टोंक

इस बार ग्रीष्मकालीन शिक्षक प्रशिक्षण में भाग लेने गया तब मेरी मुलाक़ात एक बहुत जुझारू शिक्षक बिरमपुरी जी से हुई। प्रशिक्षण में उनकी सहभागिता और उनके स्कूल में किए गए कामों के उदाहरण किसी को भी प्रेरित कर सकते थे। मैं भी बहुत प्रभावित हुआ और उनके उदाहरण को लेते हुए मैंने दो पेज लिखे और उनके सामने रखे कि अगर इसमें कोई त्रुटि हो तो आप सही करके कल दे दीजिएगा। अगले दिन वह मुझे छह पेज देते हैं जो उन्होंने ख़ुद लिखे थे अपने साथी शिक्षकों की मदद से, अपने स्कूल में जो जो काम अभी तक किया है उसके बारे में।

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ओमप्रकाश जब इस स्कूल में आए, तब कुछ ही दिनों के अनुभवों में उन्होंने पाया कि अभिभावक बच्चों की ओर कोई खास ध्यान नहीं देते हैं। इसके साथ ही दो विशेष बातों पर भी उनका ध्यान गया। एक, गाँव के सभी लोग बाल विवाह पर एकमत हैं। दो, लड़कियों को पढ़ाने पर रुझान नहीं के बराबर है।

गाँव की अधिकतर लड़कियाँ कक्षा पाँच में भी नहीं पहुँच पाती हैं और जो पहुँच भी जाती हैं, वे भी कक्षा पाँच से आगे नहीं पढ़ पाती हैं। गाँव की लगभग 90 प्रतिशत आबादी धाकड़ और जाट समुदाय की है और बाकी 10 प्रतिशत में मंसूरी, भील, लुहार आते हैं। इन दोनों ही बातों के संदर्भ में आज की स्थिति पर नजर डालें तो आज गाँव में एक भी लड़की ऐसी नहीं है, जिसने कम से कम कक्षा आठ तक पढ़ाई न की हो। लगभग 30 बालिकाएँ ऐसी हैं जो गाँव से तीन किलोमीटर दूर स्थित बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय, बासू में अध्ययनरत हैं। कुछ बालिकाएँ ऐसी भी हैं जो दसवीं से आगे भी पढ़ रही हैं। बालविवाह के प्रति समुदाय के नजरिये में भी बदलाव आया है।

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स्कूल के शिक्षकों का अधिकतर समय बच्चों के साथ में व्यतीत होता है। बच्चे निसंकोच अपनी बातें सभी शिक्षकों के साथ कर लेते हैं। अभिभावक स्कूल में हो रहे शिक्षण कार्य से संतुष्ट नजर आते हैं। एक स्कूल के बारे में अगर ऐसा कुछ कहा जा रहा है, तो यह साफ है कि वह आज के परिदृश्‍य में एक ठीक-ठाक स्कूल है। लेकिन अगर किसी स्कूल में ऐसा कुछ हो भी रहा है, तो उसके कुछ कारण भी अवश्‍य होते हैं।

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कुछ ही समय में शिक्षिका द्वारा समुदाय के लोगों से किया गया सतत सम्‍पर्क और आजमाए गए तरीकों का असर नजर आने लगा। दोनों ही समुदाय से कुछ बच्चों ने स्कूल में दाखिला लिया। इन बच्चों को स्कूल आता देख कुछ और अभिभावकों ने भी अपने बच्चों को विद्यालय भेजना प्रारम्भ किया। आज की स्थिति में सत्र 2013-14 में विद्यालय में 69 बच्चे नामांकित है और इनमें 28 बालिकाएँ हैं।

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शिक्षक ने पालकों के साथ जिस तरह से बातचीत की पालकों को बात करने के मौके दिए उनकी भावनाओं का सम्मान किया व उनकी बातें सुनी। शिक्षक के इस तरीके ने मुझे काफी प्रभावित किया। इस शिक्षक के बारे में और जानने समझने की मेरे मन में जिज्ञासा पैदा हुई।

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बच्चे और शिक्षक अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल करके प्रात:कालीन सभा ( morning assemblies)  को कैसे दिलचस्प बना सकते हैं। सुनिए अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल,टोंक की शिक्षिका ललिता यदुवंशी की जुबानी। 

टोंक में आयोजित एक कार्यशाला के दौरान श्रीपर्णा तम्‍हाणे और राजकिशोर ने ललिता से बातचीत की।

अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन न्याय व समतापूर्ण समाज के निमार्ण की जिस मुहिम में जुटा है, उसमें शिक्षा की भूमिका को केन्द्रीय माना जा रहा है। संस्थान का मानना यह है कि शिक्षा ही एक ऐसा उपकरण है जिसके द्वारा सामाजिक बदलाव किया जा सकता है। इसी अवधारणा के तहत वर्ष 2012-13 से देश के चार राज्यों (कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड और राजस्थान) में कुल छह स्कूल संचालित किए जा रहे हैं। इनमें से दो राजस्थान के टोंक व सिरोही में हैं।

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धतुरी रामनगर स्कूल भी एक सरकारी स्कूल ही है और इस स्कूल को भी शासन द्वारा वही सुविधाएँ प्राप्त हैं जो अन्य स्कूलों को मिलती हैं। लेकिन यहाँ सिर्फ अलग है तो इस स्कूल का प्रबन्धन व स्कूल के शिक्षकों का साझा प्रयास जो इसे खास बनाता है। जिसका असर स्कूल के वातावरण व शैक्षणिक स्तर पर दिखाई देता है।

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लोकेश स्कूल आने के लिए अपनी मोटर साइकिल का उपयोग करते हैं। यह मोटर साइकिल भी बच्चों को बुलाने में उनकी मदद करती है। लोकेश जैसे ही गाँव में पहुँचते हैं वे अपनी मोटर साइकिल का हॉर्न बजाना शुरु कर देते हैं। हॉर्न की आवाज सुनकर बच्चे समझ जाते हैं कि गुरुजी आ गए हैं। बच्चे घर से अपना बस्ता लेकर गुरुजी की गाड़ी के पीछे-पीछे दौड़े चले आते हैं। लोकश भी बच्चों के घर के बाहर जाकर हॉर्न बजाते हैं और अगर कोई बच्चा हॉर्न की आवाज सुनकर बाहर नहीं आता है तो उनके घर वालों से बच्चे के बारे में जानकारी लेते हैं।

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मेरा यह मंतव्य है कि यदि शिक्षक चाहे तो विद्यार्थियों को बहुत ही योग्‍य बना सकता है। कहते हैं कि जिस शिक्षक का लक्ष्य स्पष्ट है उसको सफलता मिलना असम्भव नहीं है।

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