किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सेण्टर फॉर लर्निंग (सी.एफ.एल.) स्‍कूल के अनुभव

कमला मुकुन्दा

हमारे सरकारी स्कूलों के साथ हजारों लोग कार्य कर रहे हैं जो विद्यार्थियों के लिए अधिगम की परिस्थितियों और मनोवैज्ञानिक परिणामों में सुधार लाने में लगे हुए हैं। इन समर्पित लोगों के लिए मेरे हृदय में गहरी सराहना और प्रशंसा है। मैं खुद एक गैर-औपचारिक निजी स्कूल सेण्टर फॉर लर्निंग (सी.एफ.एल.) में पढ़ाती हूँ और हममें से अधिकांश शिक्षक और विद्यार्थी शहरी पृष्ठभूमि के हैं। सी.एफ.एल. के अनेक उद्देश्यों में से एक है - अपने जीवन से बाहर के जीवन और दुनिया के साथ जुड़ना, समय-समय पर अपनी सुख-सुविधा की स्थिति और इच्छा-सन्तुष्टि के भाव से बाहर निकलना। इस कार्य को हम कई प्रकार से करते हैं जिनमें से एक है पास के गाँव के प्राथमिक स्कूल के विद्यार्थियों के साथ जुड़ना। शुरू से ही हमने देखा है कि वरदेनहल्ली स्कूल के बच्चे भी इन अन्तःक्रियाओं को महत्त्वपूर्ण समझते हैं और इसलिए हम हर साल उनके साथ मिल-जुलकर कार्य करते हैं। इन विविध और समृद्ध मुलाकातों में हमने जो देखा और सीखा, आशा है कि मैं इस लेख में उनमें से कुछ अनुभव आपके साथ साझा कर पाऊँगी। लेकिन यह तय है कि हम सरकारी स्कूलों के साथ पूर्णकालिक कार्य करने वालों के अनुभवों की न तो गहनता को साझा कर सकते हैं और न ही व्यापकता को। इसलिए मैं बड़ी विनम्रता के साथ इन बिन्दुओं को आपके समक्ष रख रही हूँ।  

सेण्टर फॉर लर्निंग नामक हमारा स्कूल वरदेनहल्ली गाँव में स्थित है जो  बेंगलुरु से 40 किलोमीटर की दूरी पर है। इसमें लगभग 75 विद्यार्थी हैं। इस गाँव में करीब 100 घर हैं जिनकी आर्थिक सम्पन्नता के स्तर भिन्न-भिन्न हैं।  ज्यादातर परिवारों के पास कुछ एकड़ जमीन है, कुछ के पास जमीन के साथ एक दुकान या एक ट्रैक्टर भी है और कुछ पेट भरने के लिए दैनिक मजदूरी करते हैं। गाँव में दो कमरों का एक प्राथमिक स्कूल है जिसे दो समर्पित और स्नेही शिक्षक चलाते हैं। इसमें 22 बच्चे हैं और पिछले कुछ सालों में बच्चों की संख्या बड़े नाटकीय ढंग से कम होती जा रही है। (जब हम 2000 में पहली बार यहाँ आए तो इस प्राथमिक स्कूल में करीब 60 बच्चे थे।) हमारे पड़ोसी गाँव बचेनहट्टी में एक उच्च प्राथमिक स्कूल है। वरदेनहल्ली स्कूल के बच्चे पाँचवीं कक्षा के बाद वहाँ चले जाते हैं। इस स्कूल में आसपास के गाँवों के कई बच्चे भी आते हैं। इसके बावजूद हाल के वर्षों में नामांकन की संख्या कम हुई है। शायद इसका कारण देश भर में व्याप्त कुछ बडे़ सामाजिक कारक हैं।

वर्ष 2000 से हम सरकारी और सी.एफ.एल के विद्यार्थियों के संयुक्त समूह (मिडिल या सीनियर स्कूल) के साथ छोटी-छोटी प्रायोजनाएँ करते रहे हैं। पिछले सालों में हमने विद्यार्थियों के साथ ये क्रियाकलाप किए हैं : द्विभाषी नाटक, खेल-खेलना, गणित, विज्ञान, इतिहास, अँग्रेजी गाने, नृत्य, मिट्टी के बर्तन बनाना, कला और क्राफ्ट (पेंटिंग, स्केचिंग, कढ़ाई, कोलाज, पेपर वीविंग) और द्वितीय भाषा के रूप में अँग्रेजी का औपचारिक कार्यक्रम। आमतौर पर यह कार्यक्रम तीन महीने का होता है जिसमें एक सप्ताह में नब्बे मिनट का एक सत्र होता है।

