किसी 'खास' की जानकारी भेजें। हिरावतों का आक्या : बेहतर करने की कोशिश

राजस्‍थान के प्रतापगढ़ जिले के धरियावद ब्लॉक मुख्यालय से लगभग पच्चीस किलोमीटर दूर आदिवासी बाहुल्य बस्ती में हरे वृक्षों के मध्य स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय, हिरावतों का आक्या। विद्यालय में एक सौ बयालीस बच्चे नामांकित हैं और स्कूल में केवल एक ही शिक्षक है। कानूनन छात्र-शिक्षक अनुपात जो भी हो, परन्तु यहाँ लगभग विगत दस वर्षों से एक ही शिक्षक कार्यरत है। फिर भी बच्चे और शिक्षक अपने में मगन, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में जुटे हैं। बच्चे किसी भय या झिझक से दूर, मुखर होकर अपनी बात रखते हैं और समुदाय भी शिक्षक के प्रयासों से संतुष्ट।

आइए, जानते हैं, अपने बूते काम को बेहतर करने के ऐसे ही एक प्रयास को।

हिरावतों का आक्या: एक नजर

आदिवासी बाहुल्य गाँव, आबादी लगभग 400 । गाँव में एकमात्र विद्यालय: राजकीय प्राथमिक विद्यालय। 2002 में विद्यालय में नामांकन: 35 । विद्यालय में शिक्षक: 02 । वर्तमान नामांकन: 142 (56 लड़कियाँ व 86 लड़के) विद्यालय में शिक्षक: 01।  2005 से यह विद्यालय एकल शिक्षक विद्यालय के तौर पर संचालित है। बीच में कुछ समय के लिए एक विद्यार्थी मित्र नियुक्त किया गया था। 

शिक्षक परिचय

जगदीश प्रसाद नागर, कक्षा 11(कृषि) के बाद एस.टी.सी. प्रशिक्षण कोर्स (दो साल) । शिक्षक के रूप में प्रथम नियुक्ति: 1993 में : माला का खेड़ा, लपुकालेवा, उदयपुर जिला । 1996 से 2002 तक: मौखमपुरा (धरियावद ब्लॉक) । 2002 से वर्तमान तक: रा.प्रा.वि. हिरावतों का आक्या, धरियावद ब्लॉक, जिला- प्रतापगढ़। 2008 तक प्रतापगढ़ जिला बनने से पहले धरियावद ब्लॉक उदयपुर जिले में आता था।

हमने जो देखा

जिला शिक्षा अधिकारी से इस विद्यालय की जानकारी मिलने पर हम इस विद्यालय के अवलोकन के लिए पहुँचे। दूरस्थ क्षेत्र में स्थित इस विद्यालय में हम कुछ देरी से पहुँचे, उस समय प्रातःकालीन सभा चल रही थी। लगभग 130 बच्चे अपनी कक्षानुसार लाईन में बैठे हुए अखबार की खबरों पर चर्चा कर रहे थे। प्रातःकालीन सभा का यह अन्तिम कार्य था। इसकी समाप्ति के बाद शिक्षक ने सभी बच्चों को अपनी-अपनी जगह (कक्षा-कक्ष नहीं) जाने के लिए कहा। बच्चे कलरव करते हुए पहले विद्यालय परिसर से बाहर की तरफ गए और पानी-पेशाब आदि निपटाकर अपने-अपने स्थान पर आकर बैठ गए।

सभा समाप्ति के बाद शिक्षक द्वारा बच्चों को कोई खास निर्देश (बाहर जाने या जल्दी वापिस आने) नहीं दिए गए, बच्चे सहज और व्यवस्थित तरीके से पहले परिसर से बाहर गए और उसके बाद अपनी-अपनी जगह आकर बैठ गए ।

जब बच्चे यह सब कर रहे थे, इस बीच मैं स्कूल परिसर का जायजा सा लेने लगा। लगभग आधा बीघे (लगभग 60 फीट चौड़ा और 100 फीट लम्बा) से अधिक जगह में फैला स्कूल परिसर और उसमें सलीके से लगे हुए खूब सारे पेड़-पौधे। स्कूल में दाखिल होते वक्त मुख्य दरवाजे के दाईं ओर बालक-बालिकाओं के लिए अलग-अलग बने शौचालय।

