किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सौदानसिंह

मैं और मेरा पहला विद्यालय

मेरी प्रथम नियुक्ति राजस्‍थान के बाड़मेर जिले के ढढाली गाँव में हुई थी। यह रेगिस्‍तानी इलाका है। मैंने ही उस गाँव में जाकर विद्यालय प्रारम्‍भ किया। पहले साल 10-12 बच्‍चों ने प्रवेश लिया। मैं विद्यालय में ही रहता था। मैंने बच्‍चों को अपनी भरपूर क्षमता से पढ़ना-लिखना सिखाया। बच्‍चों को सीखता देख अगले साल मेरे विद्यालय में बच्‍चों का नामांकन 50 के करीब हो गया। इस दौरान मुझे कुछ ऐसे अनुभव हुए जिनसे मेरी हिम्‍मत भी बढ़ी।

पढ़ने की लागी लगन

सन् 94 की बात है। सुथारों की एक लड़की अपने भाई को स्‍कूल छोड़ने आती थी। उसकी उम्र 16 के करीब थी। मैंने उसे भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया। मेरी बात मानकर वह भी स्‍कूल आने लगी। चार-पाँच महीने में ही वह पढ़ना सीख गई। उससे प्रेरित होकर एक भील लड़की भी स्‍कूल आने लगी। मैंने उसे भी पढ़ाना शुरू कर दिया। एक और लड़की थी जो राजपुरोहित समाज की थी। वह भी अपने भाई को स्‍कूल छोड़ने आती थी। इन दोनों लड़कियों को देखकर उसने भी पढ़ने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की। उसकी उम्र लगभग 18-19 साल थी। मैंने कुछ सोचकर उसे पढ़ाने से मना कर दिया। लेकिन उसने स्‍कूल आना नहीं छोड़ा। वह लगातार मुझसे पढ़ाने का आग्रह करती रही। आखिरकार मैंने भी उसको पढ़ाने का मन बना लिया। उसका नाम संतोष था। उसके पिता काम के सिलसिले में पूना में रहते थे। चार-पाँच महीने में ही सन्‍तोष  ने पढ़ना-लिखना सीख लिया। जब उसके पिता गाँव आए तो उन्‍होंने मुझे धन्‍यवाद दिया। कहा, ‘मास्‍टर जी आपने असम्‍भव काम सम्‍भव कर दिया। अब यह मुझे महीने में दो-तीन बार चिट्ठी लिखती है।’

मेरा गाँव , मेरा विद्यालय

कुछ समय बाद मेरा तबादला भगवानपुरा हो गया। यह ऐसा इलाका है जो बीसलपुर बाँध के कैचमेंट एरिया में आता है। इस वजह से यह प्रदेश के मुख्‍य मार्गों से कटा ही रहता है। सड़क न होने से यहाँ पहुँचना भी आसान नहीं होता है। विकासखण्‍ड देवली से यह 60 किलोमीटर दूर है। 96 में जब मैं यहाँ आया तो देखा कि अध्‍यापक गाँव के अन्‍दर कहीं और विद्यालय चला रहे हैं, जबकि गाँव में विद्यालय भवन बना हुआ था। मेरे पूछने पर उन्‍होंने बताया कि अभी भवन का उद्घाटन नहीं हुआ है। विद्यालय भवन के चारों ओर बबूल की झाडि़या उग रही थीं। मैं कुछ बच्‍चों को लेकर विद्यालय गया और मैंने बबूल की झाडि़यों को काटना शुरू कर दिया। मैं काटता जाता था और बच्‍चे उन्‍हें घसीटकर एक जगह इकट्ठा कर रहे थे। इस तरह तीन-चार दिन में विद्यालय के आसपास का पूरा इलाका साफ हो गया। अब विद्यालय वहाँ लगने लगा। उस समय कुल 15 बच्‍चे थे। आज 48 बच्‍चों का नामांकन है। गाँव का एक भी बच्‍चा अब किसी निजी विद्यालय में पढ़ने नहीं जाता है। पाँचवीं तक सब यहीं पढ़ते हैं। मैं तीसरी से पाँचवीं तक के बच्‍चों को पढ़ाता हूँ।

जो कुछ भी समय-समय पर प्रशिक्षण में सिखाया जाता है, मैं कोशिश करता हूँ कि उसका उपयोग बच्‍चों को पढ़ाने में करूँ। मैंने टीएलएम बनाने की कोशिश की , लेकिन मैं अच्‍छे चित्र नहीं बना पाता। इसलिए मैं बच्‍चों को पढ़ाने के दौरान बने-बनाए चित्रों का उपयोग करता हूँ।

