किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सीताराम चाँवला : कुशल नेतृत्व और गाँव का सहयोग

सर्वप्रथम मैं राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय साण्डला में आया। यहाँ पर बालकों की संख्या कम थी। विद्यालय स्टाफ पूरा था। संस्था प्रमुख होने के कारण मेरी स्कूल मे नामांकन बढ़ाने की जिम्मेदारी सर्वोपरी हो गई थी। मेरी नियुक्ति के समय ज्यादातर बालक-बालिकाएँ बाँसेड़ा व टोडारायसिंह प्राइवेट विद्यालय में पढ़ने जाते थे।

प्रयास

सबसे पहले यह पता लगाया कि इस गाँव में अनामांकित,ड्रापआउट बच्चे कितने और कौन- कौन से घरों में हैं। ग्राम का भ्रमण किया तथा ग्रामवासियों से इस बात का पता लगाने का प्रयास किया कि किस कारण से बालक-बालिकाओं को पढ़ने हेतु बाहर जाना पड़ रहा है। अभिभावकों ने बताया कि

  1. प्राइवेट विद्यालय में पढ़ाई अच्छी होती है।
  2. संस्कारयुक्त शिक्षा दी जाती है।
  3. बच्चे पढ़ने में रुचि रखते हैं। बच्चे नियमित पढ़ने स्कूल जाते हैं।
  4. स्कूल वाले अध्यापक हमसे बातचीत भी करते रहते हैं।
  5. बच्चे घर पर आकर स्कूल के दिए कार्य भी करते है।
  6. सरकारी स्कूल में बच्चे अक्सर घूमते हुए ही दिखाई देते हैं।
  7. अध्यापकों का बच्चों पर ध्यान नहीं होता है।

मैंने उपयुक्त बातों को साथी अध्यापकों के सामने रखा और विचार-विमर्श किया। मैंने अध्यापकों से कहा कि हमें हमारी शाला को प्राईवेट विद्यालयों से बेहतर करना है और नामांकन बढ़ाना है। हमने गाँववासियों के विचारों को ध्यान में रखते हुए निम्न बातों पर निर्णय लिया-

  1. हम सभी बच्चों व अभिभावकों से लगातार सम्पर्क करेंगे। विद्यालय समय से पूर्व व बाद में सम्पर्क करेंगे।
  2. विद्यालय में समय से पूर्व आएँगे।
  3. प्रार्थना सभा को रुचि से सम्पन्न करवाएँगे।
  4. खेल-खेल में शिक्षा को बढ़ावा देंगे।
  5. टी.एल.एम. का उपयोग करते हुए रुचिपूर्ण शिक्षा बच्चों को देंगे।
  6. हर 15 दिन में अध्ययन, ठहराव, शैक्षिक स्तर पर चर्चा की जाएगी।
  7. बच्चों के गृह कार्य पर ध्यान दिया जाएगा।
  8. शाला में संचालित गतिविधियों में ग्रामवासियों को शामिल किया जाएगा।
  9. बच्चों की साफ सफाई, पेयजल,मूत्रालय,शौचालय की साफ सफाई,खेल मैदान की साफ सफाई एवं खेल सामग्री की व्यवस्था की जाएगी।
  10. शाला की सभी व्यवस्थाओं के सुचारू रूप से संचालित करने के लिए जिम्मेदारियों का बंटवारा किया जाएगा।

