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फील्ड मेजरमेन्ट के काम के चलते निवाई ब्लॉक के कुछ स्कूलों में जाना हुआ। इन्ही स्कूलों में से एक स्कूल धतुरी रामनगर भी है। यह स्कूल हमें अन्य स्कूलों से जुदा लगा जिसका कारण था स्कूल के अन्दर की हरियाली व चीजों का व्यवस्थित होना जो अमूमन शासकीय स्कूलों मे कम दिखाई देती है। स्कूल के अन्दर खूब सुन्दर हरी-हरी बेलें जाली के सहारे लटक रही थीं। स्कूल में हर चीज व्यवस्थित व सलीके से रखी दिखाई दे रही थी।

धतुरी रामनगर राजस्थान के टोंक जिले के निवाई ब्लॉक से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उच्च प्राथमिक स्कूल है। स्कूल में 158 बच्चों का नामांकन है और 5 शिक्षक  कार्य करते हैं। स्कूल में वैसे सभी समुदाय के बच्चे  पढ़ते हैं लेकिन राजपूत समुदाय  के बच्चे ज्यादा संख्या में हैं। गाँव की जनसंख्या लगभग 650 के आसपास है लेकिन गाँव के लगभग 50 प्रतिशत लोग काम की तलाश में आसपास के शहरों में चले गए हैं। इसलिए स्कूल में धतुरी रामनगर गाँव के सिर्फ 30 बच्चे ही अध्ययन करते हैं, अन्य बच्चे आसपास के ढाणी व गाँवों से आते हैं। स्कूल से 5 किलोमीटर की दूरी के गाँवों से भी बच्चे स्कूल में पढ़ने आते हैं।

शाला गाँव के मध्य में स्थित है। 5 कक्ष हैं एवं 1 प्रधानाध्यापक कक्ष है। स्कूल की लगभग 1 बीघा जमीन है और स्कूल के चारों और चारदिवारी है। खाली पड़े क्षेत्र में लगभग 20 बड़े छायादार पेड़ लगे हुए हैं। इनमें नीम, शीशम, बील,गुलमोहर आदि हैं। इसके अलावा स्कूल की अपनी एक फुलवारी है और कमरों के सामने खुले स्थान में हरी बेलें लगी हुईं हैं जो स्कूल की सुन्दरता को और बढ़ा देती हैं।

पीने के पानी के लिए टंकी है। जिसमें पानी स्कूल के ट्यूबवेल से भरता है। प्रत्येक दो दिन में टंकी की सफाई होती है। टंकी में लगभग 10 टोंटियाँ लगी हुई हैं, जिससे बच्चों को मध्याह्न भोजन के बाद पानी पीने में काफी सहूलियत होती है और उनका बहुत समय बच जाता है। अगर टंकी में पानी खत्म हो जाए और  बिजली नहीं हो तो इसके लिए बिजली विभाग वालों से बात कर रखी है। फोन करने पर वह एक फेस की लाइन चला देते हैं और ट्यूबवेल से पानी भर लेते हैं।

स्कूल में बालक व बालिकाओं के लिए अलग शौचालय है। शौचालय में टाइल्स लगे हुए हैं। छत पर पानी की टंकी रखी है जिससे शौचालय में पानी पहुँचता है। स्कूल में खेल का मैदान नहीं है लेकिन पेड़-पौधे खूब हैं जिसकी छाँव तले बच्चे खेलते हैं।

शिक्षक रामावतार जाट सन 1997 में स्कूल में प्राथमिक शिक्षक के तौर पर आए थे और तब से ही इसी स्कूल में कार्यरत हैं। उस समय यह प्राथमिक स्कूल था और एक कमरे में चलता था। जिसमें 10 से 15 बच्चों का नामांकन था। सन 2008 में यह स्कूल क्रमोन्नत होकर उच्च प्राथमिक स्कूल हुआ। क्रमोन्नत होने से पहले यहाँ दो शिक्षक ही थे।

रामावतार जी बताते हैं कि,  ‘ मैंने 1987 में बी.एड. किया और उस समय शासकीय शिक्षक नहीं बन पाया तो मैंने सांगानेर में एक प्राइवेट स्कूल चलाया। बागवानी में मेरी खूब रुचि है तो मैं वहाँ यह सब काम किया करता था। 1997 में शासकीय शिक्षक बना तो इस स्कूल में आया। यहाँ कोई पेड़ नहीं था तो मैंने कुछ प्रयास किए लेकिन चारदिवारी नहीं होने के कारण पेड़ बड़े नहीं हो पाए। जानवर उनको खा जाते थे लेकिन जब सन 2000 में स्कूल में चारदिवारी हो गई, तो हमने यह पेड़ लगा दिए जो आज इतने बड़े हो गए हैं।

