उत्‍तराखंड

इस तरह के प्रयासों की वजह से विद्यार्थी और अभिभावक दोनों ही स्कूल को पसन्‍द करते हैं। उनके स्कूल में कुछ बच्चे तो प्राइवेट स्कूल छोड़कर भी पढ़ने आते हैं जबकि कई बच्चों को काफी प्रोत्साहित करके स्कूल लाना पड़ता है। कुसुमलता जी व अन्य शिक्षिकाएँ समुदाय में जाकर बच्चों को लाती हैं। फिर इन बच्चों को उनकी आयु, सीखने के स्तर और रुचि के अनुरूप स्कूल और कक्षा की प्रक्रियाओं में शामिल किया जाता है। इस तरह के प्रयास को याद करते हुए उन्होंने कुछ बच्चों का जिक्र किया जो अपने परिवार के व्यवसाय सब्जी, निम्बू,मिर्ची बेचना आदि की वजह से स्कूल नहीं आ पाते थे। उनके माता-पिता से काफी बातचीत करने के बाद ये बच्चे स्कूल आने लगे। धीरे-धीरे इनमें से अधिकांश बच्चे स्कूल में रम गए और स्कूल की गतिविधियों में शामिल होने लगे। आज इनमें से कई बच्चे अपनी बस्ती के बाकी बच्चों के स्कूल आने का कारण हैं।

हिन्दी

जिन्‍दगी ने कभी इतना वक्त ही नहीं दिया कि वो क्या चाहते हैं, यह सोचा जा सके। बस जो सामने आता गया, उसी रास्ते पर चलते गए। ‘मैं यह नहीं कह रहा कि मैं टीचर नहीं बनना चाहता था लेकिन मुझे यह भी नहीं पता था कि मैं टीचर बनना चाहता हूँ।’

हिन्दी

हेमचन्द्र लोहुमी शिक्षण के साथ-साथ प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में अन्य कामकाज भी देखते हैं। वे बताते हैं कि, 'जब स्कूल खुला था तो यह स्कूल कम और भवन ही ज्यादा दीखता था। इसमें कुछ कमरे थे और एक चारदिवारी। रसोई और कुछ फर्नीचर भी जोड़ लीजिए, तो भी था तो यह भवन ही। इसको एक स्कूल में बदलने की जिम्मेवारी हमारी थी।' जब एक शिक्षक इस तरह से सोचने लगे तो समझिए कि वह सही राह पर है। लेकिन केवल सोचना भर ही काफी नहीं है, उसे अमल में लाना भी जरूरी है।

हिन्दी
19227 registered users
7452 resources