उत्‍तराखण्‍ड

 

शिक्षक: चंद्र शेखर शर्मा
स्कूल: गवर्नमेंट मॉडल प्राइमरी स्कूल, पिथौरागढ़, उत्तराखण्‍ड

समुदाय

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उम्मीद की किरण कहीं से भी आए वो प्रकाश सब जगह करती है। उम्मीदों की किरणें प्रसारित करते ऐसे शिक्षक ही हमारे सरकारी शिक्षा तंत्र में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। ये परिवर्तन एकाएक नहीं आ सकते इसके लिए इस तरह के छोटे-छोटे प्रयास करने होंगे। हर ओर से ऐसे प्रयासों के किरण पुंज निश्चय ही प्रकाश फैलाएँगे।

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2012 में बी.टी.सी. करने के पश्चात मैंने खूब विज्ञान मेले आयोजित किए। इसी बीच मुझे राजकीय प्राथमिक विद्यालय तोलिख्वा कोट, ब्लॉक कनालीछीना में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली और बच्चों के साथ, उनके परिवेश से जुड़ने का मौका मिला। इसी दौरान एक दिन मुझे डायट डीडीहाट से श्रीमती सुनीता पाण्डेय का फोन आया कि आपको मुख्य सन्दर्भदाता के प्रशिक्षण हेतु देहरादून जाना है। मैंने कहा, “मैडम मेरी उम्र तो बहुत कम है और इस क्षेत्र में अनुभव न के बराबर है, मैं कैसे कर पाऊँगा।” उनका जवाब सुन मैं भौंचक्का रह गया। वे बोलीं, “तुम्हारी पहचान उम्र से नहीं तुम्हारे काम से है। तुम्हारी इस कला को जिले के शिक्षकों के बीच पहुँचाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा, तैयार हो जाओ।”

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उत्‍तराखण्‍ड के दूरदराज और पहाड़ी इलाकों में शासकीय विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक शिक्षा में नए-नए नवाचार कर रहे हैं। वे अपने सीमित-संसाधनों में बच्‍चों को शिक्षित करने के प्रयासों में लगे हुए हैं।

शिक्षक के तौर पर हमको अपनी सोच को विस्तार देने की बहुत जरूरत है ताकि शिक्षक के पेशे की गरिमा को सम्‍भालते हुए अपने हिस्से की जिम्मेदारियों को ठीक से पूरा किया जा सके। कितने ही प्रशिक्षण हों, डाक्यूमेंट पढ़ा दिए जाएँ एक शिक्षक जब तक अपने मन से अपने काम से नहीं जुड़ेगा तब तक कुछ नहीं हो सकता। बच्चों को स्पेस देना, उन्हें गलतियाँ करते देने की छूट देना, उन्हें बीच में न टोकना उनके विकास का हिस्सा है। कोई बच्चा जब आपसे बहस करे, सवाल करे तो यह बहुत सुन्‍दर अनुभव होता है।

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यह शायद इस विद्यालय में पहला सामुदायिक सहकार्य है जिसमें कोई ठेकेदार, मजदूर, अध्यापक निजी स्वार्थ के लिए नहीं जुड़ा। पूरी तरह से सामुदायिक-शिक्षक सहभागिता से बना ये 15 गुणा 15 का यह शेड अपने आप में एक मिसाल है। भविष्‍य में विद्यालयी संसाधनों के अभावों को इसी प्रकार हल करने की दिशा में यह एक उदाहरण साबित होगा, ऐसी आशा तो कर ही सकते हैं।

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अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन ने 2015 में उत्‍तराखण्‍ड के सुदूर पहाड़ी इलाकों में कार्यरत नवाचारी और उत्‍साही शिक्षकों के कामों का दस्‍तावेजीकरण करके 'उम्‍मीद जगाते शिक्षक' नाम से एक पुस्तिका का प्रकाशन किया था। इसमें 11 शिक्षक-शिक्षिकाओं से बातचीत के आधार पर उनके काम का जायजा लिया गया था। बातचीत करने वाले साथियों ने उनके स्‍कूलों में जाकर उनके काम को भी देखा था। जिसने भी इस पुस्तिका को देखा-पढ़ा, उसने इस प्रयास की सराहना की।

प्रकाश नई पीढ़ी के शिक्षक हैं। उन्हें देखकर ‘थ्री ईडियट्स’ का रैंचो-फुनसुकवांगड़ू याद आता है जो बड़ा साइंटिस्ट है लेकिन चुपचाप दूर किसी गाँव में बच्चों को पढ़ाने का सुख ले रहा है। क्योंकि यही उसका जुनून था। विज्ञान के नए-नए फार्मूले बच्चों के लिए खेल हैं। किताबें ऊब से नहीं, जीवन से भरी हैं। जिन्‍दगी जैसे यहाँ खुलकर साँस ले रही हो।

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इस स्कूल तक पहुँचने की राह आसान नहीं है। इसके बावजूद शिक्षक अल्मोड़ा से रोज यहाँ पढ़ाने आते हैं। मेरे ख्याल में शहर के केन्‍द्र में बैठा कोई व्यक्ति इस परिदृश्य की कल्पना भी नहीं कर सकता है, जब तक वह यहाँ ना आए और पहाड़ों के बीच गूँजती इन बच्चों की खिलखिलाहटों को ना सुने।

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आजकल सभी शासकीय शालाओं में शाला प्रबन्‍धन समिति होती है और उसकी नियमित रूप से बैठक भी होती है। समिति में स्‍कूल के शिक्षकों के अलावा जनप्रतिनिधि तथा अभिभावक भी होते हैं।
यह वीडियो उत्‍तराखण्‍ड के उत्‍तरकाशी जिले के डूण्‍डा ब्‍लाक के भाकरा में स्थित एक उच्‍च प्राथमिक स्‍कूल की शाला प्रबन्‍धन समिति की एक बैठक का है। इस वीडियो इस मायने में उपयोगी है कि इसे देखकर यह समझा जा सकता है कि सुदूर ग्रामीण इलाके में स्थित एक स्‍कूल की अपनी क्‍या समस्‍याएँ होती हैं और समिति के सदस्‍य उनसे कैसे जूझते हैं।

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