किसी 'खास' की जानकारी भेजें। स्कूलों में सहायक वातावरण बनाना : उषा अस्वथ अय्यर के साथ बातचीत

सुश्री उषा अस्वथ अय्यर भुबनेश्‍वर की उपायुक्त एवं जोनल इन्स्टिट्यूट ऑफ एजुकेशन एण्ड ट्रेनिंग, भुबनेश्‍वर की निदेशक हैं। पी.जी.टी, प्राचार्य तथा टीचर एजुकेटर के तौर पर काम करने का उनका लम्बा अनुभव है। मॉस्को के केन्द्रीय विद्यालय में उन्हें अफ्रीका से दक्षिण पूर्वी एशिया तक के कई देशों के मिश्रित क्षमता वाले विद्यार्थी-समूहों को पढ़ाने का अनुभव रहा। केन्द्रीय विद्यालय, कालीकट तथा वायु सेना स्टेशन, लोहेगाँव के केन्द्रीय विद्यालय नम्बर 2 में प्राचार्य के तौर पर उन्होंने समावेशी प्रथाएँ लागू करते हुए मार्गदर्शी कार्य किया।निवेदिता बेदादुर ने उनसे बातचीत की।

निवेदिता: विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए सहायक वातावरण बनाने के सम्बन्ध में आपका क्या अनुभव रहा है? एक शिक्षक और प्राचार्य के तौर पर ऐसा बेहतर ढंग से कर पाने के लिए क्या कोई जानकारी/प्रशिक्षण/नीति है जिसकी आवश्यकता आपको लगती है?

उषा: जिन स्कूलों में मैंने काम किया है, उनमें विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों की संख्या बहुत ही कम रही है। अपने पेशे के शुरुआती दिनों में मेरे प्रयास यहाँ तक ही सीमित थे कि मैं अपनी सामान्य बुद्धि का प्रयोग करते हुए उनके भौतिक वातावरण से सम्बद्ध कुछ समस्याओं को हल करूँ। शिक्षकों या प्रशासनिक कर्मियों के लिए इससे सम्बद्ध कोई स्थापित प्रशिक्षण नहीं है। आवश्यक है कि शिक्षक और प्राचार्यों के साथ-साथ अभिभावक भी विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रति संवेदनशील हों और इस सम्बन्ध में परामर्श से लैस हों ताकि वे जीवन और ज्ञान की खोज के पथ पर अग्रसर प्रसन्नचित्त बच्चे बन पाएँ।

निवेदिता: मुझे लगता है कि बच्चे के रूप में हम सबको किसी न किसी बात में बहुत-सी मदद की आवश्यकता रहती है। स्कूल में मैं गणित से इतना भयभीत रहती थी कि मुझे लगता था मैं कभी भी गणित का कोई सवाल नहीं कर पाऊँगी।

उषा: मैं भी। मगर एक शिक्षक या प्राचार्य के तौर पर क्या हम इस बारे में सोचते भी हैं? मुझे विशेष तौर से तब बहुत बुरा लगता है जब स्कूल की जाँच के दौरान किसी बच्चे द्वारा उत्तर न दे पाने की स्थिति में शिक्षक इस बात को यह कहकर टाल देता है कि “यह धीमी गति से सीखने वाला/वाली विद्यार्थी है।” हैरत की बात है - या शायद यह इतनी हैरत की बात न भी हो - कि कक्षा दो के विद्यार्थी भी जानते हैं कि धीमी गति से सीखने वाला कौन होता है! कोई भी शिक्षक इसे अपना दायित्व नहीं समझता कि बच्चे को जवाब देने में मदद की जाए। कक्षा में शिक्षक एक अभिभावक की तरह होता है। जिस प्रकार माता-पिता किसी भी नुक्ताचीनी, दुष्प्रयोग या हमले से अपने बच्चे को बचाते हैं, एक शिक्षक को भी सहज प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बच्चे को समस्या हल करने के लिए हर मौका देना चाहिए।

निवेदिता: सहायक वातावरण बनाने में मूलभूत ढाँचा क्या भूमिका निभाता है?

