पुस्‍तकालय

हम शिक्षा को सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण जरिया मानते हैं। शिक्षा वो जो सोचने-समझने और अभिव्यक्त करने का कौशल विकसित करे। जो रटे रटाए प्रश्न-उत्तरों से हटकर हो, जो ज्ञान को अपने आसपास की दुनिया से जोड़कर देखने की समझ विकसित करे। इसके लिए जरूरी है बच्चों से संवाद हो, उनकी बात सुनी जाए, उनकी राय ली जाए। इसके लिए जरूरी है बच्चों को अहमियत दी जाए, उनसे संवाद हो, उनकी बात सुनी जाए, उनकी राय ली जाए। हमारा यह भी मत है कि वर्तमान स्कूली तंत्र में इसकी गुंजाईश कम है। बच्चों के व्यक्तित्व और शैक्षणिक विकास में खेलों और कलाओं के महत्व को भी हम समझते हैं, साथ ही यह भी जानते हैं कि निर्धन परिवार के बच्चों को स्कूल की किताबों के अलावा अन्य किताबें देखने-पढ़ने को नहीं मिलती हैं। पालकों की गरीबी के अलावा इन मुद्दों पर उनकी अनभिज्ञता भी बच्चों को छोटी-छोटी चीजें जैसे कागज, पेन्सिल, कलर आदि से वंचित रखती है।

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शुरुआत अपने घर से ही करते हैं। जिस तरह घर में खाना पकाने के लिए रसोईघर और बातचीत करने, टी.वी. देखने व अन्य सामाजिक गतिविधियों के लिए बैठकखाना और सोने के  लिए शयन कक्ष का अपना महत्‍व है, उसी तरह सीखने-सिखाने के  लिए एक क्लासरूम कैसा होना चाहिए- इसका भी उतना ही महत्‍व है। अगर आपके  रसोईघर में केवल गैस हो, एक नल हो और कुछ बर्तन तो आप कितने भी रचनात्मक क्यों न हों, इससे आप क्या पका सकते हैं?

सच में अगर एक स्कूल शिक्षक चाहे और बच्चों पर भरोसा करे तो बन्द अलमारी के बजाय, खुली रैक में भी स्कूल पुस्तकालय संचालित किया जा सकता है।

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ब्लॉक गतिविधि केन्द्र,निवाई,टोंक में बच्चों के लिए एक बालपुस्तकालय है। इसमें 15 से 20 बच्चे प्रतिदिन आते हैं और बालपुस्तकालय की किताबें पढ़ते हैं। इन बच्चों के साथ समय-समय पर सृजनात्मक गतिविधियाँ भी हम करते हैं। इनमें बच्चों के साथ ही शिक्षक भी शामिल होते हैं। 

स्कूल का पुस्तकालय किताबों का स्टोर मात्र नहीं है। न ही वे काँच वाली आलमारी में सिर्फ सजाया जाने वाला सामान। स्कूल का पुस्तकालय बच्चों और शिक्षकों का एक ऐसा साझा मंच होना चाहिए जहाँ वे साथ मिल बैठकर किताबों को पढ़ने, चर्चा करने, नई किताबें बनाने, फट चुकी किताबों को ठीक करने का काम साझा रूप से करते हों। पुस्तकालय को स्कूल के किसी कमरे के कोने में खोलने का आशय उसे स्कूल की गतिविधियों से किनारे करना नहीं

सम्‍भव है कि पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए कोई एक तयशुदा अकादमिक तरीका हो सकता है। पर यह बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि बच्‍चे के आसपास किस तरह के संसाधन मौजूद हैं।


स्‍कूल में हिन्‍दी की वर्णमाला सीख ली थी, लिखना भी और पढ़ना भी। यह सत्‍तर का दशक था। तब स्‍कूल की गिनी-चुनी चार-पाँच किताबों के अलावा छपी हुई कोई और सामग्री आसपास नहीं होती थी। अगर कुछ थी तो वह अखबार था।

'रूम टू रीड' भारत सहित एशिया और अफ्रीका के दस देशों में लगभग पिछले डेढ़ दशक से इस बात के लिए प्रयासरत है कि बच्चे स्कूल में पढ़ना-लिखना सीख सकें और शिक्षा में लड़कियों की समुचित भागीदारी हो।

भाषा शिक्षण का उपयोग सिर्फ पढ़ने-लिखने तक ही सीमित नहीं बल्कि पढ़कर समझना, विचारना, योजना बनाना, कल्पना करना, अपने मन की बात साझा करना, तर्क देना, चर्चा-परिचर्चा में प्रतिभाग करना आदि बहुत-सी अन्य दक्षताएँ भी भाषा शिक्षण का ही अंग होती हैं। जिन पर सामान्य स्थिति में हम अपना ध्यान केन्द्रित नहीं करते। सही शब्द, भाव, भाव सम्‍प्रेषण के अभाव में हम अपनी बात स्पष्टता व दृढ़ता से दूसरों तक नहीं पहुँचा पाते हैं। चूँकि हम अपने अनुभवों के आधार पर चीजों को देखते-परखते व सम्‍प्रेषित करते हैं इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हम किसी स्थि

आजकल लगभग हर विद्यालय में छोटा-मोटा पुस्‍तकालय तो होता ही है। उसमें किताबें भी होती हैं। लेकिन कई बार हमें यह समझ नहीं आता है कि उसका उपयोग कैसे करें या कि बच्‍चों में पुस्‍तकालय के प्रति रूचि कैसे पैदा करें।

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