किसी 'खास' की जानकारी भेजें। श्रीमती रूबीना अख्‍तर : प्रेमपूर्ण एवं समयबद्ध शिक्षण

टोंक जिले में पर्वतीय तलहटी में बसे कस्बे टोडारायसिंह का कस्तूरबा गाँधी बालिका आवासीय विद्यालय पहले खण्डेलवाल धर्मशाला में किराए के भवन में संचालित था। अब इसका अपना भवन है। विद्यालय में कक्षा 6,7,व 8 ही हैं। अधिकतर बालिकाएँ ड्रोप आउट हैं।

मैंने विद्यालय को ऐसा पाया  

यहाँ आने से पहले बालिकाओं के जीवन का उद्वेश्य जैसे केवल गाय,भैंसें चराने तक ही सीमित था। हालांकि वे कृषि एवं घर के कार्यों में निपुण थीं। लेकिन उनका शैक्षिक ज्ञान शून्‍य ही था। इन छात्राओं को छात्रावास में देखने पर ऐसा प्रतीत होता था मानो इन्हें किसी पिंजरे में जबरदस्ती बन्द कर दिया गया है। वे आपस में हिलमिल नहीं पाती थीं। एक जगह की लड़कियाँ ही एक साथ रहती थीं। पूरा दिन होता था। खाली समय बहुत रहता था। पहली बार घर से अलग रहना हुआ था। पढ़ाई के अलावा अन्य गतिविधियाँ भी बहुत कम हुआ करती थीं। अतः उन्हें अपने घर की बहुत याद आती थी। उठना, सोना, खाना, पढ़ना सभी का समय होता था। अतः उन्हें यह कैद के समान लगता था।

परिवर्तन की बयार

2009 में मैं प्रतिनियुक्ति पर कस्तूरबा गाँधी बालिका आवासीय विद्यालय में आई। बालिकाएँ अभिवादन करना नहीं जानती थीं। मैंने ही उन्हें आगे होकर Good Morning कहा। उनमें से कुछ ही बच्चियाँ जवाब दे सकीं।

कक्षा 6 में जाने पर पता चला कि छात्राओं को अँग्रेजी विषय में ABCD का अक्षर ज्ञान भी ठीक तरह से नहीं है। इसके कुछ संकेत मेरे सामने उभर कर आए। क्योंकि मैंने कक्षा में बोर्ड पर X लिखकर एक बालिका से पूछा यह क्या है तो बालिका का उत्तर था क्या पता। यही प्रश्न जब एक अन्य बालिका से पूछा तो उसने कहा गुणा। केवल 28 लड़कियों में से केवल एक लड़की ही बता पाई कि यह X है।

ऐसी स्थिति में कक्षा 6 की अँग्रेजी के कोर्स की किताब पढ़ाना बहुत मुश्किल था। परन्तु इन बालिकाओं में पढ़ने की ललक जरूर दिखाई दे रही थी। वे ग्रामीण भाषा का प्रयोग करती थीं। हिन्दी की बोलचाल की भाषा भी कम ही आती थी।

पढ़ने का नाम लेने पर कुछ बालिकाओं के हावभाव बदल गए। मैंने आगे की पंक्ति में बैठी बालिका को प्यार से अपने पास बुलाया उससे प्यार से उसका नाम पूछा। बालिका ने उत्तर दिया फूला। मैंने कहा इसीलिए आप फूल जैसी हैं। अगला प्रश्न पूछा कि आपको इस विद्यालय में सबसे अच्छा कौन लगता है। ममता दीदी। इसी प्रकार अन्य लड़कियों से भी दो चार प्रश्न पूछे। ताकि उनमें आत्मविश्वास व स्वतंत्रता की भावना का विकास हो सके। उनके पूर्व ज्ञान को उभारकर करके उनके ज्ञान की प्रशंसा की। उनमें विश्वास जगाया कि आप बुद्धिमान हैं और सब कुछ सीख सकती हैं।

उनके शैक्षिक स्तर को जाँचने के लिए 10-10 बालिकाओं के समूह बनाकर उनमें सामूहिक चर्चा करवाई। वहाँ मैंने स्वयं को इस तरह उपस्थिति रखा कि मानो मेरा ध्यान उनमें नहीं है। ताकि वे स्वतंत्रता पूर्वक अपने विचारों को अभिव्यक्त कर सकें। वे आपस में चर्चा कर रहीं थीं। उनकी इस चर्चा से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची कि इनके शिक्षण की शुरुआत अक्षर ज्ञान से करना चाहिए।