बहुत थोड़े समय में ही गाँव के स्कूल के बच्चे हमारे और हमारे विद्यार्थियों के साथ स्नेह और विश्वास के सूत्र में बँध जाते हैं। वे इन साप्ताहिक अन्तःक्रियाओं को लेकर उत्सुक और उत्साहित रहते हैं, कुछ तो इसलिए कि बाहर के लोगों के साथ समय बिताने का नयापन उन्हें अच्छा लगता है कुछ उन क्रियाकलापों की वजह से जो हम उनके साथ करते हैं। वे कुछ नया जानने और हम जो कुछ भी सुझाते हैं उसे करने के लिए उत्सुक रहते हैं। कुछ बच्चे (ज्यादातर गाँव के गरीब, निम्न जाति के परिवार की लड़कियाँ) शर्मीले होते हैं। वरदेनहल्ली में जाति-वर्ग का परस्पर सम्बन्ध स्पष्ट है और आर्थिक सम्पन्नता, वर्ण, आकार और आत्मविश्वास का स्तर बच्चों में नजर आता है। वे शायद बड़ों की देखा-देखी अपनी खुद की श्रेणियाँ बना लेते हैं कि वे किसके साथ काम करेंगे या किसके पास बैठेंगे।

इन बच्चों के सर्वथा आज्ञाकारी और नियंत्रित व्यवहार को अचानक ही अनियंत्रित और शरारती व्यवहार में बदलने में देर नहीं लगती! जब हम उनसे मिलने उनके स्कूल जाते हैं तो वे बड़ा ‘शिष्ट और सभ्य’ व्यवहार करते हैं जो सी.एफ.एल. में आने के शुरुआती एक-दो हफ्तों तक जारी रहता है।  यहाँ हम उन्हें जिन स्थानों में क्रियाकलाप करवाते हैं वह कुछ महत्त्वपूर्ण मायनों में अपेक्षाकृत असंरचित होता है: कोई बेंच या डेस्क नहीं होती ताकि वे आराम से चल-फिर सकें, उनके ध्यान को एक ही ओर केन्द्रित करने के लिए कोई श्यामपट्ट नहीं होता, उन्हें व्यस्त रखने के लिए कोई यांत्रिक कार्य नहीं करवाया जाता। महत्त्वपूर्ण बात यह कि उन्हें खुलकर चलने-फिरने के लिए बड़ा स्थान मिलता है और हम चाहते हैं कि उन्हें हर सत्र में कुछ समय इधर-उधर खुलकर दौड़ने का मौका मिले। इस प्रकार के कुछ सत्रों के बाद वे थोड़े से अनियंत्रित हो जाते हैं। जब हमारे सी.एफ.एल. के विद्यार्थी इस गड़बड़ी को सम्भालने की कोशिश में लगे होते हैं तो मुझे यह सब देखने में बहुत आनन्द आता है। जब स्थिति काबू से बाहर हो जाती है तब वे उन्हें घुड़की देते हैं कि आण्टी को बुलाएँगे या आण्टी आ रही हैं, और बात बन जाती है!

जैसा कि मैंने पहले कहा, हम जान-बूझकर ऐसे क्रियाकलाप करवाते हैं जिनसे बच्चों को स्वतंत्र रूप से सोचने और अपनी अभिव्यक्ति तथा रचनात्मकता को खोजने का मौका मिले। इन बच्चों को दोहराना, नकल करना और कोरस में बोलना सिखाया गया है और हम उन कारणों को समझ भी सकते हैं। सी.एफ.एल. के सत्रों में उनसे कहा जाता हैः“तुम क्या सोचते हो?” या ’’उसकी किताब मत देखो, तुमको जो नजर आ रहा है तुम उसी का चित्र बनाओ।” हमारा अनुभव कुछ ऐसा रहा है: जब इन बच्चों से अपनी इच्छानुसार कोई चित्र बनाने को कहा जाता है तो ज्यादातर बच्चे तीन सीढ़ियों वाले भारतीय ध्वज का चित्र बना देते हैं। जब उनसे पौधे का चित्र बनाने को कहा जाता है तो सभी करीब-करीब एक जैसा पौधा ही बना देते हैं। तब हम उन्हें एक पौधे के सामने बिठाकर कहते हैं: इस पौधे का चित्र बनाओ। फिर भी कुछ बच्चे अपनी कल्पना से उसी निश्चित प्रकार के पौधे का चित्र बनाते हैं। आखिरकार बार-बार और धैर्यपूर्वक प्रेरित करने के बाद वे अपने स्वयं के अवलोकनानुसार चित्र बनाने लगते हैं और यह सुन्दर नजारा देखने लायक होता है। एक बार हमने कक्षा 7 के विद्यार्थियों के सामने एक घनाकार डिब्बा रखा और उसका चित्र बनाने को कहा। इसके पीछे विचार यह था कि वे त्रिआयामीय वस्तु को कागज के द्विआयामीय तल पर चित्रित करना सीखें। जिसने इस तरकीब (चित्र देखिए) को न सीखा हो, उसके लिए यह आसान काम नहीं और वे बच्चे ऐसा कुछ नहीं जानते थे कि जिसे तुरन्त कागज पर उतार सकें। पर इस प्रक्रिया में कुछ ऐसे चित्र सामने आए जो बहुत असामान्य और रचनात्मक थे। लेकिन जैसे ही हमने किसी बच्चे की ड्रॉइंग को अच्छा या रोचक कहा वैसे ही दूसरे बच्चों ने कोशिश करना छोड़कर उसी चित्र की नकल करने की कोशिश की।

