किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सरकारी स्‍कूलों में लौटता भरोसा : दो

यह शिक्षा के निजीकरण का दौर है। यह देश के अभावग्रस्त परिवारों के बच्चों से उनके डॉक्टर, इंजीनियर बनने के सपनों के छिन जाने का दौर है। यह महँगी फीस, महँगे स्कूल और उम्दा पढ़ाई के नाम पर अमीर तथा गरीब बच्चों के बीच शिक्षा की खाई को और भी ज्यादा चौड़ा कर देने का दौर है। यह अमीरों के बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों का दौर है। इसलिए, यह गरीब बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों को उनके हाल पर छोड़ देने का दौर है। इस दौर में हम देख रहे हैं कि सरकारी स्कूलों की हालत किस तरह बद से बदतर बना दी जा रही है। लेकिन, जरा ठहरिए! यह दूर—दराज के ग्रामीण इलाकों में ऐसे शिक्षक और समुदायों के साझा संघर्षों का भी दौर है जो सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता की नींव बन रहे हैं। महाराष्ट्र के सांगली जिले के गाँवों से ऐसे ही स्कूलों की कहानियाँ, जिनमें बदलाव की आहट साफ सुनाई दे रही हैं।  फिलहाल ऐसे छह स्‍कूलों की कहानियों को दर्ज  किया गया है। यहॉं प्रस्‍तुत है दूसरी कहानी।   

तुलाराम बुआचा शाला

एक स्कूल की इन तस्वीरों में आश्चर्यजनक जैसा कुछ भी नहीं दिखता। इसके बावजूद इनमें हैरान करने वाली बात तो है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस जगह पर स्कूल कैसे हो सकता है!

ये तस्वीरें हैं तुलाराम बुआचा मराठी शाला की। यह महाराष्ट्र में शोलापुर सीमा से सटे जिला परिषद, सांगली की एक प्राथमिक शाला है।

सांगली से 90 किलोमीटर दूर आटपाडी नाम का कस्बा है। स्टेट हाइवे के सहारे दो-सवा दो घण्‍टे में जिले के इस तहसील मुख्यालय तक पहुँचा जा सकता है। इसके बाद, इस कस्बे से एक वन-वे सड़क वीरान इलाके की ओर जाती है। यहाँ से करीब 12 किलोमीटर दूर शेडफले नाम का एक गाँव है। यदि आपके पास अपना कोई वाहन नहीं है तो आटपाडी से शेडफले जाना तकलीफदेह साबित हो सकता है। वजह है कि इस रूट पर राज्य परिवहन की इक्का-दुक्का बसें ही चलती हैं। वहीं, बहुत कम सवारियाँ मिलने के कारण शेयर ऑटो वाले भी इस ओर आना पसन्‍द नहीं करते। लेकिन, शेडफले में स्कूल है और यहाँ स्कूल होने में आश्चर्य करने जैसी कोई बात नहीं।

यहाँ से अनार आदि के खेतों से होकर एक कच्चा और उबड़-खाबड़ रास्ता सोलापुर जिले की सीमा की ओर जाता है। हमारी पैदल यात्रा शुरू होती है यहाँ से। साथ हैं महाराष्ट्र के सरकारी स्कूलों में संचालित मूल्यवर्धन कार्यक्रम में मास्टर ट्रेनर सुनील चौधरी और यहाँ की 12 शालाओं की केंद्र प्रभारी मीना गायकवाड़। यहाँ से गुजरते हुए दूर-दूर तक कोई बस्ती तो क्या आदमी भी नजर नहीं आता। शेडफले गाँव से करीब छह किलोमीटर दूर जंगल से घिरी एक छोटी पहाड़ी पर चढ़ते हुए यदि मीना गायकवाड़ सही दिशा नहीं बतातीं तो हम एक दूसरी ही पगडंडी पकड़ लेते।

और फिर कोई सौ कदमों की दूरी से एक सुन्‍दर और छोटी शाला का भवन दिखने पर हमें खुशी होती है, लेकिन इस जिज्ञासा के साथ कि यहाँ पढ़ने के लिए कितने बच्चे आते होंगे? नजदीक आने पर शाला के शिक्षक सुनील गायकवाड़ हमारा स्वागत करके शाला के भीतर के एक कमरे में ले जाते हैं। इस कमरे में कुल 12 बच्चे पढ़ाई में तल्लीन हैं, जबकि दूसरे कमरे में 8 बच्चे बिना शिक्षक के पढ़ रहे हैं। 20 बच्चे और दो कमरों की शाला में सुनील गायकवाड़ अकेले शिक्षक हैं। यह जब एक कमरे में साथ बैठे दो कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाते हैं तो दूसरे कमरे में बैठे दो अलग-अलग कक्षाओं के बच्चे एक साथ बगैर शिक्षक के अनुशासित ढंग से खुद पढ़ना-लिखना सीख रहे होते हैं।

सुनील बताते हैं, "इससे फायदा ही हुआ है। पहली के बच्चे दूसरी के पाठ भी पढ़ते हैं और इसी तरह तीसरी के बच्चे चौथी के स्तर की शिक्षा हासिल कर लेते हैं।" हालाँकि, एक कुशल शिक्षक के बिना बच्चों को यह फायदा मिलना संभव नहीं था। सुनील ने बताया तो हमें यह जानकर आश्चर्य भी हुआ कि यह शेडफले गाँव की ही एक शाला है, जिसका वजूद गाँव से छह किलोमीटर दूर है। असल में इस शाला के आसपास गाँव के किसान अपने खेतों में घर बनाकर रहने लगे हैं और कुछ सालों में इस पहाड़ी के आजू-बाजू के अलग-अलग खेतों में दूर-दूर ऐसे किसानों के कुल 80 घर बन गए हैं। इन्हीं किसानों के बच्चों की शिक्षा को ध्यान में रखते हुए जिला परिषद, सांगली ने इस जगह स्कूल खोला है।

सुनील इसी गाँव से ही हैं और खास बात यह है कि सात साल से इस शाला के बच्चों को पढ़ाने की उनकी लगन रंग लाई है।

यह शाला अब जिले की आदर्श शालाओं में गिनी जाती है। महाराष्ट्र राज्य शिक्षा विभाग ने शिक्षण की गुणवत्ता के मापदण्‍ड पर इसे 'अ' श्रेणी यानी राज्य की सबसे अच्छी शालाओं में स्थान दिया है।

(ऐसे चार अन्‍य स्‍कूलों की कहानी आगे की कडि़यों में प्रस्‍तुत की जाएगी। इस शृंखला की पहली कहानी इस लिंक पर पढ़ी जा सकती है यमाजी पाटलीची वाड़ी शाला )


शिरीष खरे, पुणे

 

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