मैंने अपने लिए लक्ष्य तय किए

  • बालिकाओं को स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए अधिक अवसर उपलब्ध करवाना ।
  • खेल खेल के माध्यम से शिक्षा देना।
  • प्रेम व सम्मानजनक शब्दों का अधिक प्रयोग।
  • कोर्स की किताब के बजाय बालिकाओं के शैक्षिक स्तर के अनुरूप शिक्षा उपलब्ध कराना।
  • अधिगम को सरल व रोचक बनाने हेतु TLM का अधिक उपयोग ।
  • Spare the rod and spare the child (छड़ी छोड़ी बच्चा बिगड़ा) के सिद्धान्‍त को शिक्षण से पूर्णतया निष्कासित करना।
  • स्वयं को निरन्तर पुस्तकों के अध्ययन में व्यस्त रखना।

योजना बनाई और उसे साकार किया

बालिकाओं को अँग्रेजी विषय वस्तु पढ़ाने हेतु मैंने एक विस्तृत योजना तैयार की। उसके अनुरूप ही शिक्षण करवाया। प्यार व सम्मान इन शब्दों के साथ मैंने अपना शिक्षण प्रारम्भ किया। सीखने व सिखाने के तरीके में सर्वप्रथम कविता गायन, खेल, व टी.एल.एम. व अन्य पुस्तकों का भी प्रयोग किया ताकि शिक्षण के प्रति नीरसता समाप्त हो। इसके लिए स्वयं माडल तैयार किए। BRC कार्यालय से कुछ पुस्तकें निकलवाकर उनका अध्ययन करके गतिविधि आधारित रोचक विधिओं का अधिक प्रयोग किया। योजना के लिए तीन-तीन माह के चार चरण निर्धारित किए।

प्रथम चरण: अक्षर ज्ञान

  • अक्षर ज्ञान हेतु सर्वप्रथम कविता गायन। प्रार्थना स्थल पर कुछ दिन टेप द्वारा English Rhyme सुनवाईं।
  • मैंने थर्मोकोल की शीट्स पर अँग्रेजी वर्णमाला के कार्ड बनाए। बालिकाओं का गोला बनवाकर कार्ड बीच में रख दिए। प्रत्येक बालिका को एक कार्ड उठाने के लिए कहा। फिर जिसके हाथ में जिस अक्षर का कार्ड था उसे देखकर मैंने कहा अच्छा आप c हैं शाबाश। अच्छा आप L हैं, बहुत अच्छा। अच्छा आप Q हैं। मेरे बोलने से कुछ बालिकाओं को अपना अक्षर याद हो गया।
  • सभी बालिकाओं को अपने-अपने कार्ड देकर ABCD के क्रम में लाइन बनवाई। जिससे उन्हें बिना लिखे ही कार्ड देखकर अक्षर ज्ञान हो गया। कुछ दिनों तक प्रार्थना स्थल पर भी इसी क्रम में खड़ा किया। प्रत्येक कार्ड का आकर्षक चित्र स्वयं तैयार करके बालिकाओं से तैयार करवाया। छात्राओं की सहभागिता पर बल दिया।

द्वितीय चरण: शब्द ज्ञान

  • फलों के माडल मय नाम के देना। उस पर लिखी हुई Spelling सिखाना याद करवाना। जैसे बैंगन का माडल।
  • अक्षर जोड़कर शब्द बनवाना: स्पेलिंग माडल यानी कपड़े पर रंगकर बनाया गया कोई चित्र तथा उसकी स्पेलिंग। इसमें लड़कियों से कपड़े पर फूलों के चित्र फलों, सब्जियों के चित्र, जानवरों के चित्र बनवाती थी। उसमें रंग भरवाती थी। उस पर उसकी स्पेलिंग लिखवाती थी। इससे यह होता था कि बच्चियों के द्वारा यह मन लगाकर बनाया जाता था। धीरे-धीरे उस पर स्पेलिंग लिखी जाती थी। इससे उन बच्चियों को उसकी आकृति और स्पेलिंग अच्छे से याद हो जाती थी।
  • स्वयं को प्रत्यक्ष दिखाकर शरीर के अंगों के नाम बताना
  • सब्जियों के नाम याद करवाना।
  • पक्षियों के नाम याद करवाना।