उषा: मूलभूत ढाँचा यकीनन एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अधिकतर स्कूलों में बैठने की व्यवस्था की समस्या है क्योंकि फर्नीचर भारी है और सुविधाजनक नहीं है। सभी जगह सभी कक्षाओं के लिए एक ही तरह का फर्नीचर बनाने की कोशिशें विभिन्न आयु-समूहों, विषयों या मौसम की अलग-अलग माँगों को ध्यान में नहीं रखतीं। लेकिन मूलभूत ढाँचा भावनात्मक सम्बन्धों और सामान्य बुद्धि का स्थान भी नहीं ले सकता।

मुझे एक शिक्षक की याद है जिसने ब्लैकबोर्ड के पास एक दरी बिछा दी, एक तार बाँधकर कामचलाऊ पुस्तकालय के तौर पर कुछ पत्रिकाएँ और किताबें उस पर टाँग दीं और विद्यार्थियों को उन्हें खाली समय में प्रयोग करने की छूट दे दी। यह कक्षा दो की बात है जिसमें करीब 6-7 साल के बच्चे थे। एक बार निगरानी के लिए अपने दौरे में मैं यह देखकर हैरान रह गई कि शिक्षक के कक्षा में न होने के बावजूद यह कक्षा अपने किसी काम में जुटी हुई थी। दो विद्यार्थी दो अन्य सीखने वालों को पढ़ाई में मदद कर रहे थे।

शिक्षक के तौर पर मेरे अनुभव में मुझे आशुतोष याद आता है जो विज्ञान की धारा से मेरे कुछ बहुत अच्छे विद्यार्थियों में था। उसकी टांगें कमजोर थीं और उनके सहारे के लिए वह कैलिपर पहनता था जिसकी वजह से उसका इधर-उधर चलना-फिरना बहुत कठिन था। लेकिन वह जोश से भरा रहता था और ब्लैकबोर्ड पर लिखना चाहता था, कक्षा में हिस्सेदारी करना चाहता था। हममें से अधिकतर उसका उत्साह बढ़ाते थे। एक दिन, इन्स्पेक्शन के दौरान, उसने कक्षा में बैठे-बैठे ही उत्तर दिया। इन्स्पेक्टर बहुत नाराज हुआ। उसने इसके बारे में कक्षा में भी टिप्पणी की और मेरी निरीक्षण रिपोर्ट में भी इस बात को दर्ज किया। मैं इतना अटपटा महसूस कर रही थी कि उसे यह भी न बता पाई कि आशुतोष शारीरिक तौर पर चुनौती का सामना कर रहा है और इसलिए आसानी से खड़ा भी नहीं हो सकता।

निवेदिता: आपके विचार से इनमें से क्या है जो एक सहायक वातावरण बनाने में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण/सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण है - प्रत्येक बच्चे का आदर करना और उसे महत्व देना, बच्चों को सुनना, और सीखना तथा खुलापन?

उषा: प्रत्येक बच्चे का आदर करना और उसे महत्त्व देना। मुझे लगता है कि यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। यही सबसे चुनौतीपूर्ण भी है क्योंकि लोगों को यह विश्लेषण करना होगा कि वे अपने से अलग बच्चों/लोगों के साथ अलग तरह का व्यवहार क्यों करते हैं - क्या यह सामाजिक या आर्थिक तबके में अन्तर की वजह से है या क्षमताओं में अन्तर की वजह से? हमारे व्यवहार की गहरी सांस्कृतिक जड़ें हैं। यह निश्चित तौर पर एक चुनौती है कि हम सामाजिक जीवों के तौर पर जो दुराग्रह पाल लेते हैं, उन्हें खुलेपन से परिवर्तित कर पाएँ। लेकिन दिल को खुश करने वाले क्षण भी आए हैं जब लगा कि परिवर्तन हो रहा है।

