किसी 'खास' की जानकारी भेजें। हेमराज माली : विद्यालय संचालन में बच्‍चों का साथ

मैं और मेरा स्‍कूल

जब मैंने अक्टूबर 2008 में शाला में पद ग्रहण किया था उस समय शाला में एक अध्यापिका थी। मेरी नियुक्ति प्रबोधक के पद पर हुई थी। लेकिन मेरे आने पर अध्यापिका को कार्यमुक्त कर दिया गया क्योंकि अध्यापिका का स्थानान्तरण हो गया था। मुझे उन शिक्षिका के साथ मात्र 4 दिन रहने का मौका मिला। मेरे सामने सब कुछ नया था। शाला में बच्चों के साथ अध्यापन कार्य करना तथा शाला सम्बन्धी डाक (सूचनाएँ) तैयार करना। उस समय विद्यालय का नामांकन 34 था। साथ ही बच्चों का ठहराव व नियमितता लगभग 60 प्रतिशत थी।

तात्कालिक समस्याएँ 

बच्चों का शैक्षिक स्तर कमजोर था। हिन्दी में किताब पढ़ना नहीं आता था। गणित में जोड़-बाकी संख्या पहचानना नहीं आता था। बच्चों के स्तर को लेकर मै चिन्तित हुआ। कक्षा स्तरानुसार कोई भी कार्य करवाया जाए तो उसे बच्चे नही कर पा रहे थे। साथ ही दूसरी तरफ नामांकन एवं ठहराव की भी समस्या आ रही थी। लंच बाद की उपस्थिति आधी ही रह जाती थी। बच्चे किसी बात को सुनने-समझने की स्थिति में नहीं थे। खाली समय में लडाई-झगड़ा करते थे। कक्षा-कक्ष के सामान को इधर-उधर फेंकना एवं तोड़-फोड़ करते थे। समुदाय के सदस्यों को भी ठीक से नहीं जानने के कारण बच्चों की समस्याओं को ठीक से नहीं जान पा रहा था। स्कूल के अकादमिक और गैर अकादमिक कार्यों में तालमेल नहीं बैठा पा रहा था। मैं गैर अकादमिक कार्यों को प्राथमिकता देता तो बच्चों के साथ अकादमिक कार्यो में पिछड़ रहा था।

मैं एक अकेला शिक्षक था। मुझे ही बच्चों के शैक्षणिक स्तर को सुधारना था तथा स्कूल सम्बन्धी सूचनाएँ तैयार करना था, जैसे- पोषाहार सूचना, मासिक सूचना, रजिस्टर तैयार करना, टेस्ट कॉपियाँ जाँचना, ई-ग्राम सूचना आदि। इन सभी कार्यो को मैंने शाला समय बाद करने की योजना बनाई। इन कार्यों में बच्‍चों को भी शामिल किया।  ताकि मुझे बच्चों के साथ शैक्षणिक कार्य करने के लिए ज्यादा समय मिल पाए।

समुदाय के साथ प्रगाढ़ रिश्‍ते बनाना

मैंने समुदाय से रिश्ते बनाकर बच्चों के नामांकन में वृद्धि सुनिश्चित की। इसके लिए गाँव वालों से सम्पर्क करके शिक्षा की महत्ता पर जोर दिया। रास्ते में आते-जाते लोगों से उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में चर्चा करता। उनके बच्चों के गुण व पढ़े हुए बिन्दुओं पर चर्चा करता। जैसे आपके बच्चे को इतने तक पहाड़े आते हैं। किताब पढ़ना आ गया है। दो कविताएँ सीख गया है। खड़ा होकर जवाब देने लग गया है। जोड़,बाकी आने लग गए हैं। इससे शाला व मेरे साथ समुदाय के रिश्‍ते  बनने लगे।

मैं बच्चों के शैक्षणिक स्तर को भी विद्यालय प्रबन्धन समिति की बैठक में बताता था, जिससे अभिभावकों के बीच मेरी मेहनत और बच्चों की प्रगति रंग लाने लगीं। जो बच्चा लंच में घर पर चला जाता था उसे परिवार वाले दुबारा से स्कूल में छोड़कर जाते। जब मेरे साथ समुदाय के लोग खुलकर बातचीत करने लगे और बच्चों की पढाई-लिखाई के बारे में  मुझसे पूछने लगे कि, ‘मास्साब छोरो और क्या नई चीज सीखा’ तो मुझे भी खुशी होने लगी। विद्यालय की ओर से मनाने वाले त्यौहार में भी उन्हें शामिल करने लगा। समुदाय के साथ इस तरह के कार्य से अच्छे शिक्षक की छवि बनने लगी। समुदाय के लोग बच्चों को दूसरे स्कूल में भेजने के बजाय मेरे विद्यालय में भेजने लगे।

शैक्षणिक स्तर को बढ़ाने के प्रयास

सर्वप्रथम मैंने कक्षा 1 व 2 के बच्चों को एक साथ बैठाया और कक्षा 3,4,5 के बच्चों को एक साथ बैठाया। फिर मैंने बच्चों के स्तर का आकलन करके जैसे थोड़ा बहुत किताब पढ़ना, संख्या पहचानना तथा कुछ नहीं आने वालों को तीन समूह में बाँटा।

