किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सरकारी स्‍कूलों में लौटता भरोसा : एक

यह शिक्षा के निजीकरण का दौर है। यह देश के अभावग्रस्त परिवारों के बच्चों से उनके डॉक्टर, इंजीनियर बनने के सपनों के छिन जाने का दौर है। यह महँगी फीस, महँगे स्कूल और उम्दा पढ़ाई के नाम पर अमीर तथा गरीब बच्चों के बीच शिक्षा की खाई को और भी ज्यादा चौड़ा कर देने का दौर है। यह अमीरों के बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों का दौर है। इसलिए, यह गरीब बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों को उनके हाल पर छोड़ देने का दौर है। इस दौर में हम देख रहे हैं कि सरकारी स्कूलों की हालत किस तरह बद से बदतर बना दी जा रही है। लेकिन, जरा ठहरिए! यह दूर—दराज के ग्रामीण इलाकों में ऐसे शिक्षक और समुदायों के साझा संघर्षों का भी दौर है जो सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता की नींव बन रहे हैं। महाराष्ट्र के सांगली जिले के गाँवों से ऐसे ही स्कूलों की कहानियाँ, जिनमें बदलाव की आहट साफ सुनाई दे रही हैं। ये दृश्य साधारण हैं। लेकिन, इनके पीछे छिपी कहानी असाधारण है। फिलहाल ऐसे छह स्‍कूलों की कहानियों को दर्ज  किया गया है। यहॉं प्रस्‍तुत है पहली कहानी। 

यमाजी पाटलीची वाड़ी शाला

महाराष्ट्र के पुणे शहर के सड़क मार्ग से लगभग दो सौ किलोमीटर दूर यह है यमाजी पाटलीची वाड़ी की प्राथमिक पाठशाला। इस पाठशाला की विशेषता इस वाड़ी (ग्राम) की सम्‍पन्‍नता के बीच मौजूद है।

कोई दो हजार की आबादी वाली इस बसाहट के ज्यादातर बाशिन्दे सोने की कारीगरी के कारण दक्षिण भारत के कई बड़े शहरों के सोना व्यापारियों से जुड़े हैं। साथ ही यहाँ अनार और अंगूर की भी अच्छी पैदावार होती है। लिहाजा, धनी लोगों की इस वाड़ी में सुख-सुविधा की हर चीज उपलब्ध है, बल्कि यहाँ की गलियों में घूमकर तो लगता है जैसे हम पुणे जैसे बड़े शहर की किसी पॉश कॉलोनी में घूम रहे हैं। हालाँकि, यह मुख्य सड़क से बहुत अन्‍दर एक सुन्‍दर और व्यवस्थित वाड़ी है, इसके बावजूद संकरी-पक्की सड़क से होकर प्राइवेट बसें भी आती-जाती हैं।

फिर भी यहाँ अब तक नहीं पहुँची है तो प्राइवेट स्कूल की कोई संस्था। वजह है कि यहाँ के लोगों ने हर बार अच्छी शिक्षा के नाम पर महँगी फीस वसूलने वाले स्कूलों के पैर जमने से रोका। यहाँ के लोगों ने अपनी वाड़ी के सरकारी स्कूल पर भरोसा किया, टीचरों का सहयोग किया और अपने बच्चों को प्रोत्साहित किया, जिसकी बदौलत यहाँ के होनहार बच्चों ने शिक्षा के क्षेत्र में नाम हासिल किया है। यहाँ न सिर्फ बच्चों की शत-प्रतिशत उपस्थिति देखी जा सकती है, बल्कि इनमें अच्छे संवैधानिक नागरिक बनने की संभावनाएँ भी देखी जा सकती हैं।

खास बात यह है कि इस स्कूल के सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं के बच्चे भी यहीं पढ़ते हैं। यहाँ कुल 104 बच्चों को पढ़ाने के लिए दो शिक्षिकाएँ और एक शिक्षक हैं। शिक्षिका साधना चव्हाण बताती हैं, "मेरा बेटा भी यहीं से पढ़कर निकला है। वह अब आठवीं कक्षा में पढ़ता है। ऐसा इसलिए कि हमें खुद अपने पढ़ाने के कौशल पर विश्वास है।" दूसरी तरफ, इस तरह की पहल से सरकारी स्कूल पर लोगों का विश्वास और ज्यादा बढ़ जाता है।

संक्षेप में कहें तो शिक्षा के निजीकरण के इस दौर में जहाँ गाँव-गाँव तक व्यवसायिक स्कूली संस्‍थाएँ खुल गई हैं, वहीं यमाजी पटलीची वाड़ी की पाठशाला उम्मीद के टापू की तरह दिखती है। इस पाठशाला ने अपनी स्थापना के 58 वर्ष पूरे कर लिए हैं। मतलब इस पाठशाला की तीसरी पीढ़ी तैयार हो रही है। इस पीढ़ी की विशेष बात है कि यह सीखने-सीखने की प्रक्रिया को रटने की बजाय गतिविधियों के माध्यम से सीख रही है। यही विशेषता उन्हें पिछली पीढ़ियों से अलग पहचान दिला रही है।

लेकिन इससे भी ज्यादा खुशी की बात यह है कि यहाँ यह इस तरह की विशेषता वाली इकलौती पाठशाला नहीं है। इसके अलावा इस इलाके के कई गाँवों की कई पाठशालाएँ शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षण की विशेष पद्धति के कारण अपनी पहचान बना रही हैं।

(ऐसे पॉंच अन्‍य स्‍कूलों की कहानी आगे की कडि़यों में प्रस्‍तुत की जाएगी।)


शिरीष खरे, पुणे

 

टिप्पणियाँ

pushpa shukla का छायाचित्र

bahut hi sarahiny pryas kiya hai gaon walon ne . sath hi utne badhai ke patr hai vahan ke shikshk jinhone athak mehant se vahan ki school ki shiksha gunvatta ko barkarar rkha hai . palkon ka vishawas jieta hai . aj ke samy me jarurt hai ki hm aise kamon ko kar dikhaye jo privet schools ke liye chunoutee bn jaye

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