मेरे एक स्कूल में एक शिक्षिका ने कम गति से सीखने वालों को बाकी की कक्षा के बराबर लाने का अपना ही एक तरीका निकाला। 4-5 ऐसे विद्यार्थी थे जो कक्षा पाँच तक पहुँच तो गए थे मगर उन्हें अँग्रेजी बिल्कुल नहीं आती थी। शिक्षिका इस बात से बहुत दुखी थी कि वह अपनी कोई बात उन तक पहुँचा नहीं पाती थी। फिर उसे विचार आया कि वह कक्षा एक की पाठ्यपुस्तकों से शुरुआत करे। उसके बाद उसने उन्हें कक्षा दो और तीन के लिए भी मार्गदर्शित किया। उनमें आया परिवर्तन किसी करिश्मे से कम न था। “तुम क्यों नहीं कर सकते?” सुनने के बाद उन्हें यह सुनकर हैरत हुई - “तुमने कर दिखाया!” बच्चों को सुनो और सीखो - दृष्टिकोण में यह बदलाव लाना भी बहुत मुश्किल है, क्योंकि अधिकतर वयस्क समझते हैं कि उन्हें तो सब कुछ पता है और बच्चों को तो बस कुछ करने के लिए आदेश ही देना है। आमतौर पर हम विद्यार्थियों को सवाल पूछने की छूट कभी नहीं देते। मुझे कक्षा नौ के बच्चों के साथ एक कक्षा में हुआ आदान-प्रदान याद है। उन्होंने राजनैतिक और सामाजिक समस्याओं के बारे में जो प्रश्न पूछे, वे हैरत में डालने वाले थे। परिवार में यदि एकमात्र सन्तान लड़की हो तो केन्द्रीय विद्यालयों में उसे बिना शुल्क शिक्षा दिए जाने की नीति है। मुझे याद है कि एक लड़के ने मुझसे कहा कि एकमात्र बालिका को बिना शुल्क शिक्षा देने की नीति की बजाए बेहतर होगा कि कई लड़कों वाले परिवार में एक ही लड़की है तो नीति बने कि उसके साथ लड़कों के मुकाबले बेहतर व्यवहार हो। उसने कहा कि यदि परिवार में एक ही बच्चा हो, फिर वह चाहे लड़की ही क्यों न हो, तो उसके साथ तो आमतौर पर बेहतर व्यवहार किया ही जाता है क्योंकि उसके साथ तुलना करने को कोई अन्य बच्चा है ही नहीं।

निवेदिता: दस साल से भी अधिक समय तक प्राचार्य के तौर पर आपके कार्यकाल में आपने शिक्षकों में दृष्टिकोण-बदलाव सम्बन्धी कई कदम उठाए हैं और धीरे-धीरे पूर्वाग्रह को प्रशंसा में तब्दील किया है। उनमें से कुछ अनुभव हमारे साथ साझा कीजिए।

उषा: क्या आपको केन्द्रीय विद्यालय वायु सेना स्टेशन-2, पुणे का अभय याद है? उस समय वह कक्षा पाँच में था और मैं अपने नियमित कक्षा-निरीक्षण पर थी। अँग्रेजी की कक्षा चल रही थी। शिक्षक ने सवाल पूछे और उन्हीं विद्यार्थियों ने जवाब दिए जो आमतौर पर दिया करते थे। एक बार अभय ने जवाब देने के लिए हाथ उठाया। उसने सही जवाब दिया, लेकिन हिन्दी में। सवाल था - आप गर्मी के दिन में स्वयं को राहत पहुँचाने के लिए क्या करते हैं? ए.सी. चलाना, तैराकी करना, पंखे या कूलर में बैठना जैसे आमतौर पर मिले उत्तरों में उसका उत्तर था - “डुबकी लगाना।” अभय गरीबी की पृष्ठभूमि से था - झोपड़पट्टी जैसे इलाके से। उसके लिए पानी का कोई भी ताल गर्मी से राहत पाने का एक अच्छा तरीका था। और यह हमारे बहुत से बच्चों के लिए सही है। कितने हैं जो असल में स्विमिंग पूल का प्रयोग करते हैं? लेकिन शिक्षक ने बहुत ही रूखे स्वर में कहा -  चुप रहो! मुझे हस्तक्षेप करना पड़ा। मेरी प्रशंसा ने उसे और कई उत्तर देने के लिए प्रोत्साहित किया। उसके द्वारा दिए गए एक और उत्तर - “आइस का गोला” - को भी मैंने गर्मजोशी से स्वीकारा। उसके बाद अभय हमारे प्रिय विद्यार्थियों में से एक हो गया।

