किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सरकारी स्कूलों पर लौटता भरोसा : पाँच

यह शिक्षा के निजीकरण का दौर है। यह देश के अभावग्रस्त परिवारों के बच्चों से उनके डॉक्टर, इंजीनियर बनने के सपनों के छिन जाने का दौर है। यह महँगी फीस, महँगे स्कूल और उम्दा पढ़ाई के नाम पर अमीर तथा गरीब बच्चों के बीच शिक्षा की खाई को और भी ज्यादा चौड़ा कर देने का दौर है। यह अमीरों के बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों का दौर है। इसलिए, यह गरीब बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों को उनके हाल पर छोड़ देने का दौर है। इस दौर में हम देख रहे हैं कि सरकारी स्कूलों की हालत किस तरह बद से बदतर बना दी जा रही है। लेकिन, जरा ठहरिए! यह दूर—दराज के ग्रामीण इलाकों में ऐसे शिक्षक और समुदायों के साझा संघर्षों का भी दौर है जो सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता की नींव बन रहे हैं। महाराष्ट्र के सांगली जिले के गाँवों से ऐसे ही स्कूलों की कहानियाँ, जिनमें बदलाव की आहट साफ सुनाई दे रही हैं। फिलहाल ऐसे छह स्‍कूलों की कहानियों को दर्ज  किया गया है। यहाँ प्रस्‍तुत है पाँचवी कहानी।       

मादलमुठी शाला 

"देश भर के गाँवों में ऐसा स्कूल मिलना मुश्किल है।"- यह दावा है मादलमुठी शाला के मुख्य अध्यापक बालासाहेब नाथाजी आडके का। उन्हें अपनी बात पर भरोसा तब हुआ था जब दो वर्ष पहले शोधकार्य से जुड़ी दिल्ली की एक टीम उनकी शाला का निरीक्षण करने आई थी। उस टीम ने देश भर के विभिन्न राज्यों के गाँवों के स्कूलों का दौरा किया था। और उसके सदस्यों ने बताया था कि देश के बाकी ग्रामीण स्कूलों से मादळमुठी गाँव का स्कूल अनोखा है। आखिर क्या खास है यहाँ?

असल में महाराष्ट्र के जिला सांगली से 60 किलोमीटर दूर का यह सरकारी स्कूल एक दर्शनीय स्थल भी है। पहली नजर में यहाँ का विशाल परिसर और बड़ा बागीचा आकर्षित तो करता है, लेकिन अलग-अलग समूह के लोग यहाँ कुछ और ही देखने के लिए आते हैं। मादळमुठी के इस स्कूल को वर्ष 2017 में अन्‍तर्राष्ट्रीय मानक संगठन द्वारा ISO स्कूल घोषित किया गया है।

इस स्कूल के विशाल परिसर का अन्‍दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहली से सातवीं कक्षा के कुल 168 बच्चों के शिक्षण के लिए यहाँ सात अलग-अलग बड़े कमरे हैं। इसके अलावा तीन महिला और तीन पुरुष टीचर के लिए दो कमरे अलग हैं। पाँच विशेष कक्ष अलग-अलग विषयों से सम्‍बन्धित संग्रहालयों के लिए आरक्षित हैं। फिर वाचनालय अलग से है। खेल का मैदान और बगीचा तो है ही। दूसरे छोर पर लड़के-लड़कियों के लिए रिफ्रेश-रूम भी हैं।

लेकिन आकर्षण के केन्‍द्र हैं पाँच अलग-अलग कक्षों में संचालित संग्रहालय। यूँ तो यहाँ की सभी सात कक्षाओं के डिजिटल क्लास-रूम हैं, इसके बावजूद अलग से कंप्यूटर-रूम बना हुआ है। यह इस शाला का डिजिटल संग्रहालय है। इसमें बच्चे कंप्यूटर की विशेष कक्षा का अभ्यास करने के अलावा कंप्यूटर और इंटरनेट की दुनिया का विकास-क्रम जानते हैं।

इस शाला की स्थापना का वर्ष 1938 है, लिहाजा पिछले अस्सी वर्षों के स्थानीय अतीत का लेखा-जोखा यहाँ के इतिहास के संग्रहालय में दर्ज है। इसके साथ ही महाराष्ट्र और देश के इतिहास को फोटो-कैप्शन के जरिए संजोया गया है।

यहाँ के बच्चे कई बार गणित विषय में प्रदेश में टॉप आए हैं। यहाँ एक गणित कक्ष भी है, जिसकी दीवारों पर गणित के गूढ़ सवालों को सुलझाने के उपाय हैं। साथ ही कक्ष के बीचोंबीच एक कंप्यूटर भी रखा गया है। इसमें हर कक्षा स्तर के गणित के सूत्र आसानी से सुलझाने के सुझाव दिए गए हैं।

अगला कक्ष विज्ञान के संग्रहालय के लिए हैं। इसमें एक बड़ा फिल्म प्रोजेक्टर लगा हुआ है, जिसमें साइंस से सम्‍बन्धित सामग्री है। साथ ही दुनिया भर के बड़े वैज्ञानिकों के पोस्टर और उनकी खोजों के बारे में जानकारियाँ हैं। साथ ही वैज्ञानिक उपकरण और प्रयोगशाला के लिए अलग सेक्शन भी है। यहाँ से एक रास्ता बगीचे से होकर बाहर के लिए जाता है। रास्ते में कई स्थानीय जीव-जन्‍तुओं के मॉडल हैं।

यहीं अस्सी साल पुराना एक वाचनालय है, जिसमें एक हजार से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं। स्कूल की दीवारों पर यहीं के शिक्षकों ने भित्ति-चित्र बनाए हैं।

स्कूल की भौतिक व्यवस्था से अलग यहाँ के बच्चे कई बार परीक्षा-परिणाम, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों में प्रदेश स्तर पर प्रथम स्थान हासिल कर चुके हैं। वहीं, सामाजिक योजना के तहत 'पानी बचाओ' जैसे अभियानों में तालाब सफाई से जुड़े कार्यों में श्रमदान करते हैं।

(ऐसे एक अन्‍य स्‍कूलों की कहानी आगे की कड़ी में प्रस्‍तुत की जाएगी। इस शृंखला की पिछली चार कहानियाँ यहाँ पढ़ी जा सकती हैं रामनला बस्‍ती शाला  यमगार बस्‍ती शाला  तुलाराम बुआचा शाला  यमाजी पाटलीची वाड़ी शाला 
 


शिरीष खरे, पुणे

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