किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सवाई माधोपुर की उदय सामुदायिक पाठशाला

ग्रामीण शिक्षा केन्‍द्र द्वारा संचालित उदय सामुदायिक पाठशाला, जगनपुरा को निकट से देखना एक सुखद और अविस्मरणीय अनुभूति रही। 11 शिक्षकों और 200 विद्यार्थियों के कलरव में खपरैल से ढके आठ अष्टभुजाकार कक्षों विद्यालय में पहला कदम रखते ही आपको एहसास हो जाता है कि यह समाज तथा गाँव की व्यापक परिधि का ही एक हिस्सा है। यह एक ऐसा विद्यालय है जहाँ जेंडर-सेंसिटिविटी मुद्दा नहीं रह गया है (सकारात्मक सन्‍दर्भों में)। जहाँ आधी दुनिया की संख्या आधे से भी कहीं ज्यादा है। एक ऐसा विद्यालय जिसे कक्षा-कक्ष में भी बच्चों को बाहरी दुनिया से जोड़े रखने की चिन्‍ता है, और जो उनके चेहरों पर पड़ने वाली ताजी हवा को ताजे मध्याह्न भोजन से भी ज्यादा जरूरी समझता है। ऐसा विद्यालय जिसके दीवारों के रंगरोगन वहाँ के बच्चों और अध्यापकों के सम्मिलित हस्ताक्षर हैं। एक ऐसा विद्यालय जहाँ गाँधी चित्रों में नहीं चरखों में जीवित हैं। और जहाँ  कला पंचतत्वों के संयोग से आकार ग्रहण करती है।

संस्था

ग्रामीण शिक्षा केन्‍द्र का फोकस मुख्य रूप से बच्चे, शिक्षक, विद्यालय प्रबंधन समिति तथा समुदाय रहे हैं। संस्था की इस स्पष्ट मान्यता है कि बिना समुदाय के सहयोग और उसको विश्वास में लिए अभीष्ट परिणामों की आशा कपोल-कल्पना से अधिक कुछ और न होगा। संस्था का प्रयास है कि वह अपने द्वारा संचालित विद्यालयों के माध्‍यम से क्वालिटी-एजुकेशन के अपने विचार को समुदाय के समक्ष सशक्त रूप से प्रदर्शित कर सके। ताकि  भविष्य में समुदाय स्वयं प्रशासन से ऐसी ही गुणवत्तापरक शिक्षा की माँग कर सके। संस्था इन विद्यालयों का उपयोग रिसोर्स-सेंटर के रूप में भी करती है तथा ‘आउटरीच-प्रोग्राम’ के तहत अपने आसपास के लगभग 20 से 25 सरकारी विद्यालयों, वहाँ के शिक्षकों तथा प्रधानाध्यापकों के क्षमता संवर्धन का कार्य करती है।

संस्‍था द्वारा संचालित तीन विद्यालयों के अतिरिक्त संस्था दो राजकीय विद्यालयों में भी अपने शिक्षकों की सहायता से शिक्षा और सामुदायिक विकास का कार्य कर रही है। इसके तहत विद्यालयों में संस्था आवश्यकता के अनुरूप अपने शिक्षकों को नियुक्त करती है जो विभाग द्वारा नियुक्त शिक्षकों के साथ मिलकर काम करते हैं। इनके वेतन तथा अन्य सम्‍बन्धित सुविधाओं की जिम्मेदारी संस्था की होती है। ये शिक्षक समुदाय में ही रहते हैं और समुदाय को शिक्षा और विद्यालय के प्रति जागरूक करते हैं। इस योजना के तहत संस्था यह कोशिश करती है कि वह शिक्षकों और समुदाय दोनों के लिए जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करें तथा उन्हें बेहतर करने के लिए प्रेरित करें।

संस्था किसी भी विद्यालय के साथ अपने सम्‍बन्‍ध 5 साल के लिए नियत करती है और इसके बाद यदि उसे विश्वास हो जाता है कि समुदाय विद्यालय के विकास और संचालन में योगदान के लिए पूर्ण रूपेण सक्षम है तो वो विद्यालय समुदाय को सौंप देती है।

संस्था अपने ‘विस्तार’ कार्यक्रम के तहत विद्यालय प्रबन्‍धन समि‍ति के साथ कार्य करती है, तथा उसकी कोशिश सरकारी विद्यालयों मे गठित इन समितियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मायनों से अवगत कराना तथा उन्हें उनके अधिकारों के प्रति सचेत करने की होती है। इन्हीं कोशिशों को अमली जामा पहनाते हुए संस्था ने लगभग 40 विद्यालयों की विद्यालय प्रबन्‍धन समि‍ति में 200 महिला सदस्यों को सचेत और प्रशिक्षित किया है, जो कि ‘शिक्षा-दूत’ के नाम से जानी जाती हैं।