प्राचार्य बनने के बाद ही मुझे एहसास हुआ कि शारीरिक चुनौती का सामना कर रहे विद्यार्थियों की कुछ विशेष आवश्यकताएँ होती हैं जिनके बारे में हम तुरन्त ध्यान नहीं करते। कक्षा दस में एक छात्रा थी जो सुनने की शक्ति से वंचित थी। वह सुनने के लिए किसी सहायक यन्त्र का प्रयोग भी नहीं करती थी। कारण था कि दो कक्षाएँ लगने के बीच के समयकाल में विद्यार्थियों द्वारा मचाया जाने वाला शोर उस यन्त्र की वजह से उसे बहुत अधिक बढ़े हुए स्वर में सुनाई देता था और वह उसके लिए असहनीय होता था। वह शिक्षक द्वारा कही जा रही बात को उसके होंठों की हरकत से भी नहीं समझ पाती थी। मैंने इस बाबत उसके शिक्षकों से चर्चा की और हमने उसे लिखित नोट्स देने का निर्णय लिया जिन्हें वह अपनी कॉपी पर उतार सकती थी। हमने उसके लिए कुछ वर्कशीट भी तैयार कीं।

इसी प्रकार कालीकट में एक लड़की की बात है। वह स्वयं नहीं चल पाती थी। मुझे यह समझने में करीब एक साल लग गया कि वह विद्यार्थियों के लिए बने सामान्य शौचालय का प्रयोग नहीं कर पाती। मैंने किसी तरह सी.पी.डब्ल्यू.डी. से सम्पर्क किया और विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए शौचालय बनवाए - यह काम विद्यालय प्रबन्धन कमेटी की सहायता के चलते थोड़े ही समय में हो गया।

निवेदिता: एक सहायक वातावरण तैयार करने में आप एक शिक्षक, प्राचार्य और एक टीचर-एजुकेटर की भूमिका में क्या अन्तर देखती हैं?

उषा: एक शिक्षक के तौर पर मैं सब विद्यार्थियों की सहायता कर पाई। मेरा मैत्रीपूर्ण व्यवहार उन्हें आमतौर पर मेरे साथ सहज महसूस करने में सहायक था। मेरे विचार से मैंने उनके लिए कुछ अलग नहीं किया, न ही कुछ विशेष किया। प्राचार्य के तौर पर मैं भौतिक वातावरण में आवश्यक परिवर्तनों के बारे में आसानी से निर्णय ले सकती थी, फिर वह चाहे कक्षा का कमरा बदलने की बात हो, विशेष शौचालयों के निर्माण की या पैरों के अधरंग से पीड़ित एक विद्यार्थी के लिए किताबें ले जाने की बात, क्योंकि वह स्वयं पुस्तकालय जाने में सक्षम नहीं था। टीचर-एजुकेटर के तौर पर मैंने कार्यशालाओं और स्कूलों में जाकर जागरूकता फैलाई। लेकिन नीति तैयार करने पर मेरा कोई अधिकार या नियन्त्रण नहीं है।

निवेदिता: समुदाय के साथ सम्बन्ध के अभाव में सब बच्चों को हमेशा एक सहायक वातावरण प्रदान किया जा सकता है या नहीं - क्या हिंसा, दुर्व्‍यवहार और उपेक्षा की घटनाएँ आपको यह सोचने की ओर ले गईं?

