किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सत्‍यों स्‍कूल : मुश्किल राह-आसान सफर

सत्‍यों स्‍कूल की गतिविधियों  के बारे में  स्‍कूल की अध्‍यापिकाओं से टीचर्स ऑफ इण्डिया की अोर से जूनी के.विल्‍फ्रेड और रेखा ने बातचीत की थी। साथ का वीडियो उसी बातचीत का सम्‍पादित अंश है।  प्रस्‍तुत आलेख नीता पन्‍त से रणदीप कौर की बातचीत पर आधारित है। यह बातचीत इस वीडियो को बनाने के कुछ महीने पहले की गई थी। इसे हमने अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देहरादून द्वारा प्रकाशित ‘उम्‍मीद जगाते शिक्षक’ से  लिया है।)

अल्मोड़ा से लमगड़ा जाते समय लगभग एक घण्‍टे की यात्रा के बाद सत्यों स्कूल है। अभी-अभी बारिश बन्‍द हुई है और उसका असर वादियों में साफ दिखाई दे रहा है। पेड़ों पर नहाई-नहाई सी हरी-हरी चमकीली पत्तियाँ और खिलखिलाते लहलहाते जंगली लाल फूल, हवा में ताजगी है और पहाड़ नए-नए से दिख रहे हैं। सत्यों स्कूल लमगड़ा ब्लॉक से कुछ किलोमीटर पहले ही है और हम वहीं रुक गए हैं। हमें इस स्कूल तक पहुँचने के लिए बहुत कीचड़ और फिसलन भरे रास्ते पर चलना पड़ा एक बहुत संकरी सी पगडण्‍डी से चलकर हम सत्यों स्कूल पहुँचे।

इस स्कूल में पहुँचने पर यहाँ का भौगोलिक सौन्दर्य अलग ही नजारा देता है, जहाँ से पूरा गाँव नजर आता है। इस स्कूल का रंग भी बहुत आकर्षक है, सूरजमुखी वाला पीला। जब रजनीश और मैं स्कूल के भीतर गए तो बच्चे स्कूल के बरामदे में बैठकर कुछ लिख रहे थे। उनकी एकाग्रता ने हमें आश्चर्य में डाल दिया। बच्चे अपने काम में व्यस्त थे और शिक्षक भोजन माता के साथ मध्यान्ह भोजन की तैयारी के बारे में बात कर रहे थे। साथ-साथ बच्चे क्या काम कर रहे हैं इसे भी देख रहे थे।

इस स्कूल तक पहुँचने की राह आसान नहीं है। इसके बावजूद शिक्षक अल्मोड़ा से रोज यहाँ पढ़ाने आते हैं। मेरे ख्याल में शहर के केन्‍द्र में बैठा कोई व्यक्ति इस परिदृश्य की कल्पना भी नहीं कर सकता है, जब तक वह यहाँ ना आए और पहाड़ों के बीच गूँजती इन बच्चों की खिलखिलाहटों को ना सुने।

जैसे ही हम कक्षा में गए बच्चों ने खड़े होकर मुस्कुराकर हमारा अभिवादन किया। सुश्री नीता पंत इस कक्षा को पढ़ा रही थीं। उन्हें 2010 में बतौर प्रधानाध्यापिका यहाँ नियुक्त किया गया है। जब वह सत्यों स्कूल आई थी यहाँ 112 बच्चे थे, पर कुछ परिवारों के पलायन करने से इस वर्ष छात्र संख्या लगभग 80 है। वह बताती हैं कि आज के दौर में अधिकांश परिवारों में दो ही बच्चे हैं इसलिए धीरे-धीरे नामांकन कम हो रहा है। साथ ही उन्होंने हमसे आग्रह किया कि हम उनकी कक्षा में बैठें और उनकी कक्षा को देखें। उन्होंने बच्चों से अभिनय के साथ कविता सुनाने के लिए कहा। कुछ बच्चों ने अकेले और कुछ ने समूह में कविता सुनाई और उस पर अभिनय किया। कुछ बच्चे इतने उत्साहित हो गए कि उन्होंने ‘बूगी-वूगी’ पर डांस किया।

