अनुभव

भोपाल में शिक्षकों का रचनात्‍मक मैत्री समूह 'शिक्षक सन्‍दर्भ समूह' नाम से कार्यरत है। इस समूह ने 104 विभिन्‍न शिक्षकों की शैक्षिक यात्रा तथा उनके शैक्षिक अनुभवों को एकत्र किया है। इन्‍हें एड एट एक्‍शन तथा अन्‍य संस्‍थाओं की मदद से एक किताब का रूप दिया गया है। इसका नाम है 'शिक्षकों की शैक्षिक यात्रा'।

किताब की पीडीएफ यहाँ उपलब्‍ध है

एक बच्‍चा जो साइकिल चलाना सीखना चाहता है। लेकिन उसके पास साइकिल नहीं है। एकलव्‍य द्वारा प्रकाशित बालविज्ञान पत्रिका 'चकमक' के मेरा पन्‍ना कालम में एक बच्‍चे ने अपना यह अनुभव लिखा। इस कहानीनुमा अनुभव को एकलव्‍य ने एक सुन्‍दर चित्रात्‍मक कहानी के रूप में प्रकाशित किया है। इस कहानी को वीडियो के रूप में भी जारी किया है।

प्राथमिक कक्षाओं के बच्‍चों के बीच अभिव्‍यक्ति का महत्‍व बताने के लिए एक उपयोगी संसाधन है।

कुछ अवलोकन एवं चुनौतियाँ

अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,देहरादून द्वारा प्रकाशित की जाने वाली  पत्रिका 'प्रवाह' का जनवरी-अप्रैल , 2017 का अंक सामाजिक विज्ञान पर केन्द्रित है। इसमें इतिहास,भूगोल तथा पर्यावरण विषयों के अतिरिक्‍त कई अन्‍य महत्‍वपूर्ण शिक्षण मुद्दों पर उपयोगी सामग्री है। एक झलक यहॉं देख सकते हैं :

कहानी चौरी-चौरा की : गौतम पाण्डेय

अंतर्सबंध और बदलाव : बिपिन जोशी

विमला

बी.एड. की पढ़ाई के दौरान हमें समूह बनाकर विभिन्न स्कूलों में पढ़ाने हेतु भेजा जाता था। साथ में हमारे समूह के प्रभारी शिक्षक भी जाते थे।

बच्‍चों के समुचित विकास के लिए जरूरी है कि उन्‍हें ऐसा कुछ करने के मौके भी उपलब्‍ध करवाए जाएँ, जिनसे उनमें न केवल कौशल विकसित बल्कि उन्‍हें आनन्‍द भी आए। इसी उद्देश्‍य से मैंने अपने स्‍कूल के बच्‍चों के साथ विभिन्‍न गतिविधियाँ कीं। इनमें से दो का संक्षिप्‍त विवरण यहाँ प्रस्‍तुत है।

कबाड़ से जुगाड़

हम सब जानते हैं कि ऐसे शिक्षकों की कमी नहीं है जो अपने विषयों के अच्छे ज्ञाता होते हैं और कक्षाओं में मन लगाकर बहुत अच्छा पढ़ाते भी हैं। शिक्षण काल में इस सन्दर्भ में बहुत बार सुख-दुख भी पाते हैं। शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों के सम्पर्क में उन्हें कई प्रकार के खट्टे-मीठे अनुभव भी होते हैं। लेकिन अनुभवों का स्वरूप ठीक से पहचानने वाले, उनकी उपयोगिता, आवश्यकता और महत्ता को समझकर दूसरों तक पहुँचाने का काम करने व

‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ देश में लागू होने से जहाँ एक ओर देश के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने का कानूनी अधिकार मिल गया, वहीं शिक्षकों के लिए नई चुनौतियाँ सामने आईं। बहुत से शिक्षक आज भी इनसे जूझ रहे हैं। ‘दिगन्तर, खेलकूद एवं शिक्षा समिति, जयपुर’ ने इस क्षेत्र में काम किया है। प्रस्तुत आलेख तीन काल्पनिक अवस्थाओं पर आधारित है। लेकिन इसे वास्तविक परिस्थितियों, दृष्टिकोणों और कोशिशों को ध्यान में रख कर लिखा गया है। इनमें से कौन सा अनुभव हमें विवेकशील और उपयुक्त लगता है? किस दृष्टिकोण को हम उचित और अनुकरणीय मानें?

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