मेरा और स्कूल साथियों का प्रयास

मेरे इस मत से सभी साथी अध्यापक भी सहमत हुए तथा सभी ने उसी के अनुसार कार्य प्रारम्भ कर दिया। सभी ने अपने स्तर पर प्रयास शुरू किए। मैंने सर्वप्रथम बालक-बालिकाओं के नामांकन व ठहराव पर जोर दिया। इस पर अपने स्तर पर मंथन किया गया। मैंने निर्णय किया कि इस प्रयास में मैं सफल कैसे होऊँगा, इस पर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। मैंने लगातार प्रतिदिन शाला समय से पूर्व अभिभावकों से सम्पर्क बनाए रखा तथा सर्वप्रथम उन बालक-बालिकाओं की सूची तैयार की जो बाँसेड़ा व टोडारायसिंह प्राइवेट विद्यालय में पढ़ने जाते हैं। उसके बाद उनके अभिभावकों को समझाया, बताया कि सरकारी विद्यालय के अध्यापक की क्या-क्या योग्यताएँ होती हैं। बच्चों को किस प्रकार का अध्ययन करवाते हैं। हमारे व उनके बीच में अध्ययन करवाने में क्या अन्तर है। हमें बच्चों को किस प्रकार का ज्ञान देना चाहिए, शिक्षा में नयापन कैसे लाया जाए इस हेतु सरकार द्वारा प्रतिवर्ष प्रशिक्षण दिया जाता है। हम सरकारी अध्यापक शिक्षा में होने वाले नवाचारों से अवगत होते रहते हैं। इस तरह से अभिभावकों को समझाया और बताया कि हम बच्चों को वास्तविक एवं नवाचारयुक्त ज्ञान प्रदान करते हैं और करवाएँगे। इस बात का जिक्र करने मैं जन सम्पर्क पर जाता वहीं पर विस्तार से कहता कि हम आपके अपने हैं, ये बच्चे हमारे हैं, मैं बच्चों को ज्यादा ज्ञान प्रदान करने हेतु निरन्तर व सतत् प्रयत्नशील रहूँगा, इस बात का विश्वास मैंने मेरे ग्रामवासियों को दिलाया और कहा कि आगामी सत्र में जब भी विद्यालय में प्रवेश प्रारम्भ हो बालकों को स्थानीय सरकारी विद्यालय में प्रवेश दिलवाया जाए।

मेरे उक्त आग्रह को अभिभावकों ने भी सहर्ष स्वीकार किया लोगों की  कार्यक्रम में भागीदारी बनी, कार्यक्रम की सराहना की गई। मेरे विद्यालय से लोगों का जुड़ाव होने लगा। स्टाफ का समय पूर्व विद्यालय में आना, मेरा स्कूल स्टाफ के साथ तारतम्यता से कार्य करना और स्टाफ के साथ शाला में अध्यापन का व्यवस्थित वातावरण तैयार करना, प्रार्थना सत्र में रुचि उत्पन्न करना, विद्यालय को साफ स्वच्छ रखना आदि बातों का गाँव वालों पर असर हुआ। विद्यालय का कुशल संचालन गाँव वालों को पसन्द आया, बच्चों में भी बदलाव महसूस किया। मैं मेरे विद्यालय का रिकॉर्ड शाला समय पश्चात् तैयार करता था। विद्यालय के रिकॉर्ड को भी व्यवस्थित किया। इन सभी गतिविधियों का ग्राम वासियों पर असर पड़ा। उनको यह अनुभूति हुई कि प्रधानाध्यापक की कथनी व करनी में अन्तर नहीं है।

उपलब्धियाँ

नया शिक्षा सत्र प्रारम्भ हुआ, परिणामस्वरूप नए शिक्षा सत्र में नए बच्चे विद्यालय में प्रवेश हेतु आने लगे। नए सत्र में 44 बच्चों ने प्रवेश लिया, जिसमें से ज्यादा बच्चे प्राइवेट विद्यालयों से स्थानान्तरण होकर आए हैं। मुझे बहुत खुशी हुई, मुझे लगा मेरी मेहनत सफल हुई। एस.डी.एम. साहब टोडारायसिंह (टोंक) द्वारा नामांकन वृद्धि पर मुझे 15 अगस्त 2010 को तहसील स्तर पर सम्मानित किया गया। मैं गाँव वालों के विश्वास को बनाए रखने में कामयाब हूँ। अब मैं अपनी शाला के प्रबन्धन पर विशेष ध्यान रखता हूँ। पूर्व में अध्यापक साथियों द्वारा दिए गए आश्वासन पर वह भी खरे उतर रहे है। मैं शाला समय में निरन्तर अपने साथी अध्यापकों की टीम के साथ शाला के कार्य में व्यस्त रहता हूँ। हम सभी बच्चों के अध्यापन, खेलकूद आदि गतिविधियों का पूरा ध्यान रखते हैं।

एक दिन की स्कूल दिनचर्या

मैं रोजाना शाला समय से पूर्व निरन्तर छात्र/अभिभावकों से सम्पर्क करता हूँ। सम्पर्क के बाद शाला में 10 बजे पहुँच जाता हूँ। 10:15 बजे पर प्रथम सूचना घण्टी बजवाता हूँ। शाला की साफ सफाई करवाता हूँ। मेरा स्टाफ भी इस कार्य में सहयोग प्रदान करता है। मैंने सभी स्टाफ को अपना-अपना प्रभार वितरित कर रखा है। उसके अनुसार प्रार्थना प्रभारी द्वारा प्रार्थना स्थल पर बच्चों को पंक्ति में खड़ा करवाना, लय तथा ताल-मेल के साथ प्रार्थना बोलना, समाचार-पत्र सुनाना, बच्चों द्वारा दोहावाचन करना आदि कार्य प्रार्थना प्रभारी द्वारा करवाया जाता है।