वही मुख्य दरवाजे के ठीक सामने कुर्सी (चौतरा/चबूतरा) देकर बना हुआ स्कूल का भवन, जिसमें चार कमरे (तीन बड़े, एक छोटा) और एक खुला बड़ा बरामदा मौजूद है। तीन कमरों व बरामदे का उपयोग कक्षा-कक्ष के तौर पर किया जाता है और एक छोटे कमरे को प्रधानाध्यापक कक्ष के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। भवन के आगे पड़ी खाली जमीन को चारदीवारी से घेरकर परिसर का रूप दिया गया है। परिसर में प्रधानाध्यापक कक्ष से सटा हुआ एक भोजन कक्ष बना हुआ है, जहाँ भोजनकर्मी मध्याह्न भोजन की तैयारी मे जुटी हुई हैं। 

परिसर के अवलोकन के बाद मैं उस ओर बढ़ा, जहाँ बैठकर बच्चे अपने भविष्य के ताने-बाने बुन रहे थे। सभी बच्चे अपनी-अपनी कक्षानुसार बैठे हुए समय सारणी के अनुसार अपने कार्यों में लगे हुए थे। पहले मैंने सभी कक्षाओं में एक चक्कर लगाया, इस दौरान मैने बीच-बीच में रूककर बच्चों से उनकी कक्षा और उनके द्वारा किए  जा रहे काम के बारे में भी पूछा। यह थोड़ा आश्‍चर्यजनक लगा कि कक्षा एक में दो समूह बने हुए थे, एक समूह कक्षा-कक्ष में बैठा हुआ था और दूसरा समूह बाहर बरामदे में। कक्षा दो, तीन और चार एक निर्धारित स्थान पर बैठे हुईं थी लेकिन उनमें भी दो समूह बने हुए थे।

कक्षा पाँच एक समूह में बैठी हुई थी, जहाँ शिक्षक स्वयं काम कर रहे थे। वे बच्चों को कल दिए गए गृहकार्य को जाँचते हुए उन्हें आगे के लिए काम दे रहे थे। इसी दौरान अन्य कक्षाओं में (प्रत्येक समूह में) एक-एक बच्चा (लड़के-लड़की दोनों) बारी-बारी से सभी बच्चों की कॉपियाँ देख रहे थे। इस दौरान वे कॉपियों में की हुई गलतियों पर निशान लगाते हुए सम्‍‍बन्धित बच्चे से उस पर बात कर रहे थे और उसे बता रहे थे कि उसने क्या-क्या गलतियाँ की हैं। बच्चे अपनी गलतियाँ ठीक कर रहे थे। जिन बच्चों ने सही काम किया हुआ था, उन्‍हें आगे का काम दिया जा रहा था। कॉपियाँ जाँचने वाले बच्चे अपने अनुभव से यह काम करते हुए दिखाई दे रहे थे। इसमें प्रथम दृष्ट्या शिक्षक के किसी निर्देश का आभास नहीं हो रहा था।

इस दौरान बच्चों पर इस बात का कोई फर्क नहीं दिखाई दिया कि कुछ अनजान लोग उनके बीच उपस्थित हैं और उनकी गतिविधियों का अवलोकन कर रहे हैं। वे सहजता से अपना-अपना काम कर रहे थे। इस काम के दौरान किसी तरह की अफरातफरी या कोई अव्यवस्था नहीं दिखाई दी।

  • स्कूल में चल रही इस पूरी प्रक्रिया पर, कुछ सवाल मन में उठ रहे थे, मसलन -
  • ये बच्चे कौन हैं ? जो हर समूह में जाकर बच्चों के साथ काम कर रहे हैं।
  • वह यह सब किस प्रक्रिया के तहत कर रहे हैं ? यह कार्य उनके शिक्षण में क्या मदद कर पा रहा है ?
  • क्या प्रतिदिन यही बच्चे कॉपियाँ जाँचने का काम करते हैं या इनमें बदलाव होता है ?
  • क्या यह दिखावा मात्र तो नहीं है ?

