उत्‍तराखण्‍ड

यूनीसेफ की एक परियोजना के तहत देश के कई राज्‍यों में प्राथमिक विद्यालयों में मीना मंच की स्‍थापना की गई है। इसका उद्देश्‍य बालिका शिक्षा को प्रोत्‍साहित करना है। मीना को केन्‍द्रीय पात्र बनाकर कई कहानियों तथा फिल्‍मों की रचना भी की गई है। उत्‍तराखण्‍ड में देवलथल के राजकीय इण्‍टर कालेज के अध्‍यापक महेश चन्‍द्र पुनेठा ने मीना मंच पर आयोजित एक प्रशिक्षण  शिविर में भाग लिया। शिविर के अनुभवों को उन्‍होंने अपनी डायरी में लिपिबद्ध किया। यहाँ प्रस्‍तुत हैं उनकी डायरी के कुछ सम्‍पादित अंश।

यशवेन्‍द्रसिंह रावत

आम तौर पर सरकारी स्कूलों के बारे में मन में यही दृश्य उभरता है कि होगी कोई ऐसी बिल्डिंग जो बिना रंगाई-पुताई की होगी। बाउण्‍ड्री वाल नहीं होगी, चारों तरफ गन्‍दगी फैली होगी। बच्चे इधर-उधर घूम रहे होंगे। स्कूल में एक अध्यापक होगा। किसी तरह बच्चों को घेरे होंगे। प्रशासन को भेजने के लिए जानकारी बना रहे होंगे। मिड डे मील के लिए गन्‍दी-सी रसोई होगी आदि-आदि।

लेकिन गत दिनों उत्तराखण्ड के ऊधमसिंह नगर जिले के सितारगंज ब्लॉक में एक ऐसे सरकारी प्राथमिक विद्यालय में जाने का मौका मिला जो इस छवि के बिलकुल उलट, कुछ अलग है-कुछ खास है।

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उत्तराखण्ड के युवा शिक्षक हेमराज भट्ट की डायरी का प्रकाशन टीचर्सऑफ इण्डिया पोर्टल पर किया गया था। बाद में इसे पुस्‍तकाकार रूप में अज़ीमप्रेमजी फाउण्‍डेशन ने प्रकाशित किया है।  हेमराज भट्ट अब हमारे बीच नहीं हैं। 25 नवम्‍बर 2008 को एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया था। लेकिन उनकी डायरी खासी लोकप्रिय हुई है। उसका अँग्रेजी और कन्‍नड़ अनुवाद प्रकाशित हुआ है। मनोहर चमोली ‘मनु’ भी उत्तराखण्ड के एक युवा शिक्षक हैं। वे भी डायरी लिखते रहे हैं। वे इन दिनों राजकीय हाई स्कूल भितांई, पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल 246001, उत्तराखण्ड 

शिक्षा में सुधार की प्रक्रिया में शिक्षक की भूमिका महत्‍वपूर्ण मानी जाती है। उन्‍हें परिवर्तन के वाहक के रूप में देखा जाता है। वर्तमान समय में आवश्‍यकता इस बात की है कि उन्‍हें इस बात का अहसास दिलाया जाए। इस दृष्टि से जरूरी है कि शिक्षकों के साथ विभिन्‍न स्‍तरों पर नियमित संवाद हो। उन्‍हें अपनी बात कहने के मौके हों, उनके प्रश्‍नों पर विचार के मौके हो, उनकी कक्षा के अनुभव हों आदि। इस विचार को ध्‍यान में रखते हुए सर्वशिक्षा अभियान के साथ मिलकर अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,उत्‍तराखण्‍ड प्रदेश के उधमसिंह नगर व उत्‍तरकाशी जनपदों में विभिन्‍न शैक्षिक क्रियाकलापों से जुड़ा हुआ है।