विद्यालय

विद्यालय की प्रत्येक कक्षा में सभी कक्षा स्तर के बच्चे एक साथ पढ़ते हैं। यहाँ कक्षाओं को ग्रेड के आधार पर नहीं बल्कि आकर्षक नामों से जाना जाता है जिन्हें समूह कहा जाता है। जैसे कि समूह रिमझिम, समूह ख़ुशबू आदि। प्राथमिक कक्षाओं के प्रत्येक समूह का एक तय शिक्षक होता है। इस समूह के समस्त विषयों के अध्यापन की जिम्मेदारी भी उसी शिक्षक की होती है। प्रत्येक समूह में विद्यार्थियों की संख्या औसतन 27 होती है। इस विद्यालय में छोटे बच्चों के लिए दो वर्षीय पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं की भी व्यवस्था है।

विद्यालय मध्याह्न भोजन की व्यवस्था नहीं करता। दरअसल बच्चे अपना खाना घर से ही लेकर आते हैं ताजा और पौष्टिक। यह एक सोची समझी रणनीति के साथ तय किया गया है। शिक्षकों और अभिभावकों के बीच के बेहतरीन सामंजस्य के फलस्वरूप अभिभावकों ने अपनी सामान्य दिनचर्या में अपने बच्चों की आवश्यकता के अनुरूप बदलाव किया और अन्य आवश्यक कार्यों के होते हुए भी प्रतिदिन बच्चों के लिए ताजा भोजन साफ टिफिन में भेजना सुनिश्चित किया।

खेल यहाँ कितने महत्वपूर्ण हैं खेल के मैदान को देख कर सहज ही लगाया जा सकता है, प्रत्येक वर्ष इस विद्यालय के औसतन 10 बच्चे अलग-अलग खेलों में राष्ट्रीय स्तर पर विद्यालय और राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह परिणाम है संस्था से इसके आरम्‍भ  के दिनों से जुड़े एक समर्पित शिक्षक और कार्यकर्ता की खेलों से जुड़ी अपनी स्वयं की रुचि का।

बात खेलों से पड़ने वाले प्रभावों की करें तो इसे लेकर संस्था की स्पष्ट सोच सराहनीय है। उनके अपने अनुभव के अनुसार इससे समुदाय के साथ शिक्षकों का पारस्परिक विचार विमर्श कई गुना बढ़ जाता है, और इसके पीछे एक साधारण सी वजह यह होती है कि समुदाय अपने बच्चों के प्रदर्शन की सराहना करता है और इसमें शिक्षकों के योगदान को बखूबी समझता है। इसके अतिरिक्त खेल युवावस्था की तरफ अग्रसर हो रहे बच्चों को नशे से दूर रखता है, जेंडर-गैप समाप्त करता है, और साथ ही साथ बच्चों में नेतृत्व, समन्वय, सामंजस्य, त्वरित निर्णय, तथा सहभागिता के अत्यंत ही आवश्यक गुणों का विकास करता है।

इस विद्यालय का माहौल अन्य किसी भी विद्यालय से बिलकुल ही अलग है। शायद जितना मित्रवत और सहयोगात्मक व्यवहार यह विद्यालय प्रदान करता है उतना कहीं और न मिल पाए। इन बातों से एक महत्वपूर्ण सवाल यह खड़ा होता है कि कक्षा 8 के बाद जब बच्चे अन्य माध्यमिक विद्यालयों में जाते हैं तो किन समस्याओं का सामना करते हैं। वास्‍तव में ऐसे सवालों का सामना करने का कौशल यहाँ बच्चों को पहले दिन से ही सिखाया जाता है। संस्था का यह विश्वास है कि यदि बच्चे में आत्मविश्वास है, निर्णय लेने की क्षमता है, विकट परिस्थितियों में धैर्य न खोने का साहस है, तार्किक सोच और नेतृत्व क्षमता है तो वह इन परिस्थितियों का सफलता पूर्वक सामना कर सकता है। इसके अतिरिक्त यहाँ के शिक्षक भी अन्य विद्यालयों में अपनी सेवाएँ देते हैं और वहाँ के शिक्षकों को विद्यालय में आमंत्रित करते हैं ताकि वे भी आएँ और बच्चों के अनुकूल वातावरण को देखें और समझें।