विद्यालय परिसर में हमने वृक्षारोपण करवाया, जिससे 8-10 नीम के पेड़ लग गए हैं। मैं ऐसा कोई भी काम बच्‍चों को साथ लेकर ही करता हूँ ,जिससे बच्‍चों को भी मजा आता है। गाँव वाले भी देखते हैं और कहते हैं कि देखो माट्साब भी साथ में काम करते हैं। इसलिए वे बच्‍चों को भी काम करने से मना नहीं करते।

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हरजी लाल कहते हैं-

भगवानपुरा विद्यालय के प्रधानाध्‍यापक हरजी लाल का कहना है कि ,‘सौदानसिंह विद्यालय के सभी काम करते हैं।‍ विद्यालय के निर्णयों में इनकी महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। सौदानसिंह बच्‍चों के साथ मेहनत करते हैं। बच्‍चे उनसे बहुत हिले-मिले हैं। विद्यालय में छ़ुट्टी हो जाने के बाद भी कई बार बच्‍चे रुके रहते हैं, वे तभी जाते हैं जब सब अध्‍यापक चले जाते हैं।’

कहानी अभी बाकी है.....

लेकिन सौदानसिंह जी का असली परिचय अभी भी बाकी है। उन्‍हें यह सब करने का हौसला और प्रेरणा आखिर कहाँ से मिलती है। वास्‍तव में गाँव के एक साधारण बालक से लेकर शिक्षक बनने की उनकी कहानी इससे भी कहीं अधिक रोचक है। और केवल रोचक नहीं, बल्कि वह हममें से कईयों को एक नई राह दिखाती है और हौसला देती है। आइए सुनें उनकी ही जुबानी।

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बकरी चराने वाला लड़का

मेरे एक मामा थे। उन्‍होंने हमें एक बकरी दी थी। उसी से हमारे पास 50 के करीब बकरियाँ हो गई थीं। जब मैं थोड़ा समझने लायक बना तो मुझे बकरियाँ चराने का काम दे दिया गया। मैंने लगभग आठ-दस साल तक बकरियाँ चराई हैं।

मैं जंगल में बकरियाँ चराने जाता था। पास के गाँव सालारी के बच्‍चे जंगल से होकर स्‍कूल जाते थे। उन्‍हें देखकर मुझे भी स्‍कूल जाने की इच्‍छा होती थी, लेकिन मुझे तो बकरियाँ चरानी होती थीं, मैं स्‍कूल कैसे जा सकता था। मेरे बड़े काका का लड़का भी हमारे गाँव के पास के शिक्षक बजरंग जी से पढ़ने जाने लगा। जब वह घर आता तो अपने दोस्‍तों से कहता कि वो अफसर बनेगा। उसकी बातें सुनकर भी मेरी पढ़ने की इच्‍छा होती।

एक दिन एक अजीब घटना घटी । मेरे पिताजी ने भूमिविकास बैंक से लोन ले रखा था। लेकिन घर की आर्थिंक स्थिति ठीक न होने के कारण वे लोन नहीं चुका पा रहे थे। उन दिनों यदि गाँव में कोई गाड़ी आती थी तो वैसे ही डर लगता था। एक दिन बैंक मैनेजर गाड़ी में बैठकर गाँव में आया। वो मेरे पिताजी को ढूँढने लगा। जब मेरे पिताजी ने सुना कि बैंक मैनेजर उन्‍हें ढूँढ रहा है तो वे पूरे परिवार के साथ गाँव छोड़कर भाग गए। मैं अकेला ही बचा। मैं बकरियों को छोड़कर कैसे जाता। बैंक मैनेजर मुझे पकड़कर अपने साथ बाजार ले गया। उसने सरे आम बाजार में मुझे मुर्गा बनाया करीब तीन घण्‍टे । तब मैंने सोचा, आज इसने मुझे इसलिए मुर्गा बनाया क्‍योंकि ये पढ़ा-लिखा है।

जहाँ चाह, वहाँ राह

मेरी पढ़ने की इच्‍छा और जोर मारने लगी। मैं बकरी चराने जंगल जाता ही था। जो बच्‍चे जंगल में से होकर पास के गाँव के स्‍कूल जाते थे, मैंने उनसे कहा तुम स्‍कूल से लौटते वक्‍त मुझे पढ़ाकर घर जाया करो। पर उन्‍होंने मना कर दिया। मेरे पास लाठी होती थी। मैंने उनसे कहा ये लाठी देखी है, इससे मारूँगा। बच्‍चे डर गए। उन्‍होंने मुझे सिखाना शुरू क‍र दिया।