तृतीय चरण: this  व that का प्रयोग 

  • कक्षा में रखी हुई वस्तुओं को बताकर this का प्रयोग। जैसे This is a chair,  This is a black board
  • कक्षा के बाहर रखी हुई वस्तुओं को that का प्रयोग बताकर। जैसे That is a chalk, That is a telephone

चतुर्थ चरण:

  • जब बालिकाएँ छोटे शब्दों को पढ़कर समझने लगीं तो उन्हें वाक्यों में प्रयोग करना सिखाया।
  • शब्द कार्डों के माध्यम से वाक्य बनवाए।
  • दैनिक उपयोग के शब्दों का वाक्यों में प्रयोग एवं व्याकरण का प्रयोग करना सिखाया।
  • इसी तरह पढ़ना सिखाया। प्रत्येक दिन एक पैराग्राफ पढ़ाया उसके दस मीनिंग याद करवाए।

प्रयास के फलस्वरूप परिर्वतन

  • बालिकाएँ अब छोटे-छोटे वाक्य पढ़ लेती हैं। आपस में अँग्रेजी मीनिंग की अन्ताक्षरी करती हैं।
  • दैनिक जीवन अँग्रेजी शब्दों का प्रयोग करने लगी हैं। बालिकाएँ ग्रामीण भाषा से हिन्दी व हिन्दी से अँग्रेजी बोलने लगी हैं।
  • सम्मानसूचक शब्दों का प्रयोग करने से बालिकाएँ भी आपस में अच्छे शब्दों का प्रयोग करती हैं।
  • अब अन्य अध्यापिकाएँ भी बालिकाओं से प्रेमपूर्ण व्यवहार करने लगी हैं।
  • मेरी शिक्षण प्रक्रिया से प्रभावित होकर अभिभावकों में विद्यालय के प्रति विश्वास जागा है, नामांकन 28 से बढ़कर 58 हो गया है।

अन्य शिक्षिकाओं पर प्रभाव

जब मैं यहाँ आई तो देखा लड़कियों का स्तर बहुत कमजोर है। उनको बताने पर भी उनकी समझ में नहीं आ रहा है। इसके लिए स्टाफ साथियों के साथ एक मीटिंग की। उसमें चर्चा हुई- बच्चियाँ क्यों नहीं सीख पा रही हैं? जवाब में उन्होंने कहा कि हम तो पढ़ाते हैं, इन्हें नहीं आता यह इनकी कमजोरी है। मैंने जब शिक्षण के तरीकों में बदलाव का सुझाव रखा तो सभी ने कहा कि इससे कुछ भी होने वाला नहीं है। मैंने यह भी कहा कि हमें प्रारम्भ में कुछ अतिरिक्त समय भी देना होगा। सभी ने आधे मन से माना। मेरे प्रयासों से लड़कियों को अँग्रेजी में कुछ-कुछ आने लगा। उनकी झिझक दूर हुई। गतिविधियों में मजा आने लगा। लेकिन अन्य शिक्षिकाओं को इसमें सफलताएँ नहीं मिली। किन्तु धीरे-धीरे मीटिंग में लगातार बातों के बाद वहाँ भी ऐसे ही परिवर्तन हुए तब जाकर यह सब (गतिविधि आधारित शिक्षण) सभी शिक्षिकाओं द्वारा किया जाने लगा। सीखने-सिखाने के तरीकों को सफल करने के लिए स्टाफ की सभी अध्यापिकाएँ प्रत्येक सप्ताह में मीटिंग का आयोजन करके आपस में चर्चा करती हैं। प्रतिदिन लंच टाइम में भी हम आपस में चर्चा करते हैं।