विद्यालय की बढ़ती लोकप्रियता और सीमित संसाधनों के कारण संस्था स्वयं को अक्सर ऐसी स्थिति में पाती है जहाँ वह चाह कर भी और अधिक विद्यार्थियों को अपने साथ नहीं जोड़ सकती। इस स्थिति के स्थायी समाधान के लिए संस्था ने समुदाय के साथ मिलकर तय किया कि विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या 200 पर सीमित की जाए। साथ ही यह भी तय किया गया कि यदि नए सत्र में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या अधिक हो तो वरीयता का निर्णय विद्यालय से उनके घर की दूरी तथा परिवार की आर्थिक स्थिति के आधार पर किया जाए। इसके अतिरिक्त यह भी निश्चित किया गया कि लड़के और लड़की में से वरीयता लड़कियों को दी जाए।

एक ऐसी बात जो उच्च प्राथमिक स्तर के विद्यालयों के लिहाज से बिलकुल ही नई लगी वह यह कि इन विद्यालयों से उत्तीर्ण हो चुके विद्यार्थियों का अपना एक संगठन ‘उमंग’ है, जो वर्तमान में अध्ययनरत विद्यार्थियों तथा शिक्षकों की आवश्यकतानुसार सामर्थ्य भर सहायता और सहयोग भी करता है।

संस्था पर समुदाय का यह दबाव भी है कि विद्यालय को उच्च प्राथमिक से बढ़ाकर माध्यमिक किया जाए, किन्तु संस्था के लिए सीमित संसाधनों में प्रशासन के मानक के अनुसार पक्के विद्यालय भवनों और शिक्षकों सहित अन्य अनिवार्यताओं का पालन कर पाना अत्यंत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है।

संचालन प्रक्रिया

समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका को ध्यान में रख कर विद्यालय से सम्‍बन्धित हर निर्णय और कार्य में समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। साथ ही साथ यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि शिक्षक-अभिभावक बैठक या फिर विद्यालय प्रबंधन समिति की बैठकों में सम्‍बन्धित समस्त सदस्य तथा अभिभावक सक्रिय रूप से सम्मिलित हों। यह इसलिए सुनिश्चित हो पाया है क्योंकि पिछले 12 सालों में गाँव के प्रत्येक परिवार का एक न एक सदस्य इस विद्यालय में या तो शिक्षा ग्रहण कर रहा है या फिर कर चुका है, फलस्वरूप इन बच्चों के सर्वांगीण विकास का साक्षी समुदाय का प्रत्येक सदस्य है।

संस्था के विद्यालय भी कमोबेश विभाग द्वारा प्रस्तावित पाठ्यक्रम के अनुसार ही संचालित होते हैं, फर्क होता है तो तरीके का। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की व्यवस्था लागू होने के बाद संस्था की विधियों तथा अन्य राजकीय विद्यालयों की विधियों में समानता बढ़ी है। यहाँ के शिक्षक जब अन्य विद्यालयों में जाते हैं तो उनसे भी सबसे अधिक सवाल इसी को लेकर पूछे जाते हैं। संस्था विभाग द्वारा निर्धारित राजस्थान की पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य राज्यों की पाठ्यपुस्तकों तथा सीबीएसई की पाठ्यपुस्तकों का भी उपयोग आवश्यकता के अनुसार करती है। संस्था कक्षा कक्ष में शिक्षण को और अधिक सुचारु और व्यवस्थित बनाने तथा शिक्षकों की सहायता के लिए विषय तथा स्तर के अनुरूप शिक्षण के माड्यूल भी तैयार करती है। संस्था का दृढ़ विश्वास है कि स्तरानुरूप निर्धारित आवश्यक दक्षताओं का विकास बच्चों में होना ही चाहिए तथा इसके लिए आवश्यक प्रयत्नों को कुछ इस तरह से ढाला जाना चाहिए कि बच्चे पाठ्यक्रम के साथ ही साथ सामाजिक और लोकतान्त्रिक मूल्यों को भी समझ सकें और अपने आचरण में ला सकें।

