नवाचार

भोपाल में शिक्षकों का रचनात्‍मक मैत्री समूह 'शिक्षक सन्‍दर्भ समूह' नाम से कार्यरत है। इस समूह ने 104 विभिन्‍न शिक्षकों की शैक्षिक यात्रा तथा उनके शैक्षिक अनुभवों को एकत्र किया है। इन्‍हें एड एट एक्‍शन तथा अन्‍य संस्‍थाओं की मदद से एक किताब का रूप दिया गया है। इसका नाम है 'शिक्षकों की शैक्षिक यात्रा'।

किताब की पीडीएफ यहाँ उपलब्‍ध है

बच्चे स्वभाव से चंचल ही होते हैं। यह उनका नैसर्गिक गुण है। चंचलता के बिना बचपन भी क्या बचपन रह जाता है। सबको बच्‍चों की चंचलता लुभाती भी है और वे भी सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर ही लेते हैं। परन्तु उनकी यही चंचलता एक शिक्षक के लिए परेशानी का सबब बन जाती है और उसके लिए सिखाने में बाधा भी। क्यूँकि इसी चंचलता के कारण बच्चे कक्षा में ध्यान स्थिर नहीं कर पाते और शिक्षक कई बार उनके ध्यान को स्थिर करने के लिए भय

सबको 'थ्री इडियट' फिल्‍म याद होगी। फिल्‍म में एक फुंसुक वांगडू नामक चरित्र का चित्रण है। कहा जाता है कि यह सोनम वांगचुक से प्रेरित है।  लेकिन खुद सोनम का कहना है कि वह उनकी कहानी नहीं है। बहरहाल सोनम लद्दाख में 'सेकमोल' नामक एक स्‍कूल चलाते हैं, जिसे फेल होने वालों का स्‍कूल कहा जाता है। सोनम वांगचुक को 2018 का रेमन मैग्‍सेसे पुरस्‍कार दिया गया है। यह पुरस्‍कार एशिया का नोबेल पुरस्‍कार माना जाता है।

भागेन्द्र सिंह नेगी

भागेन्द्र सिंह नेगी

 फ्रांसिस कुमार

भोपाल का आनन्‍द निकेतन लोकतांत्रिक स्‍कूल पिछले कई सालों से अपने नवाचारों के लिए जाना जाता रहा है। यह अन्‍य स्‍कूलों से कैसे अलग है, यह जानने की जिज्ञासा हर सुनने वाले के मन में होती है। भोपाल दूरदर्शन ने इस स्‍कूल की गतिविधियों पर एक छोटी सी फिल्‍म बनाई है। फिल्‍म में स्‍कूल के उस समय के कर्ता-धर्ता प्रमोद मैथिल से बातचीत भी की है। देखें, सम्‍भव है आपको भी कुछ नए विचार मिलें।

यह वीडियो है गणित की नवाचारी शिक्षिका रश्मि कथूरिया से साक्षात्‍कार का। वे 2016 के सर्वश्रेष्‍ठ ग्‍लोबल टीचर अवार्ड के पहले पचास दावेदारों में एक रही हैं। 2007 में उन्‍हें पूर्व राष्‍ट्रपति अब्‍दुल कलाम आजाद के हाथों सर्वश्रेष्‍ठ ई-टीचर का सम्‍मान भी मिला है।

वे मानती हैं कि गणित के शिक्षण में टैक्‍नोलॉजी का उपयोग किया जाना चाहिए। वे स्‍वयं कक्षा-कक्ष में गणित के शिक्षिण में विभिन्‍न तरह की टैक्‍नोलाॅजी का उपयोग करती हैं, जिनमें उनका अपना ब्‍लाग भी शामिल है।

गुजरात की एक निजी उच्‍च प्राथमिक शाला में शिक्षिका संगीता ने यह देखा कि छठवीं के बच्‍चों में भी पढ़ने का कौशल उतना अच्‍छा नहीं है,जितना की होना चाहिए। तो उन्‍होंने उसे बढ़ाने के लिए एक नवाचारी तरीका खोजा। वह तरीका क्‍या है, यही यह वीडियो बताता है। 

मुझे नहीं लगता कि एक शिक्षक कक्षा में तभी विद्यार्थियों के साथ नवाचार कर सकेगा, जब उसके पास अत्याधुनिक संसाधन हों। यह कहना भी सही नहीं है कि संसाधनों के होने पर ही सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को तीव्र किया जा सकता है। यदि खुद पर और विद्यार्थियों का हौसला बढ़ाने का नजरिया हो तो विद्यार्थी पढ़ना-लिखना सीखने की प्रक्रिया में आनन्‍द तो लेते हैं।

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