इस प्रवृत्ति की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब हम पाँचवीं कक्षा के बच्चों के साथ इतिहास विषय में प्रायोजना कार्य कर रहे थे (विचारों और प्रेरणा के लिए हम दीपा धनराज की फिल्म का उपयोग कर रहे थे)। बच्चों ने अपने दादा-दादी से शुरुआत करते हुए वंशवृक्ष का चित्र बनाना सीखा और फिर उन्हें अपने परिवार के सदस्यों से जितने सम्भव हों उतने नाम पता करके अपने परिवार का वंशवृक्ष बनाना था। अगले हफ्ते जब मैंने उनसे अपने चित्र दिखाने को कहा तो लड़कियों का समूह धीरे-धीरे हँसने लगा और उन्होंने अपने-अपने चित्र दिखाए - सारे वंशवृक्ष एक समान थे! उन्होंने बड़ी खुशी-खुशी मुझे बताया कि उन सबने अनसूया (वह कक्षा की मानी हुई ‘अच्छी छात्रा’ थी) के चित्र की नकल की थी। फिर मैंने लड़कों से चित्र के बारे में पूछा। तो उनमें से एक ने अनसूया का चित्र छीना और नकल करने लगा! बच्चों की हँसी के बीच उन्हें यह समझाने में थोड़ा समय लगा कि अनसूया की दादी सबकी दादी नहीं हैं आदि...।

इन सालों में हमने कुछ ऐसी बातें देखी हैं जिनसे हमें चिन्ता होती है, जो मन पर असर करती हैं क्योंकि हम सी.एफ.एल. के विद्यार्थियों से तुलना करते हैं। पहली बात तो यह कि वरदेनहल्ली के विद्यार्थी सी.एफ.एल. के अपनी ही उम्र के विद्यार्थियों की तुलना में आकार में औसतन काफी छोटे हैं। हालाँकि मैंने सामान्य आँकड़े देखे हैं और मैं यह जानती हूँ कि भारत के ग्रामीण बच्चे अविकसित होते हैं लेकिन अपनी आँखों से इसे देखना किसी आघात से कम नहीं, खासतौर पर इसलिए कि यह गाँव इतना गरीब नहीं है। दूसरी बात ये कि वैसे तो ये बच्चे ऊर्जा से भरपूर और तीव्रबुद्धि हैं लेकिन हमने यह पाया कि हमारे कुछ क्रियाकलाप जो हमें अपेक्षाकृत ‘आसान’ लगते हैं, उन्हें काफी कठिन लगते हैं जैसे ताली बजाते हुए लय बनाए रखना।

और तीसरी बात, हमने अँग्रेजी उच्चारण और व्याकरण सीखने में लगातार होने वाली समस्या को भी देखा है (हमारे सिखाए हुए सरल अँग्रेजी वाक्यों का एक ही हफ्ते में गलत हो जाना, स्मृति में इन विकृत रूपों को हमेशा पक्का करते रहना)। शायद इन अवलोकनों के बीच एक सम्बन्ध है। मनोवैज्ञानिक शोध के अनुसार स्कूल और जीवन में मस्तिष्क की क्षमताओं के समूह का बहुत महत्त्व है जिसे ‘कार्यकारी कार्य’ कहा जाता है (इसके लिए संज्ञानात्मक नियंत्रण और पर्यवेक्षी अवधानिक प्रणाली शब्द भी मिलते हैं)। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के हाल के एक प्रकाशन में इसे यूँ समझाया गया है:

“...पकड़ बनाए रखने और जानकारी के साथ कार्य करने की क्षमता, विकर्षणों को अलग करना और बदल पाना... इन क्षमताओं को वैज्ञानिक कार्यकारी कार्य और आत्म नियमन कहते हैं।” 