प्रतियोगिता बनाम प्रोत्साहन

जब धीरे-धीरे बच्चियाँ कुछ सीखने लगीं तो उनमें ललक जगाने, बेहतर करने के लिए, उसे और आकर्षक बनाने के लिए कुछ गतिविधियाँ करवाई गईं। इन्हें प्रतियोगिता का नाम दिया गया। इसके चयन आधार यही था कि जो उन्हें आ गया है या बताया जा चुका है वही कार्य उनसे अलग तरीके से करवाना है। जैसे एक-एक पैरा या पेज यह कहकर लिखवाया कि जिसकी राईटिंग सबसे अच्छी होगी उसे पुरस्कार दिया जाएगा। या जो सबसे पहले लिखकर देगा तथा राईटिंग तथा अच्छी होगी। ऐसे ही सबसे अधिक कविताएँ कौन लिखेगा, सबसे कम समय में सबसे अधिक मीनिंग (ए पर बी पर, सी पर..) जो लिखेगा। आपस में अँग्रेजी शब्दों की अन्ताक्षरी करवाकर। भाग लेने वाली प्रत्येक बालिका को पुरस्कार दिया गया। प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त करने वालों को आकर्षक पुरस्कार एवं अन्य का पेन या कापी जैसे पुरस्कार ताकि किसी भी बालिका में हीन-भावना का विकास ना हो। पुरस्कार का इन्तजाम मैं स्वयं के पैसे से करती थी।

सब सम्भव है समझाइश और प्रेम से

पहले मैं इस विद्यालय में अध्यापिका पद पर कार्यरत थी परन्तु वर्तमान में संस्था प्रधान हूँ। एक दिन छात्रावास का निरीक्षण करने पर मैंने पाया कि छात्राएँ आपस में चोरी  करती हैं। मकर संक्रान्ति की छुट्टी पर 18 बालिकाएँ आँवले के तेल की शीशी घर ले गईं और वहीं रखकर आ गईं। फिर यहाँ अन्य बालिकाओं के तेल की चोरी कर रही हैं। मैंने प्रत्येक बालिका को अलग बुलाया, प्यार से समझाया। कुछ बालिकाएँ रोटी भी छिपाकर रख लेतीं थीं। उन्हें भी समझाया कि छिपाकर रखने की जरूरत नहीं है,जितनी खानी हो उतनी खाओ। जब भूख लगे तब खाओ।  मैं चाहती थी कि मेरे विद्यालय की बालिकाएँ स्वतंत्र वातावरण में प्रसन्न रहकर शिक्षा ग्रहण करें।      

मेरे प्रयासों से आज विद्यालय का वातावरण सौहार्दपूर्ण है। प्रत्येक कर्मचारी विश्वासपूर्ण व्यवहार व कर्तव्य निष्ठता से कार्य करता है। बालिकाओं में शिक्षा के प्रति इतनी रुचि जाग्रत हो गई है कि यदि उनके माता-पिता कोई लेने आता है तो हमसे पहले वे ही उन्हें मना कर देती हैं कि हम गाँव नहीं जाएँगे हमें बहुत सारी पढ़ाई करनी है। सभी बालिकाएँ आपस में प्रेम व सहयोग से रहती हैं। कोई बालिका बीमार हो जाती है तो दूसरी बालिकाएँ उसकी यूनिफार्म तक धोती हैं।

मुझे भी आज इस विद्यालय के संचालन एवं शिक्षण कार्य करने में संतुष्टि प्राप्त होती है। जो विद्यालय एक समय में पिंजरा बना हुआ था वही विद्यालय आज प्रेम नगरी बना हुआ है। मेरा विश्‍वास है कि शिक्षण कार्य सदैव बालिकाओं के स्तर के अनुरूप स्वतंत्र वातावरण में प्रेमपूर्ण एवं समयबद्ध होना चाहिए।

श्रीमति रूबीना अख्तर

  • संस्‍था प्रधान एवं शिक्षिका , कस्‍तूरबा गाँधी बालिका आवासीय विद्यालय, टोडा रायसिंह, जिला टोंक, राजस्‍थान
  • जन्मभूमि एवं कर्मभूमि दोनों ही टोंक जिला है।
  • 2000 से अँग्रेजी शिक्षिका हैं।
  • नौ बहनें हैं जिनमें से आठ बहनें राजकीय विद्यालयों में अध्यापिकाएँ हैं।
  • स्वादिष्ट खाना बनाने एवं अच्छी पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक है।

    वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। श्रीमति रूबीना अख्तर वर्ष 2009-10 में सीखने-सिखाने के बेहतर शैक्षणिक प्रयासों के लिए चुनी गई हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने श्रीमति रूबीना अख्तर से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इस बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम श्रीमति रूबीना अख्तर, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


     

 

 

 

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Congratulations Rubina Ji

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