शिक्षक

शिक्षकों के लिए आवश्यक अर्हताएँ शिक्षा विभाग के समान ही होती हैं, शिक्षकों का शिक्षण से सम्‍बन्धित व्यावसायिक पाठ्यक्रम उत्तीर्ण होना आवश्यक है। अनुभवी और बिना शिक्षण-अनुभव के नए, दोनों ही प्रकार के शिक्षक इस संस्थान के विद्यालयों में मिल जाएँगे। प्रोबेशन का समय तीन महीने का होता है, और प्रारम्भ में 45 दिन का एक इंडक्सन प्रोग्राम सभी शिक्षकों के लिए अनिवार्य होता है, इसके अतिरिक्त भी शिक्षकों के क्षमता संवर्धन के लिए संस्था विभिन्न ट्रेनिंग तथा वर्कशॉप आयोजित करती है। संस्था गर्व के साथ इस तथ्य को प्रस्तुत करती है कि उनके यहाँ अधिकतर शिक्षक नए ही आते हैं और इस कारण से संस्‍था का एक महत्वपूर्ण कार्य शिक्षकों को तैयार करने का भी है। फलस्वरूप शिक्षण के इस आवश्‍यक अनुभव के साथ शिक्षक जब दूसरे विद्यालयों में जाते हैं तो उनके साथ ही यहाँ की विचारधारा और यहाँ के तौर-तरीके भी आगे जाते हैं। वर्तमान में इस विद्यालय में विषयों के शिक्षकों के अतिरिक्त एक-एक शिक्षक कार्पेंट्री (काष्ठ कला), पाटरी (मृतिका कला), और खेल के लिए हैं, इसके अतिरिक्त बिना किसी पेशेवर शिक्षक की उपस्थिति के बावजूद भी विद्यालय में बच्चों का थियेटर ग्रुप सराहनीय कार्य कर रहा है।

समुदाय

समुदाय के अधिकतर सदस्य मीना जनजाति से हैं और इनकी आजीविका का मुख्य साधन खेती है। आरम्‍भ में समुदाय के अधिकतर परिवारों का मुख्य मुद्दा आजीविका का था और जीवन जीने की इस चुनौती में उनके अपने बच्चों की शिक्षा यदि कहीं दिखती भी थी तो हाशिये पर ही। इन्हीं परिस्थितियों में समुदाय के कुछ लोगों के सहयोग से एक विद्यालय प्रारम्भ हुआ। विद्यालय के शिक्षक भी उसी समुदाय में रहने लगे। सफर आसान नहीं था, जिस प्रकार के तरीके इस विद्यालय ने अपनाए वो प्रचलित परिपाटी से मेल नहीं खाते थे और न ही ग्रामिणों की समझ में आते थे। उन्हें अक्सर यह लगता कि उनके बच्चे विद्यालयों में पढ़ने के अतिरिक्त और सब कुछ कर रहे हैं। अक्‍सर वे अपने सवालों के साथ शिक्षकों के सामने आ खड़े होते।

वाद-विवाद और समझने-समझाने का ये दौर लम्‍बा चला। साथ ही विकसित करता चला एक आपसी समझ; संस्था को लेकर, विद्यालय को लेकर, शिक्षकों को लेकर, बच्चों को लेकर, शिक्षा को लेकर, गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा को लेकर, शिक्षा से सम्‍बन्धित संविधान के प्रावधानों को लेकर। चर्चा के इन अवसरों ने एक-दूसरे को समझने में एक अहम भूमिका निभाई। अब अभिभावक यह कहते मिल जाते हैं कि आप कब और कैसे पढ़ाते हो यह तो बहुत ज्यादा समझ में नहीं आता लेकिन बच्चे सीख रहे हैं इसमें कोई दो राय नहीं। संस्था के कार्यों का एक महत्वपूर्ण अंग समुदाय स्वयं भी है और इसमें विद्यालय के शिक्षक एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब एक शिक्षक अपने समस्त अनुभवों और ज्ञान के साथ उस समुदाय का एक अंग बनकर रहने लगता है तो वो समुदाय को और समुदाय उसको प्रभावित करता है। इस प्रक्रिया में ये एक-दूसरे के नजदीक आते हैं, एक आपसी समझ का विकास होता है और फिर इसके फलस्वरूप सामुदायिक मुद्दों और प्रसंगों में शिक्षक की भागीदारी और उसकी राय का महत्व भी बढ़ता है। वही अभिभावक जो कभी यह सवाल करते थे कि ज्यादा पढ़ाने से उनकी बच्ची कहीं भाग ना जाए, आज वही उसके लिए देश के किसी भी कोने में स्थित स्पोर्ट्स कॉलेजों के हॉस्टल में प्रवेश हेतु कोई भी कसर न उठा रखने की बात करते हैं। आज शिक्षक बच्चों और समुदाय की भलाई से सम्‍बन्धित किसी भी मुद्दे पर अभिभावकों से बेहिचक बात कर सकते हैं, और समुदाय उनकी बातों और सलाहों को महत्वपूर्ण मानता है।

