किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सोनू राम कश्यप : बदलाव हम लाकर रहेंगे

यह शिकायत आम है कि सरकारी शिक्षकों को पढ़ाने में कम और बाकी कामों में ज्यादा उपयोग किया जाता है। इसलिए जो शिक्षक शिक्षा को लेकर गम्भीर हैं वह अक्सर परेशान रहते हैं। आए दिन उन्हें किसी ना किसी प्रशिक्षण या कार्यशाला में शामिल होने बुलाया जाता है। जब ऊपर से आदेश आता है तो उन्हें मन मसोस कर वह सब करना पड़ता है ।

परन्‍तु अगर प्रशिक्षण की प्रक्रिया एवं विषय वस्तु उनके व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन से मेल खाती एवं उससे जुड़ाव पैदा करती हो तो असर भी दिखने लगते हैं। ऐसा ही कुछ हुआ सोनू राम कश्यप के साथ। शाला नेतृत्व विकास कार्यक्रम ने इनके विचारों को एक नई धार दी है।  

‘मैं इस प्रक्षिक्षण मे भाग न लेता तो मैं जीवन के अनमोल क्षण खो देता।’ यह कहना है सोनू राम कश्यप का जो छत्‍तीसगढ़ के बस्तर जिले की नवीन प्राथमिक शाला, अटारगुड़ा, पोटानार में प्रधान शिक्षक हैं। हाल ही में उन्‍होंने अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के सहयोग से बस्तर डाइट द्वारा आयोजित “ स्कूल नेतृत्व विकास कार्यक्रम” में हिस्सा लिया है।  

उनका स्कूल जगदलपुर से तकरीबन 15 किमी दूर जगदलपुर-चित्रकोट मुख्य मार्ग पर अटारगुड़ा के पास स्थित है। इस प्राथमिक शाला में कुल 38 विद्यार्थी हैं। जिनमें 21 बालक और 17 बालिकाएँ हैं और सभी आदिवासी हैं। यहाँ सोनू राम कश्यप के अलावा और 2 शिक्षिकाएँ हैं। दोनों शिक्षा कर्मी हैं।  सुश्री अनुराधा सेन जगदलपुर से रोज आना-जाना करती हैं और दूसरी सुश्री मायावती बघेल इसी गाँव के आदिवासी समुदाय से हैं। कश्यप खुद भी आदिवासी समुदाय से हैं। उनका घर यहाँ से 12 किमी दूर जगदलपुर के पास पंडरीपानी में है। वे भी रोज आना-जाना करते हैं। कभी-कभी स्कूल गाँव में भी रह जाते हैं जिसके लिए एक किराये का मकान भी ले रखा है।

स्‍कूल के बच्चों की मातृभाषा हल्‍बी है। पाठ्यक्रम में कुछ अध्याय हल्‍बी में भी है। बच्चे हल्‍बी  में पढ़ते वक्त काफी खुश और आत्मविश्वास से भरे नजर आ रहे थे। सभी सवालों के जवाब एक स्वर में बुलन्‍द आवाज में दे रहे थे। सोनू उन्हें बस्तर से गुजर रही इन्द्रावती नदी के बारे में पढ़ा रहे थे। जब उन्होंने सवाल किया कि इस नदी का उद्गम स्थल कहाँ है तो सभी बच्चों ने समवेत स्‍वर में ओड़ीशा कहा। जाहिर है मातृभाषा में अध्ययन का अपना मजा ही कुछ और है।

अधिकांश ग्रामीण स्कूल की लड़कियाँ शिक्षिका बनना चाहती हैं। यहाँ की लड़कियों ने भी अमूमन यही बताया।  लड़कों में से कुछ शिक्षक, कुछ पुलिस और सेना में शामिल होने की मंशा रखते हैं । वहीं एक चौकीदार और दूसरा चपरासी बनना चाहता है।  

सोनू राम कश्यप का बचपन से सपना रहा है शिक्षक बनना। वे किसी मजबूरी या विकल्प के अभाव में शिक्षक नहीं बने, बल्कि अपने मन से और अपने पिताजी की इच्छा के खिलाफ शिक्षक बने। उनके पिताजी जंगल विभाग में दफेदार थे। वे चाहते थे कि सोनू भी जंगल विभाग में ज्‍वाइन करें। पिता चौथी तक पढ़े थे और माँ पहली या दूसरी। सोनू बताते हैं, ‘‘जब मैं पढ़ रहा था, तब मेरे पास कृषि विकास अधिकारी और कम्‍पाउंडर की नौकरी के लिए ऑफर लेटर आए पर मैं नहीं गया। पिता जी ने भी कहा और आगे पढ़ो।  इस बीच शिक्षक का भी ऑफर लेटर आया। मेरे और माँ के बीच समझौता हो हुआ कि वे पिता जी को इस ऑफर लेटर के बारे में नहीं बताएँगी। मैंने पिता जी से सिर्फ यही कहा कि मैं जगदलपुर घूमने जा रहा हूँ। वहाँ जाकर मैंने मेडिकल वगैरह की जो भी औपचारिकताएँ थीं, वे पूरी कीं और दन्‍तेवाड़ा तहसील के कोवाकुण्डा गाँव के स्कूल में ज्‍वाइन कर लिया। दन्तेवाड़ा अब जिला बन गया है। बाद में पिता जी को बताया। तब वह क्या बोलते ? उनका कहना था, मेरा बात तो तूने मानी नहीं।’’

