पर्यावरण अध्‍ययन

अपनी बात की शुरुआत मैं कुछ बुनियादी बातों के साथ करना चाहूँगी। पहला, राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय चिणाखोली में मेरे अलावा दो अन्य शिक्षक हैं। गणित और विज्ञान शिक्षक के रूप में मेरी तैनाती की गई है, परन्तु इसके अतिरिक्त अन्य विषय जैसे भाषा आदि भी मुझे देखने पड़ते हैं। एक शिक्षक के रूप में इन विषयों की तैयारी एवं अध्यापन एक कठिन प्रक्रिया के रूप में दिखाई देता है। समेकित कक्षा शिक्षण इसके लिए उपयोगी हो सकता है। दूसरा, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 यह सुझाव देती है कि शिक्षक अध्यापन कार्य करते समय बच्चे के परिवेश का खूब इस्तेमाल करे ए

 

त्रिपुरारी शर्मा वरिष्‍ठ रंगकर्मी हैं। वे नेशनल स्‍कूल ऑफ ड्रामा में प्राध्‍यापक हैं। उन्‍होंने बच्‍चों के लिए कई नाटकों का निर्देशन किया है। वे बच्‍चों के लिए कहानियाँ भी लिखती हैं। उनकी एक कहानी को रूमटूरीड ने चित्रकथा के रूप में प्रकाशित किया है। यह कहानी है भभो भैंस। इसकी पीडीएफ यहॉं से डाउनलोड की जा सकती है।

मनोहर चमोली  'मनु' शिक्षक हैं। उत्‍तराखण्‍ड के पहाड़ों में रहते हैं। वे बच्‍चों के लिए कहानियाँ भी लिखते हैं। छोटे बच्‍चों के लिए लिखी गई उनकी एक कहानी 'चलता पहाड़' को रूम टू रीड ने चित्रकथा के रूप में प्रकाशित किया है। उसकी पीडीएफ यहाँ से ली जा सकती है।

मध्‍यप्रदेश के सागर जिले के राहतगढ़ ब्लॉक की कल्याणपुर शाला के शिक्षक रामेश्वर प्रसाद लोधी ने पर्यावरण अध्ययन को बच्चों के जीवन के अनुभवों से जोड़ने के लिए एक अनूठा प्रोजेक्ट क्रियान्वित किया है। बच्चे इस प्रोजेक्ट से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने घरों में भी इस प्रोजेक्ट को तैयार किया है। इससे बच्चों में प्रश्न करने, खोज करने, अवलोकन करने, चर्चा करने, अभिव्यक्ति करने, व्याख्या करने वर्गीकरण करने, विश्लेषण करने और प्रयोग करने के कौशल विकसित हुए

भोजन और हम

अब्‍दुल कलाम

बच्चे अपने परिवेश और आसपास घट रही घटनाओं से निरन्तर कुछ न कुछ सीखते रहते हैं। वे कुछ अनुमान लगाते हैं,स्वयं से अनुभव करते हैं और बड़ों से संवाद करते हुए अपनी समझ को विकसित करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उनके भीतर की जिज्ञासा, कौतूहल, आनन्‍द की अनुभूति व मन में उठ रहे प्रश्न उन्हें कुछ नया खोजने की ओर प्रेरित करते हैं।

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