जब उन बच्‍चों की छुट्टी होती, मैं उस समय अपनी बकरियाँ लेकर उनके लौटने वाले रास्‍ते पर पहुँच जाता। वे मुझे रोजाना एक अक्षर सिखाते थे। मैं उसका अभ्‍यास अपनी लाठी से जमीन पर करता था। मेरे लिए लाठी कलम और ज़मीन स्‍लेट थी। इस तरह लगभग दो-तीन साल चलता रहा। एक दिन हमारे गाँव में रामायण पाठ हुआ। मैंने रामायण की किताब देखी , तो तीन-चार लाइनें पढ़ लीं। मुझे लगा कि अब मैं पढ़ना सीख गया हूँ।

सन् 78 के आसपास हमारे गाँव में अकाल राहत के तहत काम चला। उस समय काम के बदले में अनाज एवं कुछ पैसे देते थे। हमारे परिवार ने भी मिट्टी डालने का काम किया। मैंने भी मिट्टी डाली। टोंक से तीन जने काम का पैसा बाँटने आए। जब मेरी बारी आई तो वे मुझे रुपए देने के लिए गिनने लगे। मेरी मजदूरी 60 रुपए हुई थी। लेकिन जब उन्‍होंने मुझे देने के लिए रुपए गिने तो 75 रुपए गिने। मैं देख रहा था। तीनों ने रुपए गिने । मैं कुछ नहीं बोला। मैंने रुपए ले लिए। मैंने 60 रुपए घर में दे दिए। बाकी 15 रुपए मेरे पास बच गए ।

मेरे पिताजी साक्षर थे। वे पंचाँग भी देखते थे। मैंने पंचाँग में हिन्‍दी-अँग्रेजी शिक्षक की पुस्‍तक का विज्ञापन देखा। उसमें किताब बुलवाने का पता भी दिया हुआ था। मैं पोस्‍ट आफिस गया और मैंने किताब के लिए एक पोस्‍टकार्ड लिख दिया। कुछ दिनों बाद किताब मेरे पास वीपीपी से आ गई। मैंने उस किताब को छुड़वा लिया। अब मैं नि‍यमित रूप से उस किताब को पढ़ता। उसमें से अँग्रेजी के मीनिंग याद करता। गाँव के जो बच्‍चे सातवीं-आठवीं में पढते थे उनको सुनाता। उनमें से कुछ कहते, तू तो हमसे ज्‍यादा जानता है। तू तो आठवीं की परीक्षा भी दे सकता है। उनमें से एक ने कहा तू कुरैशी साहब से मिल। मेरे पड़ोसी भंवरलाल ने भी मेरा उत्‍साह बढ़ाया। हमउम्र होने के नाते मैं उनसे अपने मन की बात अच्‍छी तरह कर पाता था।  

पढ़ने के लिए दर-बदर

मैं कुरैशी साहब से मिलने स्‍कूल गया। वे स्‍कूल में ही रहते थे। उन्‍होंने भी मेरी मदद करने का वादा किया। बच्‍चों की छुट्टी होने के बाद वे मुझे शाम को स्‍कूल में बुलाते और पढ़ाते। जो भी याद करने को देते, मैं याद कर लेता। एक महीने तक उन्‍होंने मुझे पढ़ाया। उसके बाद कहा कि मैं आठवीं की परीक्षा दे सकता हूँ। मैंने उनसे कहा कि मुझे स्‍कूल में दाखिल करवा दो। उन्‍होंने कहा कि स्‍कूल के स्‍टाफ से मेरी अनबन चल रही है। में दाखिल कर भी दूँगा तो परीक्षा मार्च में होगी, तब तक मेरा तबादला हो जाएगा। उन्‍होंने कहा, दूनी में एक प्राइवेट स्‍कूल वाले मेरे परिचित हैं, मैं वहाँ जाकर पढ़ लूँ। उन्‍होंने मुझे स्‍कूल के नाम एक पर्ची लिखकर दे दी।

यह सन् 81 की बात है। मैं दूनी के स्‍कूल गया। स्‍कूल वाले ने कहा, तुझे आठवीं में प्रवेश नहीं मिलेगा। तुझे छठवीं में पढ़ना होगा। मैंने छठवीं में प्रवेश ले लिया। यहाँ के अध्‍यापक बजरंग जी गणित पढ़ाते थे, मैं उनके घर पढ़ने जाता था। उन्‍होंने मुझे पढ़ाने में सहयोग किया। जब पैसे की आवश्‍यता होती तो पिताजी बकरी बेचकर पैसे भेज देते। परीक्षा हुई तो मैं 20 बच्‍चों में प्रथम आया। अगले साल मैंने स्‍कूल वाले से कहा, अब आठवीं में प्रवेश दे दो। लेकिन स्‍कूल वाले ने मना कर दिया। मैं रोज स्‍कूल जाता लेकिन कक्षा में नहीं बैठता।