लगभग डेढ़ से दो घण्‍टे तक यह प्रक्रिया चली। इसके बाद कक्षा एक, दो व तीन के बच्चे अपनी-अपनी किताबें खोलकर कुछ काम करने में लग गए। अधिकतर बच्चे विषयवार (विशेष रूप से हिन्दी) किताबों से धीमे स्वर में उच्चारण करते हुए कॉपी में लिखने का काम कर रहे थे। कुछ बच्चे प्रश्‍नोत्‍तर लिखने और उन्हें याद करने का काम कर रहे थे।

कक्षा चार व पाँच के बच्चे अपने-अपने समूह में कालांशवार विषय से जुड़े काम करने में में लग गए । बच्चों से पूछने पर पता लगा कि जिस कक्षा में जिस विषय का कालांश है, वह उससे जुड़ा काम कर रहा है। जैसे: कक्षा चार में हिन्दी में कालांश है, तो एक समूह उसके सवाल-जवाब आदि पर लिखित कार्य करने लगा और दूसरा समूह परिसर में एक खाली जगह तलाशकर गोले में जा बैठा। उसी समूह का एक बच्चा गोले के बीच में बैठा और उस सत्र का संचालन उसी को करना था।

इसके बाद उस समूह के बच्चे क्रमवार पाठ को पढ़ने का काम करने लगे। संचालन करने वाला बच्चा/बच्ची खुद के सहित सभी का यह ध्यान रखते हैं कि जो पढ़ा जा रहा है, उस पर सभी बच्चों का समान रूप से ध्यान है या नहीं। उच्चारण ठीक है या नहीं। बीच-बीच में अस्पष्ट शब्दों व वाक्यों पर भी चर्चा की गई। अन्त में पाठ से जुड़े काम सभी बच्चों को देकर सत्र का समापन किया जाता है। कुछ इसी प्रकार की प्रक्रिया अन्य समूह में भी चल रही होती है।

इसके साथ ही शिक्षक भी बारी-बारी से सभी समूहों के बच्चों के साथ जाकर क्रमवार पाठों पर काम कर रहे थे। शिक्षक उसी पाठ पर काम करा रहे थे, पहले जिन पर बच्चे अपने स्तर पर पढ़ने या लिखने का काम कर रहे थे। शिक्षक पहले एक पैराग्राफ का उच्चारण करते हैं, जिसे बच्चे दोहराते हैं, उसके बाद पैराग्राफ में कही गई बात और शब्दार्थ पर बच्चों से सवाल-जवाब करते हुए आगे बढ़ते हैं। काम पूरा होने के बाद आगे क्या काम किया जाना है, इसके बारे में बच्चों को बताते हैं। शिक्षक द्वारा यही प्रक्रिया सभी कक्षाओं/समूहों के साथ सभी विषयों में थोड़े से फेरबदल के साथ दोहराई जाती है।

इस दौरान मैने सभी समूहों में बच्चों से बातचीत करते हुए उनका स्तर जानने की कोशिश की और यह पाया कि सभी कक्षाओं में अधिकतर बच्चों का स्तर कक्षानुसार ठीक-ठाक है। अधिकतर बच्चे सहजता के साथ किताब पढ़ रहे थे और सम्‍बन्धित सवालों का जवाब दे रहे थे व उनका लेखन भी अच्छा था। बच्चों में किसी प्रकार की झिझक, भय या असहजता नहीं दिखाई दी। वे आत्मविश्‍वास के साथ सभी बातचीत में हिस्सा ले रहे थे और सवाल-जवाब कर रहे थे।

स्कूल के शिक्षक ने मध्यांतर तक औपचारिक परिचय और कक्षाओं का ब्यौरा देने के अलावा हमसे किसी प्रकार की कोई बातचीत नहीं की। वे एक कक्षा से निकलकर दूसरी कक्षा में जाकर अपना काम करते रहे। हमने भी उन्हें डिस्टर्ब करने का कोई प्रयास नहीं किया। क्योंकि हम भी उनसे बात करने से पूर्व स्कूल की गतिविधियों के बारे में जान-समझ लेना चाहते थे, ताकि शिक्षक से उनके बारे में विस्तार से चर्चा कर पाएँ।

शिक्षक श्री जगदीश प्रसाद नागर ने जो बताया

स्कूल अवलोकन के दौरान मन में उठ रहे बहुत से सवालों के साथ शिक्षक से बातचीत की गई। उनसे पूछे गए क्रमवार सवालों पर उनका बयान कुछ इस प्रकार है-  

