पर्यावरण अध्‍ययन

प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने और पढ़कर समझने की गतिविधि के लिए अपने परिवेश का सार्थक उपयोग कैसे किया जा सकता है, यह इस वीडियो में दिखाया गया है। शिक्षिका ने कार्डों का जिस तरह से उपयोग किया, आप भी ऐसा कुछ कर सकते हैं।

महमूद खान

महमूद खान

अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय, बेंगलुरु ने अँग्रेजी भाषा में एक छमाही विज्ञान पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया है। इस पत्रिका में स्‍कूल में पढ़ाए जाने वाले विज्ञान की विभिन्‍न अवधारणाओं को एक नए नजरिए से देखने की कोशिश की जा रही है। इस पत्रिका का हिन्‍दी तथा कन्‍नड़ अनुवाद प्रकाशित करने की भी एक महत्‍वाकांक्षी योजना है। ताकि हिन्‍दी तथा कन्‍नड़ भाषी विज्ञान शिक्षकों तथा विज्ञान में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों को इसमें प्रकाशित होने वाली सामग्री का लाभ मिल सके।

हिन्दी

जाने-माने पर्यावरणविद् और गॉंधीवादी चिंतक अनुपम मिश्र जी का 19 दिसम्‍बर,2016 को निधन हो गया। वे जल संरक्षण पर किए गए अपने काम के लिए भारत ही नहीं, पूरे विश्‍व में जाने जाते हैं। देश भर के तालाबों पर आधारित उनकी किताब 'आज भी खरे हैं तालाब' मूल रूप से हिन्‍दी में लिखी गई है। इस किताब का 39 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। अनुपम जी ने इस किताब को कॉपीराइट से मुक्‍त रखा है।

1949 में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ने सभी देशों को बालदिवस मनाने की सलाह दी। साथ ही उन्‍हें यह छूट दी कि वे अपने देश के महापुरुषों, प्रतीक चिन्‍ह,धर्म,नस्‍ल आदि से जुड़ी तिथियों पर बालदिवस मना सकते हैं। भारत में इसका श्‍ाुरुआत 1954 में की गई। हमारे देश में 14 नवम्‍बर को बालदिवस के रूप में घोषित किया गया। जो वास्‍तव में भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्‍मदिन है। कहा जाता है कि नेहरू जी को बच्‍चों से बहुत प्रेम था, बच्‍चों के लिए वे बहुत कुछ सोचते थे। इसीलिए अपने जीवन काल में ही बच्‍चों के बीच चाचा नेहरू के नाम से प्

भाषा तथा साक्षरता की उच्‍च प्राथमिक कक्षाओं में पर्यावरण से सम्‍बन्धित पाठ पर समूह में चर्चा करवाई जा सकती है। यहॉं उसका एक उदाहरण है।

भौगोलिक दृष्टि से शिक्षित एक व्‍यक्ति में स्‍थान के सन्‍दर्भ में प्रमुख प्राकृतिक व मानव निर्मित वस्‍तुओं के संघटन को देखने की और मानव जीवन के सम्‍बन्‍ध में इनके महत्‍व व निहितार्थ को समझने की क्षमता होती है। उनमें इनसे उत्‍पन्‍न होने वाली जटिलताओं को समझने की भी क्षमता होती है। ‘भूगोल का प्रभाव व महत्‍व’ न केवल उन्‍हें वर्तमान घटनाओं की जटिलता को समझने में मदद करता है बल्कि दीर्घकालिक साधनों व तरीकों के माध्‍यम से ‘भौगोलिक दृष्टि से उपयुक्‍त’ भविष्‍य की योजना बनाने में भी मददगार होगा ।

राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद ने वर्ष 2008 में एक बढ़िया कार्यक्रम हाथ में लिया था - अन्तर्राष्ट्रीय पृथ्वी ग्रह वर्ष। परिषद ने देश भर के 40 सामुदायिक विज्ञान समूहों से आव्हान किया था कि वे ऐसे प्रोजेक्ट्स व कार्यक्रम बनाएँ जिनमें स्कूली बच्चों को शामिल किया जाए। ऐसी उम्मीद की गई थी कि इन गतिविधियों से बच्चों को अपनी धरती माता को समझने व उसका आदर करने की प्रेरणा मिलेगी। समझने व सराहने की बात यह है कि एक ओर तो हमारी धरती के कुछ विशेष गुण हैं जिनके चलते वह जीवन को सहारा देती है, तथा दूसरी ओर  मानवीय व

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