अवधारणा

कभी-कभी असामान्‍य को समझना या असाधारण घटनाओं की कल्‍पना करना साधारण चीजों को समझने में हमारी मदद कर सकता है। विशेष तौर पर यह तब और भी सही होता है जब बात अपने आसपास की दुनिया - गुरुत्‍वाकर्षण, सूरज आदि....को समझने की हो।
यह गतिविधि बताती है कि कैसे आप बच्‍चों को अपनी कल्‍पनाओं को व्‍यक्‍त करने और चित्र बनाने के लिए प्रेरित कर असाधारण परिदृश्‍यों के बारे में सोचने के लिए प्रोत्‍साहित कर सकते हैं।

क्‍या स्‍कूल का गणित और रोजमर्रा काम आने वाला गणित एक ही तरह का है?  क्‍या व्‍यवहार में लाने वाले गणित को उसी क्रम में सीखना जरूरी है जिस क्रम में हम स्‍कूल में पढ़ते हैं ? गणित की अवधारणाओं की प्रकृति है कैसी ? इन सवालों पर डॉ.हृदयकांत दीवान से यशवेन्‍द्र सिंह रावत की बातचीत।

‘दिगन्तर शिक्षा एवं खेलकूद समिति’, जयपुर ने गणित बोध पर 15 पुस्तिकाओं की एक शृंखला तैयार की है। ये पुस्तिकाएँ गणित की चार मूलभूत संक्रियाओं तथा सरल समस्या-समाधान में उनके प्रयोग के बारे में हैं। इन्हें प्राथमिक स्तर की शिक्षा के शुरुआती लगभग तीन साल के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। ये पुस्तिकाएँ ही अभ्यास-पुस्तक भी हैं। शिक्षक इस सामग्री और इसके विचारों को आत्मसात कर लेने के बाद अपनी कक्षा में प्रयोग कर सकते हैं, या फिर इस में प्रस्तुत तरीकों को आधार बनाकर शिक्षण कर सकते हैं। आइए देखें, शृंखला की पुस्तक-4 किस बारे में है।

प्राथमिक स्कूल के स्तर पर गणित की वैज्ञानिक समझ बच्चों को ठोस नींव प्रदान करती है। इससे वे अपनी शिक्षा के बाद के चरणों में ऊँचे दर्जे के, ज़्यादा जटिल और निराकार गणित तथा विज्ञान को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। यह कैसे सम्भव है, यही दर्शाता है यह लेख।

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