मेरा गाँव यहाँ से 4 किलोमीटर की दूरी पर ही है। मैं हमेशा नियत समय से पूर्व स्कूल आ जाता हूँ। शासकीय शिक्षक बनने से पूर्व प्राइवेट स्कूल जिस मेहनत व लगन से चलाता था, उतनी ही लगन व मेहनत से इस स्कूल को चलाता हूँ। स्कूल में हमेशा बच्चों की 98 प्रतिशत से अधिक उपस्थिति रहती है। त्यौहार और फसल कटाई के समय भी सिर्फ 4 से 5 बच्चे ही अनुपस्थित रहते हैं। 

जब हम दो शिक्षक थे तो हम बच्चों को गृहकार्य देते थे और बच्चे भी उसको करके लाते थे। उस समय बच्चों की संख्या कम थी। प्रत्येक बच्चे की कॉपी में उसके स्तर के अनुसार काम दिया जाता था, जिससे बच्चों पर बहुत असर हमें दिखाई दिया। उनको भी काम करने में मजा आया और हमें भी उससे मदद मिली। आज भी हम सभी बच्चों को गृहकार्य देते हैं। हालाँकि अब बच्चों की संख्या अधिक हो जाने के कारण प्रत्येक बच्चे की कॉपी में तो गृहकार्य नहीं दे पाते लेकिन बोर्ड पर लिख देते हैं, बच्चे उसको करके लाते हैं। हमारे कक्षा एक के लगभग 80 प्रतिषत बच्चे किताब पढ़ना जानते हैं।

प्रार्थना सभा में अखबार का उपयोग करते हैं। बच्चों को कहानी, प्रेरक प्रसंग सुनाते हैं और देश में चल रही घटनाओं के बारे में बातचीत करते हैं। हमने बच्चों में खुद से काम करने की आदत का विकास किया है। अगर कक्षा में शिक्षक नहीं भी हों तो बच्चे अपना काम खुद करते रहते हैं। जरूरत पड़ने पर अन्य बड़ी कक्षाओं के बच्चे उनको मदद कर देते हैं।’ 

रामावतार जी द्वारा कही गई बातों को हमने भी बच्चों से सम्पर्क के दौरान महसूस किया। बच्चों का अकादमिक स्तर भी अन्य स्कूल के बच्चों की अपेक्षा बहुत अच्छा था। कक्षा एक के बच्चे किताब पढ़ ले रहे थे, कुछ को छोड़कर।

गाँव के ही एक सज्जन नारायण सिंह उस समय स्कूल आए। उन्होंने बताया कि  हमारे बच्चे तो इस स्कूल में नहीं पढ़ते हैं लेकिन यह स्कूल प्राइवेट स्कूल से किसी भी बात में कम नहीं है। हाँ, वहाँ अँग्रेजी में पढ़ाते हैं और यहाँ हिन्दी में। नारायण सिंह ने भले ही तुलना प्राइवेट से की हो लेकिन उनकी बातों से लग रहा था कि वह अपने गाँव के शासकीय स्कूल पर नजर जरूर रखते हैं।

धतुरी रामनगर स्कूल भी एक सरकारी स्कूल ही है और इस स्कूल को भी शासन द्वारा वही सुविधाएँ प्राप्त हैं जो अन्य स्कूलों को मिलती हैं। लेकिन यहाँ सिर्फ अलग है तो इस स्कूल का प्रबन्धन व स्कूल के शिक्षकों का साझा प्रयास जो इसे खास बनाता है। जिसका असर स्कूल के वातावरण व शैक्षणिक स्तर पर दिखाई देता है।  इन्हीं सब खूबियों के चलते धतुरी रामनगर स्कूल को टोंक जिले में सर्व शिक्षा अभियान द्वारा वर्ष 2012-13 के लिए बेस्ट स्कूल का अवार्ड भी प्रदान किया गया है।


राकेश कारपेण्टर, स्रोत व्यक्ति, अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन ब्लाक गतिविधि केन्द्र,निवाई,टोंक, राजस्थान

टिप्पणियाँ

sanjayedn का छायाचित्र

good

ramswaroop का छायाचित्र

hume gurv hai aise school par

pramodkumar का छायाचित्र

बच्‍चे स्‍कूल क्‍यों आयें, स्‍वाभाविक है कि यदि बच्‍चो को स्‍कूल में कुछ(प्रेम, मैत्री,सदभाव, समता आत्‍मीयता,अभिव्‍यक्तिके अवसर, कुछ करन- खोजने की जगहऔर पठन-पाठन) मिलेगा तो वे दौडे चलें आयेंगे । नहीं तो घर का, खेत -खलिहान का काम करेंगे । अब यह शिक्षक पर निर्भर है कि उसकर कार्य-व्‍यवहार कैसा हो किबच्‍चे उसमें अपना मित्र देखें । भाई रामावतार जी ने यह करके दिखाया है , उनमें  बच्‍चों के प्रति अपनापन और समर्पण झलकता है ।ऐसे प्रयासों का आवश्‍यकता है ।

rsthawait का छायाचित्र

लीडरशिप एंड मैनेजमेंट का अनूठा उदहारण ....

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