उषा:  हाँ, मुझे कक्षा नौ का वह लड़का याद है जिसमें कक्षा छह के किसी बच्चे वाली मासूमियत थी। वह सेरेब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्क पक्षाघात) का शिकार था, इसलिए उसकी चाल में स्थिरता नहीं थी और वह बैठता भी अजीब ढंग से था। मैंने पाया कि उसका शिक्षक उसे दण्डित करता रहा था। कहने को तो यह बच्चे के बैठने के तरीके को बेहतर करने के लिए था! शिक्षक मेरे क्रोध को सच में समझ ही नहीं पाया - उसे तो बस यह समझ में आ रहा था कि ऐसा करने पर उसके अभिभावक बहुत गुस्सा होंगे और इसके चलते उसकी नौकरी जा सकती है। लेकिन क्या गारण्टी थी कि वह अन्य बच्चों को दण्डित नहीं करता रहेगा? और क्या गारण्टी थी कि यह बच्चा अन्य लोगों से ऐसे ही व्यवहार का सामना नहीं करेगा?

निवेदिता: अगर आपके पास स्कूल में अधिक सहायक वातावरण बनाने के लिए बेहतरी लाने का अधिकार हो तो आप किस नीति में बेहतरी लाना चाहेंगी?

उषा: शिक्षा की नीतियों में शिक्षा के विभिन्न हितधारकों की आवश्यकताओं, तौर-तरीकों और जागरूकता हेतु उठाए जाने वाले कदम स्पष्ट तौर पर दिखाई देने चाहिए। विशेष आवश्यकताओं वाले विद्यार्थियों की कठिनाइयों और समस्याओं पर नियमित चर्चाएँ होनी चाहिए और उनसे निपटने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। बी.एड. में स्पेशल एजुकेटर्स पर एक विशेष भाग होना चाहिए। प्रत्येक स्कूल में स्पेशल एजुकेटर्स का एक पद होना चाहिए जिससे शिक्षक ऐसे विद्यार्थियों के लिए आवश्यक मदद बाबत जागरूक हो पाएँ।

विद्यार्थी काउंसिल, वी.एम.सी. और पी.टी.ए. आदि में विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व हो तो उनकी बात सुनी जा सकेगी। मुझे आशा है कि मूल्य-आधारित शिक्षा, धर्म, महान नेताओं के उदाहरण आदि से विद्यार्थियों पर प्रभाव पड़ेगा। माता-पिता, शिक्षकों और बच्चों में यह जागरूकता पैदा करने की भी आवश्यकता है कि प्रत्येक व्यक्ति की अद्वितीयता का आदर किया जाए। साथ ही आधुनिक दुनिया में दरकार दक्षताओं और प्रतिभाओं के बारे में भी जागरूकता हो।

मैं एक ऐसी नीति का स्वागत करूँगी जिसके तहत रिपोर्ट कार्ड तो बस मौखिक ही हों। वे प्रत्येक बच्चे की सकारात्मक बातों की ही बात करें; और उनमें अंक देने की बात न हो क्योंकि इससे तो तुलना और कमतरी की भावना जन्म लेती है - फिर वह चाहे घर में हो या स्कूल में या सम्पूर्ण समाज में।

(निजता की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लेख में बच्चों के नाम बदल दिए गए हैं।)  


निवेदिता बेदादुर अज़ीम प्रेमजी युनिवर्सिटी में अकादमिक विषयों एवं शिक्षाशास्त्र की विशेषज्ञ हैं। वे केन्द्रीय विद्यालय संगठन में शिक्षक और प्रिंसिपल के तौर पर उषा अय्यर के काम के साथ करीब से सम्बद्ध रही हैं। इस सम्बन्ध से जुड़ी कई यादें हैं जो स्कूलों में सहायक वातावरण बनाने के काम से सम्बद्ध हैं। अनुवाद: रमणीक मोहन

यह लेख Learning curve issue xxi December 2013 में प्रकाशित Creating Enabling Environment in School :An Intervew with Usha Aswath Iyer का हिन्‍दी अनुवाद है। अनुवाद: रमणीक मोहन

                                                                                                                               

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