कहानी

मनोहर चमोली  'मनु' शिक्षक हैं। उत्‍तराखण्‍ड के पहाड़ों में रहते हैं। वे बच्‍चों के लिए कहानियाँ भी लिखते हैं। छोटे बच्‍चों के लिए लिखी गई उनकी एक कहानी 'चलता पहाड़' को रूम टू रीड ने चित्रकथा के रूप में प्रकाशित किया है। उसकी पीडीएफ यहाँ से ली जा सकती है।

मुंशी प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध कहानी है 'सवा सेर गेहूँ'। विभिन्‍न राज्‍यों के स्‍कूलों की पाठ्यपुस्‍तकों में शामिल है। यह उसी कहानी का फिल्‍मांकन है। विद्यार्थियों के बीच इसका प्रदर्शन किया जा सकता है। कहानी ग्रामीण जनजीवन को चित्रित करती है। सवा सेर गेहूँ के बदले कैसे एक ग्रामीण पंडित का बंधुआ मजदूर बन जाता है।

मनोहर चमोली 'मनु'

अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन पौड़ी, उत्‍तराखण्‍ड के सभागार में 23 सितम्‍बर,2017 शनिवार की शाम ‘शिक्षण में कहानियों का सन्दर्भ’ पर चर्चा के नाम रही। प्रख्यात रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी, शिक्षा के अध्येता, बालमन के जानकार, छायाकार, फिल्म निर्माता और साहित्यकर्मी सुभाष रावत ने कहानियों के संदर्भ में बेहद कारगर और छुई-अनछुई बातों को रेखांकित किया।

हर बरस 31 जुलाई को कथा सम्राट प्रेमचन्‍द का जन्‍मदिन होता है। प्रेमचन्‍द ऐसे कथाकार रहे हैं, जिनकी कहानियॉं प्राथमिक कक्षाओं से लेकर महाविद्यालय तक विभिन्‍न कक्षाआें में पढ़ाई जाती हैं। ईदगाह,पंच परमेश्‍वर,कफन,पूस की रात, नमक का दरोगा, बड़े भाई साहब आदि ऐसी ही कहानियाँ हैं।

'बूढ़ी काकी' भी उनकी ऐसी ही एक कहानी है। काकी जिसने अपनी सारी जायजाद अपने देवर के बेटे के नाम कर दी है। लेकिन वे अब उसका ध्‍यान नहीं रखते हैं। ठीक से खाने को भी नहीं देते। ऐसे में घर की एक बच्‍ची काकी का ध्‍यान रखती है।  

यह कहानी है एक बच्‍चे और बकरी के बीच लगाव की। बकरी ने दूध देना कम कर दिया है, उसे बेचने का फैसला का किया गया है। बेचने की जिम्‍मेदारी घर के एक बच्‍चे को दी गई है। वह उसे लेकर बेचने जाता है, ल‍ेकिन फिर रास्‍ते में कुछ ऐसा घटता है कि वह उसे लेकर घर वापस आ जाता है। कहानी हर उम्र के बच्‍चों को अच्‍छी लगेगी।

प्रेमचन्‍द

कृष्ण कुमार

मुंशी प्रेमचंद की एक अमर कहानी है ' बड़े भाई साहब'। यह हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था पर सर्वकालिक टिप्‍पणी है। एक ही घर में अलग-अलग आयु के दो भाइयों की शिक्षा किस तरह हो रही है, इसका चित्रण करते हुए करते हुए प्रेमचंद ने ऐसे तमाम ब्‍यौरे दर्ज कर दिए हैं, जो हमें अपने घर में या आसपास ही नजर आ जाते हैं।

उनकी यह कहानी विभिन्‍न राज्‍यों के हिन्‍दी पाठ्यक्रम में अलग-अलग कक्षाओं में पढ़ाई जाती है।

अनिल सिंह
ये जुमला प्रयोग करते वक्त कहने वाले के दिमाग में यही बात होती है कि बच्चे नासमझी की, बेतुकी, बेवकूफाना, अव्यवहारिक, अवास्तविक और लगभग नामुमकिन-सी लगने वाली बातें करते हैं। इसीलिए ‘बच्चों-सी बातें करते हो’ एक रूढ़ मुहावरे की तरह हमारी कहन में शामिल है।

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