किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सरकारी स्‍कूलों में लौटता भरोसा : चार

यह शिक्षा के निजीकरण का दौर है। यह देश के अभावग्रस्त परिवारों के बच्चों से उनके डॉक्टर, इंजीनियर बनने के सपनों के छिन जाने का दौर है। यह महँगी फीस, महँगे स्कूल और उम्दा पढ़ाई के नाम पर अमीर तथा गरीब बच्चों के बीच शिक्षा की खाई को और भी ज्यादा चौड़ा कर देने का दौर है। यह अमीरों के बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों का दौर है। इसलिए, यह गरीब बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों को उनके हाल पर छोड़ देने का दौर है। इस दौर में हम देख रहे हैं कि सरकारी स्कूलों की हालत किस तरह बद से बदतर बना दी जा रही है। लेकिन, जरा ठहरिए! यह दूर—दराज के ग्रामीण इलाकों में ऐसे शिक्षक और समुदायों के साझा संघर्षों का भी दौर है जो सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता की नींव बन रहे हैं। महाराष्ट्र के सांगली जिले के गाँवों से ऐसे ही स्कूलों की कहानियाँ, जिनमें बदलाव की आहट साफ सुनाई दे रही हैं। फिलहाल ऐसे छह स्‍कूलों की कहानियों को दर्ज  किया गया है। यहाँ प्रस्‍तुत है चौथी कहानी।      

रानमला बस्ती शाला

एक छोटे-से कमरे के एकमात्र दरवाजे पर हर दिन सुबह-सुबह छोटे बच्चे एक सुन्‍दर रंगोली बनाते हैं, जो अँग्रेजी के किसी एक अक्षर पर आधारित होता है। जैसे कि शुक्रवार को छोटे बच्चों ने अँग्रेजी के एक अक्षर F के आधार पर यह रंगोली तैयार की है। इसमें F से शुरू होने वाले शब्द हैं- Fan, Fox, Foot, Fat।

यह छोटे-से कमरे का एकमात्र दरवाजा है रानमला बस्ती की प्राथमिक शाला का, जो महाराष्ट्र के सांगली जिले से 85 किलोमीटर दूर है।

इस शासकीय शाला के एकमात्र शिक्षक रचनात्मक व्यक्ति हैं और बच्चों के खिलौने बनाने के लिए इन्हें अलग-अलग मंचों पर सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है।

सचिन गायकवाड़ नाम के इन शिक्षक की एक और विशेषता यह है कि यह बाल मन को बहुत गहराई से जानते-समझते हैं और उसी के हिसाब से बच्चों को पढ़ाते-सिखाते हैं।

जैसे कोई भी विषय को पढ़ाने-सिखाने से पहले ये कुछ देर के लिए बच्चों को "साइलेंट" का अनुदेश देते हैं। फिर किसी लघु-गीत या लघु-कथा से भूमिका बाँधते हैं।

उदाहरण के लिए, एक मुद्दे पर बच्चों के भिन्न-भिन्न मत जानने के पहले ये एक लघु-गीत को हाव-भाव के साथ बता रहे हैं। इसमें बताया जा रहा है कि एक बन्‍दर स्कूल जा रहा है, लेकिन स्कूल जाने के रास्ते में उसे कौन-कौन मिल रहा है और वह उन्हें क्या-क्या बोल रहा है। वह कैसी-कैसी हरकतें करते हुए स्कूल जा रहा है।

इनकी शाला में 25 बच्चे हैं। इनमें 15 लड़कियाँ हैं।

(ऐसे दो अन्‍य स्‍कूलों की कहानी आगे की कडि़यों में प्रस्‍तुत की जाएगी। इस शृंखला की पिछली तीन कहानियाँ यहाँ पढ़ी जा सकती हैं  यमगार बस्‍ती शाला  तुलाराम बुआचा शाला  यमाजी पाटलीची वाड़ी शाला 


शिरीष खरे, पुणे

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