वरदेनहल्ली के बच्चों में नजर आने वाली कठिनाइयों के लिए यह बात ठीक बैठती है।

इन कठिनाइयों का मूल कारण क्या हो सकता है? क्या वरदेनहल्ली के बच्चों को अपने घर, पड़ोस और स्कूल में संज्ञानात्मक चुनौतीपूर्ण गतिविधियों के कम अवसर और जानकारी मिलती है जैसे कि पढ़ना या घर के भीतर और बाहर के खेल खेलना? या फिर यह पोषण से सम्बधित मुद्दा है जिसकी शुरुआत बचपन से ही हो जाती है? 2007 का Lancet paper जिसका शीर्षक है Child development: risk factors for adverse outcomes in developing countries, यह बताता है कि विकासशील देशों में लाखों बच्चों के लिए स्कूल की तैयारी और उपलब्धि को चार खतरों से समझौता करना पड़ता है: अवरुद्ध विकास, अपर्याप्त संज्ञानात्मक उद्दीपन और आयोडीन की कमी व लोहे की कमी से एनीमिया।

पोषण, अवरुद्ध विकास और कार्यकारी कार्य के बीच का सम्बन्ध हमें महत्त्वपूर्ण लगता है। सी.एफ.एल. में अण्डे, दूध और फल देने शुरू कर दिए गए और कुछ सालों के बाद सरकार ने भी ऐसी ही योजना शुरू की जो वाकई एक अच्छी बात थी। प्राथमिक स्कूल के शिक्षक भिन्न प्रकार की रोचक गतिविधियाँ करवा रहे हैं जिसका श्रेय उनकी सेवाकालीन कार्यशालाओं और शिक्षक के रूप में उनके अपने संवर्धन को जाता है। इतने सालों से अपने विद्यार्थियों के साथ काम करने के लिए समय देने के हमारे अनुरोध को जिस खुलेपन के साथ इन शिक्षकों ने स्वीकार किया उसके लिए हम उनके आभारी हैं-यह एहसास मुझे हाल के एक अनुभव से हुआ। पास के एक अन्य स्कूल में हमारे सीनियर छठी और आठवीं कक्षा के बच्चों के साथ अरविन्द गुप्ता के Pumps from the Dump पर कार्य कर रहे थे। वहाँ के नए प्रधानाध्यापक ने मुझसे कहा, “अगर आप पाठ्यपुस्तक में से कुछ करवातीं तो विद्यार्थियों के लिए उपयोगी होता। आप जो करवा रही हैं उससे तो उन्हें कोई सहायता नहीं मिलने वाली।” वरदेनहल्ली स्कूल के शिक्षकों ने कभी हमारे सत्रों के महत्त्व पर सवाल खड़े नहीं किए और आशा है कि हम उनके इस विश्वास के लायक हैं।

वरदेनहल्ली स्कूल के विद्यार्थियों के साथ अन्तःक्रिया के फलस्वरूप हमने बहुत कुछ सीखा और पाया। बच्चों ने बिना किसी शर्त के हमें अपना स्नेह दिया। उनका स्नेह, उनके अनुभवों की गहनता, सत्रों का उत्साह और उसकी ऊर्जा का मिश्रण अत्यन्त मादक था! इन बच्चों के साथ काम करते समय सी.एफ.एल. के विद्यार्थी भी इतना धैर्य और और इतनी दया दिखाते हैं कि शायद एक-दूसरे के साथ भी न दिखाते हों। इस बात को समझने का उनके लिए यह एक अच्छा अवसर है कि हमें अन्य लोगों के अधिगम के लिए जिम्मेदार होना चाहिए।

References:      

  1. In Brief. Executive Function: Skills for Life and Learning. www.developingchild.harvard.edu
  2. Walker S P, Wachs T, Gardner J M, Lozoff B, Wasserman G A, Pollit G, Carter J A (2007). Child development: risk factors for adverse outcomes in developing countries. Lancet.  369: 145–57

कमला मुकुन्दा सेण्टर फॉर लर्निंग (www.cfl.in) में कार्यरत हैं जो शिक्षकों द्वारा चलाया जाने वाला एक छोटा स्कूल है और बेंगलुरु की सीमा पर स्थित है। उन्हें मनोविज्ञान और शिक्षा में रुचि है और इन क्षेत्रों के विचारों को शिक्षकों और शिक्षक-प्रशिक्षकों तक पहुँचाना भी उन्हें अच्छा लगता है। उन्होंने What Did You Ask at School Today? शीर्षक से एक पुस्तक लिखी है जिसे 2009 में Harper collins India द्वारा प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक का हिन्दी  अनुवाद ’स्कूल में तुमने आज क्या पूछा ?’ शीर्षक से एकलव्य ने प्रकाशित किया है। उनसे kamala.mukunda@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है। 

यह अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन की अँग्रेजी पत्रिका ‘लर्निंग कर्व’ के Public Education System in India  Issue XXV, January  2016 अंक में प्रकाशित Experiences with the Varadenahalli School Children : Kamala V Mukunda का हिन्‍दी अनुवाद है। अनुवाद : नलिनी रावल

 

                

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