तो आखिर आप शिक्षक क्यों बनना चाहते थे ? इसके जवाब में उनका कहना था कि , ‘‘जैसे मेरे यहाँ भाई-बहन जो भी हैं आगे नहीं बढ़ पाए।  हालाँकि माँ-पिता जी चाहते थे कि सब पढ़ें और आगे बढ़ें। लेकिन वह हो नहीं पाया। इसलिए मेरे मन में था कि मैं ज्यादा से ज्यादा बच्चों को गाइड कर सकूँ। जब मैं दन्‍तेवाड़ा के कोवाकुण्डा में गया तब वह बहुत ही दूरदराज का इलाका था। जहाँ जाना भी मुश्किल होता था। स्कूल की अपनी बिल्डिंग भी नहीं थी। वहाँ थानागुड़ी और ऐसी ही किसी जगह पर स्कूल लगता था। वहाँ रहने के लिए घर भी नहीं मिलता था। मैं एक अटैची लेके गया था, जिसमें मेरे सर्टिफिकेट और ज्‍वाइनिंग लेटर था। मैंने अटैची को ईंट वगैरह के सहारे रखा था जहाँ दीमक मेरे सर्टिफिकेट और दूसरे कागजात चटकर गईं। मैं आगे की पढ़ाई भी नहीं कर पाया, क्योंकि सभी जगह सर्टिफिकेट की जरूरत होती है। हालाँकि ज्‍वाइनिंग लेटर दूसरे मित्रों से मिल गया। सर्टिफिकेट की कॉपी भी जगदलपुर ऑफिस में थी। जिसे मैं निकलवा सकता था, पर वह मैं कभी कर नहीं पाया।

वहाँ जब था तो काफी मुश्किलों का भी सामना करना पड़ता था। साइकिल से जाता था और गाँव पहुँचने के लिए नदी पार करके जाना होता था। बांस और पत्तियों से बनी छतरी को साइकिल के दोनों चक्कों में बाँधकर पार होते थे। वहीं 10-15 दिन का खाने-पीने का सामान लेके जाना होता था, क्योंकि नदी अक्सर उफान पर होती थी और आप बाकी दुनिया से कट जाते थे।

वहाँ भाषा की भी समस्या थी, बच्चे गोण्‍डी बोलते थे और हमें गोण्‍डी नहीं आती थी।    

यही नहीं वहाँ नौकरी करने के चलते खुद के बच्चों की पढ़ाई ठीक से नहीं हो पाई। बेटा आठवीं पढ़ने के बाद किसानी कर रहा है। बेटी की दसवीं के बाद शादी हो गई। बाहर रहने के कारण यह सब हुआ। छुट्टी में हम घर मेहमान की तरह आते थे फिर वापस चले जाते थे। इसलिए उन्हें भी गाइड नहीं कर पाए।  हालाँकि हम आवश्यक संसाधन मुहैया कराते थे पर उन पर ध्‍यान नहीं दे पाए। मेरे 2 पोते पोती हैं। मैं उन्हें जगदलपुर के एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहा हूँ। उम्र अभी 6 साल से भी कम है। शासकीय स्कूल में तो 6 साल के बाद एडमीशन देते हैं। नर्सरी में उनका स्तर सुधारने के लिए वहाँ एडमीशन करवाया है। जो गलती अपने बच्चों के साथ हुई  वह गलती पोता पोतियों के साथ ना हो इसलिए वह उन्हें अपने साथ रखे हैं और गाइड भी करते हैं।

अभी गाँव वालों से हमारा रिश्ता बहुत ही औपचारिक है उसमें आत्मीयता नहीं होती है। अभी जब हम गाँव में आते-जाते हैं तो लोग हमें सर नमस्ते जरूर कहते हैं।  पर जब हम कुछ बोलते हैं तो वह सोचते हैं कि सरकारी आदमी हैं, ऐसा बोलते रहते हैं, पर कुछ करते नहीं है। इस सोच को अब हमें अपने काम के जरिये बदलना है। ”

