छत्‍तीसगढ़

अज़ीम प्रेमजी फाण्‍डेशन, धमतरी, छत्‍तीसगढ़ ने यह पुस्तिका प्रकाशित की है। इस पुस्तिका में छत्‍तीसगढ़ के धमतरी तथा कुछ अन्‍य जिलों के शिक्षकों के शैक्षिक प्रयासों की 16 कहानियाँ हैं।

इन कहानियों को लिपिबद्ध करने के लिए फाण्‍उडेशन के विभिन्‍न साथियों ने इन जिलों के स्‍कूलों का दौरा किया है,शिक्षकों के काम को नजदीक से देखा है, उनसे चर्चा की है।

कहानियाँ पढ़ें , हो सकता है आप भी ऐसा ही कुछ कर रहे हों।

गाँव वाले आज भी स्कूल के नाम पर अन्नघट योजना चला रहे हैं। जिसके अन्‍तर्गत वे एक घड़े में रोज एक मुट्ठी चावल डालते हैं। इस तरह से महीने में कम से कम एक किलो चावल और 10 रुपये एक परिवार से आता है। हर महीने 30-35 किलो चावल और दो ढाईसौ रुपए जमा हो जाते हैं। स्कूल में जो छोटे-मोटे काम होते हैं वह इस पैसे से कर लेते हैं, जैसे बागवानी के लिए पाइप खरीदना था वह इससे खरीद लिया। इस तरह से गाँव वालों का यह सहयोग और भागीदारी बनी हुई है।

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‘यहाँ ज्‍यादातर ग्रामीण; गरीब किसान, खेतिहर मजदूर और दिहाड़ी मजदूर हैं। जब मैं इस स्कूल में आई तब यहाँ 37 बच्चे आते थे। स्कूल का समुदाय के साथ कोई समन्‍वय नहीं था। गाँव वाले भी स्कूल के मामले में सहयोग नहीं करते थे और हमसे मिलते-जुलते भी नहीं थे। जाहिर है जब पालक ही जागरूक नहीं हैं तब बच्चों की शिक्षा को लेकर वे कितने सजग होंगे। तो मैंने भी ठान लिया कि जब तक गाँव वालों को स्कूल से जोड़ नहीं लूँगी, तब तक चैन से नहीं बैठूँगी।' यह संकल्‍प था मोटवाड़ा प्राथमिक स्‍कूल की प्रधान शिक्षिका अनुसुइया देवी जैन का।

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‘‘अभी गाँव वालों से हमारा रिश्ता बहुत ही औपचारिक है उसमें आत्मीयता नहीं होती है। अभी जब हम गाँव में आते-जाते हैं तो लोग हमें सर नमस्ते जरूर कहते हैं। पर जब हम कुछ बोलते हैं तो वह सोचते हैं कि सरकारी आदमी हैं, ऐसा बोलते रहते हैं, पर कुछ करते नहीं है। इस सोच को अब हमें अपने काम के जरिये बदलना है।” सोनू राम कश्यप, प्रधान शिक्षक, नवीन प्राथमिक शाला, अटारगुड़ा, पोटानार,बस्‍तर,छत्‍तीसगढ़।

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