘‘बेहतर प्रयासों से शिक्षक निर्धारित शैक्षिक उद्देश्‍यों को सरलता से प्राप्त कर सकता है।’’ मैंने विद्यालय के विद्यार्थियों के शैक्षिक कार्य को रुचिपूर्ण और सरल बनाने के लिए एल.जी.पी. तथा स्वैच्छिक शैक्षिक मंच की मासिक कार्यशाला में बताए सीखने-सिखाने के बेहतर तरीकों को अपनाया।

हिन्दी

पृष्ठ

17659 registered users
6703 resources