उन्होंने इसकी शुरुआत भी कर दी है। प्रशिक्षण कार्यक्रम के बाद स्कूलों में सहभागिता शाला मूल्यांकन किया गया तब उन्‍होंने स्कूल से सम्बन्धित सभी लोगों को आमंत्रित किया। उन्हें बताया कि गाँव के स्कूल को मॉडल स्कूल के बतौर चयन किया गया है। जब गाँव वाले, पालक और पंच सब आए तो सबसे पहले उनका स्वागत किया गया, बाकायदा उनका पैर धुलवाए, टीका लगाया और पूरे सम्मान के साथ उन्हें बैठक की जगह ले गए।  

हमने पूछा कि ऐसा क्यों किया?  उनका जवाब था, “ ताकि ये लोग समझें कि हम भी घर यानी स्‍कूल के लोग हैं,  पहले ऐसा नहीं करते थे। भले आइये, बैठिए जरूर बोलते थे।  पर वह आदर नहीं देते थे जैसे घर के आदमी या मेहमान को देते हैं। हम मेहमानों को इज्जत देते हैं और अपने सम्‍बन्‍ध को मजबूत बनाए रखते हैं। तो ठीक उसी तरीके से अब हम गाँव वालों से भी सम्‍बन्‍ध रखना चाहते हैं। ताकि गाँव वालों को यह अहसास हो कि गुरु जी ही नहीं उनका मन भी बदला है। शिक्षक या प्रधान शिक्षक और स्कूल की वह पुरानी छवि बदले। सहभागिता शाला मूल्यांकन कार्यक्रम के दौरान ग्रामीण आए तो हमने सबसे कहा कि आप एक बार स्कूल का अन्‍दर, बाहर चारों ओर पूरा मुआयना कर लें और यह देखेँ की कहाँ क्या है, क्या नहीं है, किस चीज की आवश्यकता है या क्या है पर उपयोगी नहीं है आदि। जब हम उनसे इस तरह से पेश आए तो पहले तो थोड़ा हमें अजीब निगाहों से देखा जैसे मानो पूछ रहे हों कि आप को ये क्या हो गया है, आप लोग काफी बदल गए हैं। तब हमें भी बड़ा सुकून मिला। ”

जाहिर है इस तरह से एक तरफ जहाँ समुदाय को अपने बच्चों के स्कूल को जानने और समझने का अवसर मिला वहीं स्कूल और शिक्षकों को भी समुदाय से रिश्ता कायम करने का एक बहुत अच्छा मौका मिला।

पालक और ग्रामीण सहभागिता शाला मूल्यांकन के जरिये स्कूल की समस्याओं से न केवल रूबरू हुए बल्कि उन्‍होंने कुछ समस्याओं का हल भी ढूँढने की कोशिश की। स्कूल में चार दीवारी नहीं है, शेड के साथ भोजनालय की आवश्यकता की बात कही। वहीं स्कूल में ट्यूब वेल भी नहीं है, यहाँ नल खुदाई की कई बार कोशिश हुई है पर कामयाबी नहीं मिली है इसलिए अब पीएचसी विभाग ने पाइप लाइन बिछाके पानी लाने की बात कही है। वहीं खेल मैदान के लिए शाला प्रबन्‍धन कमेटी ने अस्थाई व्यवस्था करने की बात कही है। जाहिर है इस तरह इन पुरानी समस्याओं का हल अब या तो होने लगा है या उस पर चर्चा शुरू हो गई है।

सोनू राम कश्‍यप शायद इन सब बातों के बारे में पहले भी सोचते थे। पर इस प्रशिक्षण ने उन्‍हें हौसला दिया है, जिससे वे उत्साहित नजर आ रहे हैं। वे कहते हैं,  “ यहाँ प्रशिक्षण में आने से हमें काफी कुछ सीखने को मिला। सिर्फ मैं नहीं बल्कि हमारे बाकी साथी भी बहुत प्रभावित है जिससे अब हमारे काम करने की इच्छा काफी बढ़ गई है। अब हम अपने स्‍कूल को मॉडल स्कूल की तरह देख रहे हैं। इसमें हम अपने आपको सुधारना चाहते हैं, बच्चों को, समुदाय को, जन प्रतिनिधियों को सुधारना चाहते हैं और अन्ततः समाज को बदलना चाहते हैं। हम कर सकते हैं मतलब कर सकते हैं। हम और हमारे साथी मिलकर करेंगे। काम भले धीरे हो पर जरूर होगा।”


(अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, जिला संस्‍थान,धमतरी,छत्‍तीसगढ़ से पुरुषोत्‍तम ठाकुर द्वारा भेजे गए विवरण का सम्‍पादित रूप। फोटो : पुरुषोत्‍तम ठाकुर)  

    

 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

अपने बच्‍चों की अनदेखी कर सम्‍पूर्ण आदिवासी समुदाय के बच्‍चों के लिए सोनू राम कश्‍यप का समर्पण प्रणम्‍य है ा आज तो शिक्षक पहले अपने बच्‍चों की देखरेख में ध्‍यान देता है ा वही सच्‍चा शिक्षक है जो अपने और विद्यालय के बच्‍चों में अन्‍तर नहीं करता ा

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