  •  समूह जो स्वयं काम कर सके,
  •  जिसको शिक्षक की कम मदद की जरूरत हो,  
  • शिक्षक की हमेशा मदद।

निम्न स्तर वाले समूहों के साथ मेरा जुड़़ाव हमेशा ज्यादा रहता था। कक्षा 2 ,3 एवं 4 के बच्चों को आन्नद पोथी पढ़वाकर देखा। एक बार जब बच्चे का स्तर पता चल गया तो उस बच्चे को उसी स्तर के बच्चों के साथ रखकर आगे का कार्य शुरू किया गया। जो बच्चे अपेक्षित स्तरों के पास थे उनके लिए अतिरिक्त भाषा शिक्षण सामग्री जैसे बाल पत्रिकाएँ ,समाचार पत्र आदि को पढ़ने के लिए देता था। जो बच्चे अपेक्षित स्तरों पर नहीं थे उन्हें आन्नद पोथी के पाठ्यक्रम के अनुसार अलग से लेकर पढ़ाया। स्वयं काम करने वाले समूह के लिए मैंने बालसाहित्य की पुस्तकें एवं कार्य-पुस्तिकाएँ देकर उनका सीखना जारी रखा।

विद्यालय गतिविधियों के सुचारू संचालन के लिए प्रयास

सबसे पहले विद्यालय में होने वाले कार्यो को सूचीबद्ध किया। साफ सफाई, पेड़-पौधों की निराई-गुड़ाई, प्रार्थना, पोषाहार वितरण, जूते-चप्पल को व्यवस्थित करना, कक्षा-कक्ष में टीएलएम का प्रदर्शन, ताले लगाना, छुट्टी के बाद सामग्री को व्यवस्थित करना आदि कार्य को पूरा करने के लिए बच्चों की टीम बनाई। प्रत्येक टीम के कार्य को मैं अलग-अलग दिवस में देखता था और अगर कोई नया सुझाव आता तो उसे जोड़ता था। साथ ही अगर उस टीम की कोई समस्या हो तो उसका भी निराकरण करता था।

बच्चों की आदत व आचरण सम्बन्धी व्यवहार को ठीक करने हेतु प्रार्थना सभा में नियमित रूप से काम करता रहा। साफ-सफाई से शाला में आना, इससे होने वाले लाभ की जानकारी देना आदि। प्रतिदिन की योजना प्रार्थना सभा में बताता था। जिससे बच्चों को मालूम होता था कि आज उन्हें कौन से पीरियड में मैं पढ़ाऊँगा और कौन से पीरियड में उन्हें स्वंय पढ़ना होगा। इस तरह के प्रयास मैं वर्ष भर करता रहा जिसके परिणामस्वरूप मुझे कुछ सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दिए।

उपलब्धियाँ

  • बच्चे स्कूल की सभी जिम्मेदारियों में सक्रिय भाग लेने लग गए और शाला की सभी व्यवस्थाएँ उन्हें अपनी लगने लगीं।
  • बच्चे अपेक्षित स्तरों को प्राप्त करने लगे। जिन बच्चों को लिखना, पढ़ना आ गया वो भी बड़े बच्चों की तरह अखबार ,बाल पत्रिकाएँ पढ़ने लग गए।
  • समुदाय के लोगों को भी महसूस होने लगा कि स्कूल में अच्छी पढाई हो रही है।
  • बच्चों की मेहनत से ही विद्यालय वातावरण हरा-भरा और साफ-सुथरा दिखाई देने लगा है।
  • सभी बच्चे नियमित और पूरे समय ठहर कर स्वयं कार्य करते हैं।
  • शिक्षा अधिकारियों का मेरी शाला की तरफ ध्यान गया और बेहतर कार्य करने हेतु मेरे विद्यालय मे एक शिक्षिका की व्यवस्था की गई।
  • शत-प्रतिशत नामांकन इस विद्यालय में है। इस विद्यालय में अन्य निजी विद्यालय से 28 छात्राओं का नामांकन हुआ है। 
  • मेरी शाला के बच्चों में स्वअनुशासन इस हद तक है कि मुझे शाला से कभी जरूरी राजकीय कार्य से बाहर जाना पड़े तो भी बच्चे स्वयं कार्य करते रहते हैं। कार्य पुस्तिका और अतिरिक्त भाषा शिक्षण सामग्री पर कार्य करते रहते हैं। गणित की प्रश्नावलियों को रफ कॉपी में दोहराते रहते हैं।

हेमराज माली

  • अध्यापक, बी.ए.,एस.टी.सी.
  • राजकीय प्राथमिक विद्यालय, बालापुरा, टोडारायसिंह, जिला टोंक

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गंभीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। हेमराज माली वर्ष 2010-11 में बेहतर शैक्षणिक प्रयासों के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने हेमराज माली से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इस बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम हेमराज माली, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

यदि विद्यालय सुचारू रूप से चलाना है तो बच्‍चों एवं समुदाय का साथ अत्‍यावश्‍यक है ा यह साथ तभी मिलेगा जब शिक्षक विश्‍वास दिला दे कि वह उक्‍त दोनों का हितैषी है ा इसके लिए समर्पण ; लगन और अपनापन चाहिए ा

हेमराज माली में वो बातें हैं ;मेरी बधाई ;;;;;;;;;;;;;;

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