जब मैं यहाँ था तो मेरे अलावा एक और शिक्षक भी यहाँ कार्यरत् थे और लगभग 35 बच्चों का नामांकन था। आरम्भ में मुझे लगा कि यहाँ मैं क्या करूँगा, मुझे अपने गृहजिले (कोटा) में स्थानांतरण ले लेना चाहिए। स्थानांतरण के कुछ प्रयासों की विफलता के बाद लगा कि जब तक यहाँ हूँ तब तक तो इन बच्चों के लिए प्रयास करना चाहिए। काम करते हुए जब कुछ सकारात्मक परिणाम मिले तो मुझे लगा कि मेरे जिले में तो काम करने वाले कई लोग तैयार होंगे, परन्तु मेरे प्रयासों की इस गाँव को अधिक जरूरत है। क्योंकि यहाँ आज भी शिक्षा का अधिक प्रसार नहीं है और शिक्षा के बिना बदलाव सम्‍भव नहीं है।

चूँकि एकल शिक्षक विद्यालय है और नामांकन अधिक, सरकारी विद्यालय होने के नाते किसी को प्रवेश देने से मना भी नहीं कर सकते। ऐसे में विद्यालय ठीक से संचालित हो और बच्चे सीख भी पाएँ। यह काम ऐसे ही नहीं हो जाता है, इसके लिए सतत् प्रयास करना पड़ता है।

जब मैंने बच्चों के साथ लगातार काम करना आरम्भ किया तो कुछ दिनों बाद कुछ बच्चे थोड़ी तेजी से चीजों को समझने लगे। उसके बाद मैने बच्चों के स्तर के हिसाब से समूह बनाए और उन्हें अन्य कक्षाओं के बच्चों के साथ काम करने की जिम्मेदारी देने योजना बनाई। प्रारम्भ में कुछ समस्याएँ आईं लेकिन वह धीरे-धीरे कम होती गई। क्योंकि मैं केवल बच्चों के भरोसे ही सारा काम नहीं छोड़ता हूँ। बच्चों के द्वारा किए गए काम को मैं भी देखता हूँ। जैसे कॉपी जाँचने का काम जब बच्चे कर लेते हैं, उसके बाद मैं सरसरी तौर पर पुनः कॉपियाँ देखता हूँ। यदि उसमें कोई गलती होती है तो मैं काम करने वाले और काम जाँचने वाले दोनों बच्चों से बात करता हूँ। ऐसा करने से वे सावधानी से अपना काम करते हैं।

कॉपी जाँचने वाले बच्चे हमेशा एक ही रहें, यह जरूरी नहीं है। जब कोई दूसरा बच्चा इस स्तर पर होता है तो उसे यह काम दिया जाता है। इससे बच्चों को एक तरह का प्रोत्साहन मिलता है। इस प्रक्रिया के कई फायदे भी हुए, एक तो मदद करने वाले बच्चों की चीजें और पुख्ता होने लगी और दूसरा अन्य बच्चे भी कुछ आगे बढ़ने लगे। ऐसा होने से मुझे भी अन्य बच्चों के साथ काम करने का अधिक समय मिलने लगा। धीरे-धीरे अधिकतर बच्चे इस प्रक्रिया के प्रति सहज हो गए, जो भी नए बच्चे आते हैं, वो खुद-ब-खुद इस प्रक्रिया में ढल जाते हैं।

स्कूल प्रारम्भ होते ही बच्चों के साथ मिलकर स्कूल की साफ-सफाई की जाती है। प्रातःकालीन सभा में प्रार्थना के साथ-साथ सामान्य ज्ञान, अखबार के समाचार आदि पर बातचीत होती है। हर शनिवार बालसभा का आयोजन किया जाता है। इसके बाद, स्कूल में प्रथम घण्‍टे-डेढ़ घण्‍टे तक एक दिन पूर्व दिए गए काम को देखने व उस पर बातचीत का सिलसिला चलता है। मैं कक्षा पाँच के बच्चों के साथ काम आरम्भ करते हुए अन्य कक्षाओं में जाता हूँ क्योंकि अन्य कक्षाओं में तो बड़े बच्चों के माध्यम से काम आरम्भ किया जा सकता है, परन्तु कक्षा पाँच में तो मुझे ही शुरुआत करनी पड़ती है।