नीता पन्‍त एक समर्पित शिक्षिका हैं, उन्होंने बच्चों के सम्‍पूर्ण विकास के लिए बहुत से प्रयास किए ताकि बच्चे पढ़ाई में रुचि ले सकें, इसका अन्‍दाजा आप कक्षा की दीवार पर लगे बच्चों द्वारा बनाए गए पोस्टरों को देखकर लगा सकते हैं। इन्हें बच्चों ने ही बनाया है और इसका प्रयोग शिक्षण के लिए किया जाता है।

केवल पाठ्य पुस्तकों से पढ़ाने पर उनका विश्वास नहीं है। जैसे एक चार्ट पर सूखे पत्तों से एक पेड़ बनाया गया था। पत्ते उसके आसपास गिरे थे और उसका नाम हिन्दी और अँग्रेजी दोनों में लिखा गया था। इस कक्षा में बहुत सी कहानियों की किताबें थीं जिसमें बहुत से आकर्षक चित्र और शब्द थे। जब हमने बच्चों से पूछा कि क्या उन्हें कहानियाँ पढ़ना अच्छा लगता है? तो उन्होंने हमें बताया ‘हाँ हमें कहानियाँ पढ़ना अच्छा लगता है। हम घेरा बनाकर बैठ जाते हैं और एक-एक करके कहानी को जोर-जोर से पढ़ते हैं।’

हमने देखा कि बच्चों ने जो कुछ भी बनाया है उसे उन्होंने अपना नाम लिखकर या तो कक्षा में या प्रधानाध्यापिका के कार्यालय के सामने लगे नोटिस बोर्ड पर टांगा हुआ है। नीता जी ने हमें वह फाइल भी दिखाई जिसमें उन्होंने कुछ अच्छे लेख और बच्चों के द्वारा बनाए गए चित्र सम्‍भाल कर रखे हुए हैं।

नीता पन्‍त ने स्थानीय युवाओं को, जो इन्‍टर की परीक्षाएँ पास कर चुके हैं, स्कूल की गतिविधियों में सहयोग करने के लिए प्रेरित किया है। इससे स्कूल को बहुत फायदा मिला है क्योंकि एक ही गाँव का होने के कारण बच्चे स्कूल के बाद भी बड़े बच्चों से सहयोग लेते हैं। इनमें से अधिकांश पहली पीढ़ी के बच्चे हैं और उन्हें घर में पढ़ाई से सम्‍बन्धित कोई सहायता नहीं मिल पाती है। इन बच्चों का स्कूल में नामांकन भी शिक्षा के अधिकार कानून के लागू होने के बाद ही हुआ है।

स्थानीय युवाओं के स्कूल में शामिल होने से स्कूल की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है। स्कूल प्रबंधन समिति में प्रस्ताव पारित करने के बाद स्कूल विकास योजना में स्थानीय युवाओं की स्कूल में भागीदारी निश्चित किए जाने की योजना है। स्कूल के प्रबन्‍धन और शिक्षण में भागीदारी करने वाले इन युवाओं को शुरू में नीता पन्‍त स्वयं अपने पास से कुछ पारिश्रमिक देती थीं। लेकिन बाद में अभिभावकों ने जब यह देखा कि उनके बच्चों की पढ़ाई बेहतर हो रही है तो उन्होंने मिलकर पैसा जमा किया और युवाओं को देना शुरू किया। जब हम सत्यों में थे यह पारिश्रमिक महेन्द्र को दिया जा रहा था, जो उस वक्त स्कूल से जुड़ा था।

बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए स्कूल की वार्षिक पत्रिका ‘मधुरस’ में बच्चों की कविताएँ, कहानियाँ और चित्र प्रकाशित की जाती हैं। उन्होंने बताया कि इस पत्रिका के जरिये बच्चों में पढ़ने-लिखने और चित्र बनाने के प्रति रुचि बढ़ी है। ‘मधुरस’ में हिन्दी और अँग्रेजी दोनों तरह की सामग्री होती है। नीता पन्‍त को ‘मधुरस’ के लिए आर्थिक व्यवस्था करनी पड़ती है जो कि ब्लॉक छपाई के जरिये ब्लैक एण्‍ड व्हाईट में प्रकाशित होती है।