इसी क्रम में विगत शैक्षिक सत्रों में ब्‍लाक स्‍तर पर शिक्षकों के साथ, शिक्षकों की पहल पर शैक्षिक मुद्दों पर शिक्षक संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता रहा है। इसका मुख्‍य उद्देश्‍य यह रहा है कि शिक्षकों के बीच एक पेशेवर संस्‍कृति का विकास हो। वे अपनी कक्षा की प्रक्रियाओं को व्‍यापक सन्‍दर्भ में रखकर सोच पाएँ। वे आपस में शिक्षा के विभिन्‍न मुद्दों पर सुविचारित संवाद की प्रक्रियाएँ शुरू कर पाएँ।

‘मैं शिक्षण-कार्य को नौकरी मात्र नहीं मानती.... यह मेरा शौक है और मैं प्रत्येक जन्म में शिक्षक ही बनना चाहूँगी।’ यह कहना है प्राथमिक विद्यालय की शिक्षक कुसुम नेगी का। वे लगभग डेढ़ दशक से भी अधिक समय से शिक्षण कर रही हैं।

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बच्‍चों को अगर मौका मिले तो वे अपनी क्षमता,कुशलता और प्रतिभा का बेहतर प्रदर्शन करते हैं। जरूरत होती है उन्‍हें अवसर देने की। उत्‍तराखण्‍ड में लर्निंग गारंटी कार्यक्रम के तहत सर्वशिक्षा अभियान,उत्‍तराखण्‍ड तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन ने मिलकर एक बाल शोध मेले का आयोजन किया। इस मेले में दूर दूराज के स्‍कूलों के बच्‍चों ने बहुत उत्‍साह से भाग लिया। बच्‍चों ने मेले में क्‍या किया यह देखना न केवल आनन्‍द देता है बल्कि हमें चमत्‍कृत भी करता है कि बच्‍चों में अपार सम्‍भावना है।

निमाई चन्द का मानना है कि यदि सरकार समुदाय का सहयोग लेकर समुदाय से ही शिक्षक रखे तो 80% समस्याओं का समाधान हो जाएगा। समुदाय खुद इनकी निगरानी भी करेगा।’

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उत्तराखण्ड के सुदूर पहाड़ी अंचल में स्थि‍त एक प्राथमिक शाला के शिक्षक मनोधर नैनवाल ने यह पाया कि समय-समय पर होने वाले मासिक, अर्द्धवार्षिक एवं सतत परीक्षणों में बच्चे बार-बार समझाने के बावजूद मानचित्र सम्बन्धी प्रश्नों को ठीक से हल नहीं कर पा रहे हैं। ये बच्चे चौथी और पाँचवीं कक्षा के थे। समस्या को पहचानकर उन्होंने मानचित्र सम्बन्धी जानकारी को स्थायी बनाने के लिए ऐसी शिक्षण सहायक सामग्री निर्मित करने का निर्णय लिया जिससे बच्चे स्वयं खेलते हुए सीख सकें।

2009 में उत्‍तराखण्‍ड के उधमसिंहनगर में 'टीचर्स ऑफ इंडिया' पोर्टल तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन की उत्‍तराखण्‍ड की राज्‍य टीम ने एक कार्यशाला का आयोजन किया था।
कार्यशाला में उभरे मुद्दों तथा उसमें विकसित हुई गति‍विधियों के आधार पर शिक्षकों के लिए भाषा-शिक्षण की एक सन्‍दर्भ-पुस्तिका विकसित की गई है। इसमें भाषा-शिक्षण को एक व्यापक सन्‍दर्भ में देखा गया है। यह स्‍थापित करने का प्रयास किया गया है कि भाषा-शिक्षण केवल पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं है। भाषा-शिक्षण में विभिन्न गतिविधियों व अन्य पूरक सामग्री का उपयोग भी कक्षा में किया जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम भाषा-शिक्षण का परिप्रेक्ष्य विकसित कर पाएँ।

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