किसी 'खास' की जानकारी भेजें। समय के साथ निखरता श्रीपुरा का स्‍कूल

चित्तौड़गढ़ जिले के दक्षिण में स्थित निम्बाहेड़ा विकासखण्‍ड में पहाड़ियों से घिरा एक छोटा सा गाँव है श्रीपुरा। यहाँ पर सन 1979 में एक प्राथमिक विद्यालय की स्थापना की गई थी जिसे सन 2002 में उच्च प्राथमिक विद्यालय में बदल दिया गया। इसमें ग्रामीणों का बड़ा सहयोग था क्योंकि उच्च प्राथमिक विद्यालय के लिए जमीन गाँव वालों ने ही दान में दी। सर्व शिक्षा अभियान की तरफ से स्कूल के निर्माण के लिए पैसे मिले। उस समय श्री शान्तिलाल धाकड़ जी प्रधानाध्यापक थे। उनकी अगुवाई में शिक्षकों, गाँव वालों, सरपंच, विधायक एवं शिक्षा के उच्चाधिकारियों की मदद से इस स्कूल की कायापलट होने लगी। अभी श्री चंद्रशेखर व्यास जी प्रधानाध्यापक हैं और यह स्कूल आसपास के कई स्कूलों से काफी अलग और प्रगतिशील है। यहाँ आसपास के चार गाँव से बच्चे पढ़ने आते हैं। गाँव के लोग ज्यादातर खेती का कार्य करते हैं और कम पढ़े लिखे हैं लेकिन उनसे बात करने पर पता चला कि ये लोग अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति जागरूक हैं। स्कूल को लोग अपना समझते हैं। छुट्टी के दिन भी बच्चे विद्यालय में खेलते हुए मिल जाते है।

वर्तमान में विद्यालय में करीब 108 बच्चे हैं जिसके लिए 6 शिक्षक और 1 प्रधानाध्यापक है। विद्यालय में कमरों की कोई कमी नहीं हैं, दस कमरे हैं लेकिन शिक्षकों की कमी को देखते हुए पहली और दूसरी कक्षा को साथ पढ़ाते हैं। पाँचवीं  से आगे की पढ़ाई के लिए बच्चे कनेरा गाँव जाते हैं। यहाँ के ज्यादातर शिक्षक भी कनेरा गाँव के ही हैं। विद्यालय के खूबसूरत रंग-रोगन और वृक्षारोपण में यहाँ के जिला शिक्षाधिकारी श्री सुभाष शर्मा जी का काफी योगदान रहा है।

विद्यालय की कुछ विशेषताएँ इस तरह हैं :

चारदीवारी पर पढाई : विद्यालय के चारों ओर ऊँची चारदीवारी है और सामने प्रवेश द्वार। चारदीवारी के अन्‍दर की तरफ अँग्रेजी के अक्षर A से Z तक (बड़े और छोटे दोनों) लिखे हुए हैं। साथ में उससे बनने वाला एक शब्द और चित्र भी है। अँग्रेजी के शिक्षक ने बताया कि इससे वे बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाते हैं। बच्चे इधर- उधर दौड़ भागकर अक्षर और शब्द पहचानते हैं। इससे विद्यालय में पढ़ने-लिखने का माहौल भी बनता है।  

खम्‍भों पर बने चित्र से पढाई : विद्यालय के सारे खम्‍भों पर खूबसूरत चित्र बनाए गए हैं। सभी खम्‍बों के एक ओर हिन्‍दी व्याकरण, दूसरी ओर अँग्रेजी के शब्द, तीसरी ओर गणित के सूत्र तो चौथी ओर विज्ञान है। एक स्थान पर खड़े होकर देखने से सारे खम्‍भों पर एक ही विषय की बातें दिखती हैं। पढ़ने-पढ़ाने का यह तरीका नया और रुचिकर है।

साफ स्वच्छ शौचालय : लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग साफ स्वच्छ शौचालय है। शौचालय और पीने के लिए पानी के लिए टंकी की व्यवस्था है।पीने के पानी के नल के पास हाथ धोने के नियम चित्र के साथ बनाए हुए हैं। लड़कियों के मासिक धर्म के दौरान समस्या न हो इसके लिए पैड्स की व्यवस्था है जिसे लड़कियाँ स्वयं लेकर प्रयोग कर सकती हैं।

विद्यार्थी दल : विद्यार्थियों के छोटे-छोटे दल बने हुए हैं जैसे प्रार्थना के लिए, सफाई के लिए, पेड़-पौधों में पानी डालने के लिए, शांति व्यवस्था के लिए। इसमें बच्चे बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं जिससे कार्य आसानी से सुचारुपुर्वक चलता रहता है।

कक्षा-कक्ष : प्रत्येक कक्षा-कक्ष के बाहर कक्षा का नाम और एक और नाम जैसे सुभाष कक्ष, मीरा कक्ष इत्यादि लिखा हुआ है। कक्षा में बैठने के लिए फर्नीचर या दरी पट्टी की व्यवस्था है। इसके अलावा प्रत्येक कक्षा-कक्ष में घड़ी, डस्टर रखने का स्टैंड, बच्चों के लिखने या चिपकाने के लिए बोर्ड और कचरा पात्र है। कक्षा-कक्ष की दीवारें रंग-बिरंगे पोस्टर्स से सुसज्जित हैं। ऐसी कक्षा में किसका मन पढ़ने का नहीं करेगा। 

पुस्तकालय : यहाँ का पुस्तकालय पूर्णतः कार्य करता है। बच्चे आकर किताबें, पत्रिका और समाचारपत्र पढ़ते हैं। वो किताबों पढ़ने के लिए घर भी ले जाते हैं। विज्ञान की प्रयोगशाला भी है। जिसमें सूक्ष्‍मदर्शी की व्‍यवस्‍था है।

शिक्षक समूह : आसपास के गाँव के स्कूल के शिक्षक महीने में एक बार बैठक करते हैं जिससे वे अपने कार्य के बारे में एक-दूसरे को बताते हैं और आगे की योजना भी बनाते हैं।

गाँव वालों का कहना है की यहाँ के शिक्षक बहुत ही अच्छे हैं और विद्यालय हमेशा साफ सुथरा रहता है। लोग स्कूल को अपना समझते हैं। छुट्टी के दिन भी बच्चे स्कूल में आकर झूला झूलते हैं, खेलते हैं। पूछने पर बच्चे कहते हैं कि उन्हें घर से अच्छा स्कूल ही लगता है।


विनय कुमार,स्रोत व्‍यक्ति, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, जिला संस्‍थान चित्‍तौड़गढ़, राजस्‍थान

 

 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

;यह प्रेरणादायी है। जब भी किसी शिक्षक ⁄शक्षिका में विद्‍यालय के प्रति एक खास प्रकार का समर्पण होगा तो ऐसे सुखद परिणाम प्राप्त होते हैं।

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