उन्होंने सतत् और समग्र मूल्यांकन की गाइड लाइन्स के तहत सभी बच्चों का रिकॉर्ड एक रजिस्टर में दर्ज किया है। चौथी और पाँचवी कक्षा के बच्चों से बात करते हुए हमने महसूस किया कि वे हिन्दी व अँग्रेजी दोनों भाषाओं में बात कर सकते हैं। उन्होंने  अपना परिचय हिन्दी में दिया। वे अपने दोस्तों और परिजनों से स्थानीय भाषा में बात कर रहे थे। कुछ बच्चे तो खुद ही खड़े हुए और उन्होंने अपना और कुछ फल-सब्जियों के नाम अँग्रेजी में बताए। बच्चों को उन फलों और सब्जियों की स्पेलिंग भी ठीक से याद थी। सभी बच्चे आत्मविश्वास से भरे हुए थे   जिसे उनकी बातचीत से महसूस किया जा सकता था। 2010 में नीता पन्‍त के इस स्कूल में आने के बाद से बच्चों की समझ और पढ़ाई के स्तर में सुधार आया है। यह बात इस गाँव के लोग और अभिभावक भी स्वीकार करते हैं। उन्होंने हमें बताया कि सभी बच्चे इसी स्कूल में आते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि गाँव में पानी की काफी समस्या है इसलिए लोग पहाड़ से नीचे उतरकर कपिलेश्वर नदी से पानी लेकर आते हैं। यही वजह है कि बच्चों को पीने का पानी लेकर स्कूल आना पड़ता है।

भोजन माता रोज सुबह कपिलेश्वर नदी से मध्यान्ह भोजन के लिए पहाड़ के नीचे से पानी भर कर लाती हैं। जब हम नीता पन्‍त से बातचीत कर ही रहे थे तब तक मध्यान्ह भोजन का समय हो चुका था। बच्चे एक लाइन में खड़े हो चुके थे और पूरे वातावरण में स्वादिष्ट भोजन की खुशबू फैली थी। बच्चों के हाथों में प्लेट थी और उन्हें भोजन का इन्‍तजार था, लेकिन पूरे सब्र के साथ। भोजन माता जिन्होंने पूरे प्यार से खाना बनाया था बच्चों की प्लेट में दाल-चावल परोसने लगीं। बच्चे खुले आकाश के नीचे बिना किसी भय व संकोच के भोजन का आनन्‍द ले रहे थे।

उनकी मासूमियत और आँखों की चमक के आगे उनके जीवन के तमाम अभाव दूर कहीं छूट गए थे। उनको देखकर अन्‍दाजा नहीं लगाया जा सकता था कि वो किसी दुर्गम क्षेत्र में रहते हैं और जीवन की मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित है। उन्हें जिन्‍दगी की इन तमाम चुनौतियों से आत्मविश्वास के साथ जूझते हुए देखकर मैं उम्मीद से भर उठती हूँ।

जब हम स्कूल में थे बच्चों की हँसी और खुशी के गवाह थे। हम वहाँ से आना नहीं चाहते थे पर अब स्कूल के बन्‍द होने का समय आ चुका था, बच्चे घर वापस जा रहे थे हमें भी उन्हें विदा कहना पड़ा। लेकिन हम वहां से गर्मागर्म मिड-डे-मील का स्वाद लेकर ही लौटे।


 

( नीता पन्‍त से रणदीप कौर की बातचीत पर आधारित। अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देहरादून द्वारा प्रकाशित ‘उम्‍मीद जगाते शिक्षक’ से साभार।)

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

जब मन में कुछ हटकर करने का जज्‍बा हो तो मुश्किल राहें आसान हो जाती हैं । पथ के शूल भी फूल बनकर अभिनन्‍दन करते हैं ।  मैं तो यही कह सकता हूँ                                     कोई चलता पथ चिन्‍हों पर , कोई पथ चिन्‍ह बनाता है ।                                   है वही शूरमा इस जग में , दुनिया में पूजा जाता है ।। बहुत बहुत बधाई

nrawal का छायाचित्र

अध्यापन के प्रति प्रेम व समर्पण का भाव होता है तो उसका फल अवश्य ही मिलता है .....सुश्री नीता अवं अन्य सभी अध्यापिकाएं और स्टाफ के सभी सदस्य   बधाई के पात्र  हैं .

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