बजरंग जी के मित्र जो एक सरकारी स्‍कूल में शिक्षक थे ने मुझसे कहा कि चल तुझे देवली में आठवीं में प्रवेश दिला देते हैं। मैं उनके साथ देवली आ गया। वे मुझे देवली के एक निजी स्‍कूल कल्‍पना में ले गए। वहाँ के प्रधानाचार्य से उन्‍होंने बातचीत की। उन्‍होंने कहा, तू सीधे दसवीं की परीक्षा क्‍यों नहीं देता। फिर उन्‍होंने ही मेरा दसवीं का फार्म भर दिया। मैं दसवीं की तैयारी करने लगा। सन् 82 के आसपास मैंने दसवीं की परीक्षा पास कर ली। फिर मैंने ग्‍याहरवीं पास की। इस तरह मेरी पढ़ाई का सिलसिला चल निकला। मैंने बीकॉम किया, फिर एमकॉम और फिर बीएड। और इसी साल मैंने अँग्रेजी में एमए  प्रीवियस  की परीक्षा पास कर ली है।

सन् 93 में मेरी नियुक्ति शिक्षक के पद पर हो गई। मैंने जो परिस्थितियाँ  देखीं हैं, उनको ध्‍यान में रखकर मैं अपना काम ईमानदारी से करने की कोशिश करता हूँ। जो बच्‍चे मुझे जंगल में पढ़ाते थे, उनमें से कुछ अध्‍यापक हैं, एक वकील भी है। आज जब कभी हम मिलते हैं तो उन दिनों को याद करके हँसते-हँसते आँसू भी आ जाते हैं। उन सब लोगों को मैं कभी भूल नहीं सकता।

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सच तो यह है सौदानसिंह जी कि जो आपसे एक बार मिल ले, वह आपको कभी नहीं भूलेगा। सौदानसिंह से इस नम्‍बर 09929492358 पर सम्‍पर्क किया जा सकता है ।


राजस्‍थान के  टोंक जिले के देवली ब्‍लाक में 24 से 30 जून ,2011तक शिक्षकों के लिए सर्वशिक्षा अभियान के तहत एक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया था। इस शिविर का उद्देश्‍य था  6 से 14 वर्ष तक के प्रत्‍येक बच्‍चे को शिक्षित करने के लिए आवश्‍यक कदम उठाने की तैयारी करना। शिक्षा का अधिकार विधेयक आने के बाद शासकीय स्‍तर पर भी इस सम्‍बंध में प्रयास किए जा रहे हैं। शिविर में इस विषय पर शिक्षकों के मन में कई प्रकार के सवाल और संशय थे।

एक सवाल था कि ऐसे बच्‍चे जो स्‍कूल नहीं आते हैं और जिनकी आयु भी अधिक है, हम उन्‍हें स्‍कूल में कैसे लाएँगे। उन्‍हें पढ़ाना भी कठिन होगा। चारों तरफ इस बारे में केवल निराशा का  स्‍वर ही था। इस के बीच सौदानसिंह ने खड़े होकर बोलना शुरू किया, तो मिनट भर बाद ही जैसे सन्नाटा छा गया। सौदानसिंह ने अपना ही उदाहरण सबसे पहले रखा। इस शिविर में अज़ीमप्रेमजी फाउण्‍डेशन के अकादमिक खण्‍ड समन्‍वयक (बीआरपी) देवेन्‍द्र जोशी स्रोत व्‍यक्ति के रूप में मौजूद थे। सौदानसिंह ने इस बैठक मे जितना बताया उसे उन्‍होंने नोट कर लिया। बैठक के बाद उन्‍होंने सौदानसिंह से अलग से बात की और सिलसिलेवार उनकी कहानी और उनके अध्‍यापकीय अनुभवों को लिपिबद्ध किया।

यह आलेख देवेन्‍द्र जोशी (09784594482) द्वारा भेजे गए विवरण पर आधारित है। पोर्टल के लिए इसे राजेश उत्‍साही ने तैयार किया है। आलेख के साथ जो फोटो हैं वे देवेन्‍द्र जोशी ने खासतौर पर भगवानपुरा जाकर टीचर्स ऑफ इण्डिया के लिए उतारे हैं।

अगर आपके पास भी ऐसी कोई कहानी है या आप भी किसी ऐसे शिक्षक को जानते हैं, तो उसके बारे में टीचर्स ऑफ इण्डिया में लिखिए।

टिप्पणियाँ

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