फंडिंग

इस संस्था को आ रही अधिकतर वित्‍तीय मदद में शिक्षा के ही साथ-साथ स्वास्थ्य तथा लाइवलीहुड से सम्‍बन्धित योजनाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। संस्था इस बात का पूरा ध्यान रखती है कि वह ऐसी संस्थाओं से ही वित्तीय संसाधन स्वीकार करे जिनकी रुचि मात्र एक या दो बार की ही फंडिंग में न होकर लम्‍बे समय के लिए हो और जिनके साथ वे दूर तक रास्ता तय कर सकें।

अन्य मुद्दे

  • एक बड़े लक्ष्य (जनपद सवाई माधोपुर में एक भी बच्चा विद्यालय जाने से वंचित न रहे) की प्राप्ति के लिए प्रचुर और सतत वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है, और यह संस्था भी इस तथ्य से दो-चार हो रही है।
  • उन शालाओं में जहाँ संस्था विभाग के साथ मिलकर 5 साल के करार के अनुसार कार्य कर रही है, इस अवधि के बाद की स्थिति अभी बहुत स्पष्ट नहीं है।
  • भविष्य को देखते हुए संस्था में नेतृत्व का पूरा दारोमदार अभी प्रथम पंक्ति के हाथ में है और अब इस बात की भी आवश्यकता है कि नेतृत्व करने वाली एक दूसरी पंक्ति तैयार की जाये।
  • संस्था द्वारा नियुक्त शिक्षक सरकारी शिक्षकों के बनिस्बत बहुत ही कम वेतन पर कार्य करते हैं, इस कारण अच्छे शिक्षकों को अपने साथ जोड़ पाना और फिर उन्हें साथ बनाए रख पाना भी एक बड़ी चुनौती है।
  • यहाँ अमल में लाई जा रही शिक्षण पद्धति एक चुनौती यह भी खड़ी करती है कि शिक्षक विशेष की अनुपस्थित एक पूरे समूह के बच्चों को उस पूरे समय के लिए प्रभावित करती है और कोई दूसरा शिक्षक चाहकर भी उन दिनों की समुचित भरपाई नहीं कर सकता।
  • शिक्षकों के समुदाय में रहने से एक समस्या यह आती है कि उस शिक्षक का व्यवहार या समुदाय में किसी व्यक्ति से उसके रिश्तों में आई खटास का प्रभाव संस्था के समुदाय से बने रिश्तों पर भी पड़ता है।
  • महिला शिक्षकों को होने वाली समस्याओं के मद्देनजर संस्था उन्हें समुदाय में रहने की अनिवार्यता से मुक्त रखती है, किन्तु इस नीति के कारण कुछ पुरुष शिक्षकों को लैंगिक समानता से परे अपने साथ पक्षपात सा महसूस होता है।
  • गैर सरकारी संस्थाओं के कार्य करने के तरीकों में आते आमूल चूल परिवर्तनों से इस प्रकार की संस्थाओं को भी प्रशिक्षित पेशेवर लोगों की आवश्यकता महसूस होने लगी है, किन्तु ऐसे प्रशिक्षित व्यक्तियों के लिए समुचित वित्तीय संसाधन जुटा पाना आसान नहीं।
  • फंडिंग से जुड़ी एक और समस्या खेलों के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को लेकर है, क्योंकि ऐसे बच्चों को भविष्य में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए आवश्यक अभ्यास सामग्रियों, संसाधनों और बेहतर खुराक की व्यवस्था कर पाना समुदाय के बस के बाहर की बात है और संस्था अपने सीमित संसाधनों के बल पर चाहते हुए भी बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर सकती।

प्रस्‍तुति : अमित मिश्र, फैलो, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, बाड़मेर, राजस्‍थान

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

बहुत अच्छा प्रयास है‚बधाई

vishnugopalmeena का छायाचित्र

thanks for your kind job

kumar siddharth का छायाचित्र

अमित
ग्रामीण शिक्षा केन्‍द्र द्वारा संचालित उदय सामुदायिक पाठशाला, जगनपुरा सवाई माधोपुर के संदर्भ में आलेख बढकर मजा आया। लंबे समय बाद इस तरह के स्‍कूल के बारे में पढने को मिला। आपका शुक्रिया।
वास्‍तव में शिक्षा जगत में सामुदायिक सहभागिता से स्‍कूलों को संचालन होना चाहिए। आज स्‍कूल 'आईसोलेशन' में है। इस तरह के प्रयोग अन्‍य शिक्षक कर सकें तो शिक्षा का चित्र अलग तरीके का उभरेगा।
उत्‍साहीजी का भी शुक्रिया एक अच्‍छे आलेख् का चुनाव करने के लिए।

UttamPrakash का छायाचित्र

शानदार अमित भाई

Pannalalchandel का छायाचित्र

very good efforts . . . .

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