उम्‍मीद

2012 में बी.टी.सी. करने के पश्चात मैंने खूब विज्ञान मेले आयोजित किए। इसी बीच मुझे राजकीय प्राथमिक विद्यालय तोलिख्वा कोट, ब्लॉक कनालीछीना में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली और बच्चों के साथ, उनके परिवेश से जुड़ने का मौका मिला। इसी दौरान एक दिन मुझे डायट डीडीहाट से श्रीमती सुनीता पाण्डेय का फोन आया कि आपको मुख्य सन्दर्भदाता के प्रशिक्षण हेतु देहरादून जाना है। मैंने कहा, “मैडम मेरी उम्र तो बहुत कम है और इस क्षेत्र में अनुभव न के बराबर है, मैं कैसे कर पाऊँगा।” उनका जवाब सुन मैं भौंचक्का रह गया। वे बोलीं, “तुम्हारी पहचान उम्र से नहीं तुम्हारे काम से है। तुम्हारी इस कला को जिले के शिक्षकों के बीच पहुँचाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा, तैयार हो जाओ।”

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उत्‍तराखण्‍ड के दूरदराज और पहाड़ी इलाकों में शासकीय विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक शिक्षा में नए-नए नवाचार कर रहे हैं। वे अपने सीमित-संसाधनों में बच्‍चों को शिक्षित करने के प्रयासों में लगे हुए हैं।

इस तरह के प्रयासों की वजह से विद्यार्थी और अभिभावक दोनों ही स्कूल को पसन्‍द करते हैं। उनके स्कूल में कुछ बच्चे तो प्राइवेट स्कूल छोड़कर भी पढ़ने आते हैं जबकि कई बच्चों को काफी प्रोत्साहित करके स्कूल लाना पड़ता है। कुसुमलता जी व अन्य शिक्षिकाएँ समुदाय में जाकर बच्चों को लाती हैं। फिर इन बच्चों को उनकी आयु, सीखने के स्तर और रुचि के अनुरूप स्कूल और कक्षा की प्रक्रियाओं में शामिल किया जाता है। इस तरह के प्रयास को याद करते हुए उन्होंने कुछ बच्चों का जिक्र किया जो अपने परिवार के व्यवसाय सब्जी, निम्बू,मिर्ची बेचना आदि की वजह से स्कूल नहीं आ पाते थे। उनके माता-पिता से काफी बातचीत करने के बाद ये बच्चे स्कूल आने लगे। धीरे-धीरे इनमें से अधिकांश बच्चे स्कूल में रम गए और स्कूल की गतिविधियों में शामिल होने लगे। आज इनमें से कई बच्चे अपनी बस्ती के बाकी बच्चों के स्कूल आने का कारण हैं।

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' अभिभावकों ने ध्यान दिया तो बच्चे अब रोज स्कूल आ रहे हैं। अब उनके पास शिक्षण सामग्री भी होती है। जो स्कूल में आज पढ़ाया वही हम गृहकार्य देते हैं और लगभग सभी बच्चे अपना गृहकार्य करके लाने लगे हैं जो करके नहीं लाते उन्हें हम विद्यालय में करवाते हैं, ऐसा करने से अब बच्चे समझने लगे हैं कि अगर गृहकार्य करके नहीं ले गए तो स्कूल में तो करना ही पड़ेगा। पढ़ने-लिखने में गलती करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है इसे अभ्यास से सुधारा जा सकता है और इसके लिए हम बच्चों को पढ़ने-लिखने के खूब अवसर किताब, कॉपी व श्यामपट्ट पर देते हैं। जिससे बच्चे एक दूसरे के द्वारा किए गए सही-गलत से ज्यादा समझते हैं और उन्हें सही-गलत का अन्तर ठीक से समझ में आ जाता है। हम बच्चों से अपने अनुभव लिखने को कहते हैं जिसे वे बड़े चाव से लिखते हैं व एक-दूसरे को सही भी करते हैं।'

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अपने पढ़ाने के तरीकों के बारे में रश्मि बताती हैं कि वे बच्चों को पहले मौखिक रूप से बोलना और बातें करना सिखाती हैं, फिर लिखना और पढ़ना साथ-साथ सिखाती हैं। अक्षर ज्ञान कराने के लिए तरह-तरह के कार्ड बनाकर रखे गए हैं। कविताएँ और कहानियाँ तो रोज ही सुनाती हैं, इसके अलावा कुछ कविताओं के जरिये गिनती या अन्य बातें भी सिखाती हैं। बच्चों को गणित सिखाने के लिए आड़ू-खुबानी की गुठलियों का पयोग किया जाता है। इस विद्यालय में कक्षा एक से ही बच्चों को जोड़, घटाव, गुणा और भाग करना सिखाया जाता है। यहाँ के लगभग सभी बच्‍चों की लिखावट आश्चर्यजनक रूप से साफ और बहुत सुंदर है। शिक्षण विधि को रुचिकर तथा अधिक उपयोगी बनाने के लिए स्थानीय परिवेश पर आधारित शिक्षण सहायक सामग्री विकसित की गई जिससे बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि और अधिक प्रगाढ़ हुई है। बाल अखबार तथा बाल पुस्तकालय को संकलित कर तथा स्थानीय तीज-त्योहारों को आधार मानकर शिक्षण कार्य को नवीनता प्रदान की गई। ‘सर्व शिक्षा’ परियोजना के अन्‍तर्गत विद्यालय में शिक्षिकाओं, बच्चों तथा समुदाय के कुछ उत्साही व्यक्तियों द्वारा मिलकर अपने परिवेश से बालोपयोगी और पाठ सहयोगी सामग्री तैयार की गई।

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