उसके बाद बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में चले जाते हैं। कक्षा-अध्यापकों द्वारा उपस्थिति ली जाती है। उपस्थिति पटट् पर प्रतिदिन व कक्षावार नामांकन व उपस्थिति दर्ज की जाती है। मेरे द्वारा अध्यापक उपस्थिति पृष्ठ भरा जाता है कि कौन सा अध्यापक उपस्थित है और कौन सा अवकाश पर है। अवकाश वाले अध्यापक के कालांश अन्य अध्यापक या में स्वयं लेकर अध्यापन की व्यवस्था को बनाए रखता हूँ। सभी कक्षाओं में अध्यापन कार्य समय विभाग चक्र के अनुसार प्रारम्भ हो जाता है। मैं भी अध्यापन करवाता हूँ व समय-समय पर कक्षाओं का अवलोकन करता हूँ। पोषाहार प्रभारी द्वारा भोजन गुणवत्ता पूर्वक बने इस बात का ध्यान रखता हूँ। दोपहर को बच्चों को पोषाहार प्रभारी व मेरे द्वारा बच्चे को भोजन स्थल पर बुलवाना, साबुन से हाथ धुलवाकर दरी पटिट्यों पर बैठाकर बच्चों को अध्यापकों व मेरी देख-रेख में भोजन करवाना। भोजन पश्चात् बच्चे विश्राम करते हैं। मैं यह ध्यान रखता हूँ कि कोई बच्चा या बच्ची विद्यालय से बाहर गया है या नहीं, पूछकर गया है तो समय पर वापस आया या नहीं। नहीं आया तो अगले दिवस सम्पर्क कर अभिभावकों को इसकी जानकारी देना। शाला विश्राम समाप्त होने पर वापस सुव्यवस्थित बच्चों को कक्षा में बिठाना, मानीटर निर्देश देता है कि अपनी-अपनी कक्षा में कचरा पात्र रखा है। उसमें कचरा डालना, पंक्ति से जूते-चप्पल उतारना आदि कार्यों को करवाने की जिम्मेदारी कक्षा मानीटर की है। शाला में पूर्ण अध्यापन कार्य शुरू करवाना व देख-रेख करना, 4.00 बजे बच्चों को खेल-खिलाना व 4.30 बजे छुट्टी देना। छुट्टी के बाद ताले बन्द करवाना व रिकॉर्ड संधारण करना। यह मेरा प्रतिदिन का कार्य है।

समुदाय का योगदान

इस कार्य से गाँव वाले बहुत खुश हैं। वे लोग मेरा पूरा सहयोग करते हैं। समय-समय पर विद्यालय में आते हैं व मेरा सहयोग करते रहते हैं। राष्ट्रीय पर्व व 15 अगस्त तथा 26 जनवरी पर गाँव वालों का भरपूर सहयोग मिलता है। गाँव वाले पहले राष्ट्रीय पर्वों में कम भाग लेते थे। मेरे सम्पर्क से सभी ग्रामवासी उत्साहपूर्वक इस समारोह में भाग लेते हैं। बच्चों का उत्साहवर्द्धन करते हैं। मेरा मानना है कि प्रधान अध्यापक का कुशल नेतृत्व हो और गाँव वालों का सहयोग मिले तो विद्यालय हर गतिविधियों में अच्छा स्थान प्राप्त कर सकता है।

सीताराम चाँवला

  • प्रधानाध्यापक,उच्च प्राथमिक विद्यालय,साण्डला,टोडारायसिंह,टोंक,राजस्थान

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। सीताराम चाँवला वर्ष 2010-11 में विद्यालय प्रबन्‍धन एवं नेतृत्‍व के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने सीताराम चाँवला से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इस बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम सीताराम चाँवला, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

सीताराम चांवला जी का प्रयास सराहनीय है ।अगर हम उनकी एक दिन की स्‍कूल दिनचर्या देखें तो यह निष्‍कर्ष निकलता है कि उन्‍होने ऐसा कोई विशेष या हटकर कार्य नहीं किया है ।वही किया जो एक शिक्षक को करना चाहिए ।विशेष बात यह है कि उन्‍होने यह सब समर्पण .लगन और बच्‍चों के अपनेपन में किया है । यही कार्य उन्‍हे भीड से अलग करताा है । उन्‍हे एक पहचान देता है । भाई बहुत-बहुत बधाई ।

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