कक्षा पाँच के अलावा अन्य कक्षाओं में पहले से बने समूहों के बच्चे अपनी-अपनी जिम्मेदारी के अनुसार गतिविधियों में लग जाते हैं। जिसमें मिलकर पुस्तक का वाचन, चर्चा, पहले के काम का दोहरान आदि कार्य होता है। किसी भी प्रकार की समस्या आने पर मुझसे बात की जाती है। मैं हर कक्षा में क्रमवार नए पाठ पर काम करता हूँ। यह इस स्कूल की सतत प्रक्रिया है।

सर्वाधिक ध्यान हिन्दी पर देता हूँ । क्योंकि यदि बच्चे को पढ़ना आ गया, तो बाकी विषय वह आसानी से सीख जाएगा। इसके बाद गणित, अँग्रेजी व पर्यावरण आदि विषयों पर जाते हैं। इस सब काम के अलावा स्कूल में कक्षा पाँच के बच्चों को मैं नवोदय विद्यालय व आश्रम विद्यालय (आदिवासी जिले में सरकार द्वारा संचालित निःशुल्क आवासीय विद्यालय) में प्रवेश की तैयारी भी करवाता हूँ। हर साल मेरे स्कूल से कुछ बच्चों का चयन नवोदय तथा आश्रम स्कूल में होता है। इनमें प्रवेश बच्चों के भविष्य के लिए बेहतर रहता है। अन्यथा इनके अभिभावकों की कमजोर आर्थिक व सामाजिक स्थिति के चलते बच्चों को इस तरह के अवसर नहीं मिल पाते।

आसपास के गाँवों में दूसरे स्कूल होते हुए भी अभिभावक अपने बच्चों को यहाँ भर्ती कराने लाते हैं। सरकारी विद्यालय होने के नाते मैं किसी को दाखिला देने से मना भी नहीं कर सकता। लेकिन एकल शिक्षक होने के नाते डर लगता है कि यदि कोई और शिक्षक यहाँ नहीं आया तो बच्चों का स्तर बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। एकल शिक्षक होने के कारण डाक देने या अन्य प्रशासनिक कामों से बाहर भी जाना पड़ता है,ऐसे में बच्चे बिना शिक्षक के काम करते हैं। उच्चाधिकारियों के समक्ष भी इस समस्या को अनेकों बार रखा जा चुका है। लेकिन अभी तक कुछ नहीं हो पाया है।

मैं अधिक पढ़ा - लिखा नहीं हूँ, फिर बच्चों का कक्षावार स्तर बनाने के लिए प्रयास करता हूँ। लेकिन कुछ विषयों में काम करते हुए बड़ी दिक्कत होती है, खासकर अँग्रेजी में। अतः मैं अँग्रेजी में गाईड बुक व डिक्शनरी के माध्यम से काम चला रहा हूँ। यह अभी भी मेरे लिए चुनौती बना हुआ है। 

गाँव के लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं और रोजगार आदि के कारण बाहर भी जाते रहते हैं। ऐसे में उनमें पढ़ने के प्रति लगन बनाए रखने के लिए उन्हे लगातार अभिप्रेरित करते रहना पड़ता है। आवश्‍यकता होने पर मैं विद्यालय प्रबन्‍धन समिति की बैठक भी बुलाता हूँ। आरम्भ में कुछ दिक्कतें अवश्‍य आई थीं लेकिन बाद में उनसे अच्छा तालमेल हो गया। अब जब भी जरूरत होती है, समुदाय के लोग अच्छा सहयोग करते हैं। विद्यालय में आप जो अतिरिक्त निर्माण कार्य या सजावट या पेड़-पौधे देख रहे हैं, ये सभी समुदाय के सहयोग से हैं।


लोहित कुमार जोशी, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक, राजस्‍थान

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

समर्पण है

aditi.sharma का छायाचित्र

Inspiring!

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प्रमोद जी, अदिति जी धन्यवाद ....

adnanbuland203 का छायाचित्र

अगर लगन हो तो आप कुछ भी कर सकते हैं, Degree की ज़रूरात नहीं |

Thanks to those person who give the information about this TEACHER...!

And last but not least----Very well written by Lohit ji.

Rgds
Adnan Buland Khan~ABK

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