किसी 'खास' की जानकारी भेजें। शोभा बिष्‍ट की शोभा न्‍यारी

बच्चों में घुलमिल जाती है उनकी मीठी हँसी...

गौलीमहर विद्यालय अल्मोड़ा जिले में लमगड़ा ब्लॉक मुख्यालय से करीब दो किलोमीटर दूर है। विद्यालय सड़क से ज्यादा दूर नहीं है। विद्यालय पहुँचने पर अध्यापिका शोभा बिष्ट मुस्कुराते हुए आगंतुकों का स्वागत करती हैं। यहाँ पर समुदाय और खुद के प्रयासों से शोभा जी ने बच्चों के अधिगम स्तर को संवारने-निखारने का अच्छा प्रयास किया है। शोभा जी विद्यालय की प्रधानाध्यापिका हैं। विद्यालय में उनके साथ एक शिक्षिका (कमला जीना) और भी हैं। 

शोभा जी इस विद्यालय में 2005 से कार्यरत हैं। उस वक्‍त यह विद्यालय नया-नया ही खुला था। उन दिनों विद्यालय पंचायत घर के एक कमरे में ही चलता था। शुरुआत में यहाँ 25 बच्चे थे। गाँव के कुछ बच्चे पास के ही निजी विद्यालयों में जाते थे। उसके बाद विद्यालय का अपना भवन निर्मित हुआ। वर्तमान में विद्यालय में 4 कक्षा-कक्ष एवं एक कार्यालय है।

शोभा जी विद्यालय में विद्यार्थी संख्या बढ़ाने और बच्चों के अधिगम स्तर को बढ़ाने के लिए हमेशा से ही प्रयासरत रही हैं। शोभा जी ने बताया कि शुरू में विद्यार्थी संख्या बढ़ाने के लिए उन्होंने समुदाय के बीच कम्‍बल और बच्चों को जूते वितरित करवाए। वे एक आध्यात्मिक संस्था से भी जुड़ी हैं। यह कार्य इसी संस्था के माध्यम से किया। समुदाय के बीच कोई भी कार्यक्रम हो उन्हें बुलाया जाता है। उनके लिए विद्यालय में ही उनके हिस्से का पैण (कुमाऊँनी शब्द जो किसी त्योहार या समारोह की वस्तुओं के आदान-प्रदान में प्रयुक्त होता है) दे जाते हैं।  

उनके विद्यालय में बच्चों के पास आईकार्ड हैं और वे टाई पहनते हैं। इसके बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि आस-पास कई निजी स्कूल हैं। वहाँ बच्चे ये सब पहनते हैं। विद्यालय बच्चों तथा उनके अभिभावकों को सरकारी स्कूल कमतर न लगे इसीलिए उन्होंने यह किया। विद्यार्थी संख्या बढ़ाने और बच्चों के आत्मविश्वास बढ़ाने का यह एक अच्छा साधन है। स्वच्छ गणवेश में ये बच्चे किसी का भी मन मोह सकते हैं। कक्षा एक और दो को छोड़कर शेष सभी बच्चों के लिए फर्नीचर की व्यवस्था है। बच्चों की कॉपी, किताबें स्वच्छ और जिल्द चढ़ी हुई हैं।

शिक्षाविदों का मानना है कि जिस विद्यालय में अध्यापक का दृष्टिकोण बच्चों के प्रति सकारात्मक और व्यवहार मित्रवत होता है वहाँ बच्चे भी स्वयं प्रसन्न मुद्रा में सीखने-सिखाने कि प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं, बच्चे जल्दी सीखते हैं। इस बात को शोभा जी ठीक से जानती हैं। बच्चे उनसे अत्यन्‍त घुले-मिले हैं। स्कूल भ्रमण के दौरान जब मैं कक्षा प्रक्रियाओं में उनके साथ शामिल हुआ तो पाया कि मुझसे घुलने-मिलने के बाद बच्चे शोर करने लगे तो शोभा जी ने हँसते हुए बच्चों की ओर देखा और कहा ‘कौन-कौन शोर कर रहा है’ हालाँकि वो डाँट नहीं रही थीं फिर भी बच्चे शान्‍त हो गए और हँसते हुए ध्यानपूर्वक उनकी बात सुनने लगे। यही बात उनके पढ़ाने के दौरान भी दिखती है।

अपने विद्यालय में शोभा जी नियम से स्कूल मैनेजमेंट कमेटी  की मीटिंग आयोजित करवाती हैं। समुदाय के लोगों के साथ मिलकर विद्यालय की समस्याओं पर चर्चा होती है और हल निकलते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि गाँव में शादी वगैरह होती है तो बच्चे स्कूल नहीं आते हैं। इसके लिए भी शोभा जी ने गाँव में सभी अभिभावकों से बात करके नियम बनाया कि समारोह वाले दिन भी बच्चे दो-ढाई बजे तक स्कूल में ही रहेंगे फिर समारोह में शामिल होंगे। कई बार माता-पिता ये कहते हैं हम तो खुद ही पढ़े नहीं हैं। बच्चों को कैसे पढ़ाएँ? इस पर शोभा जी कहती हैं शाम को रोटी बनाते वक्‍त प्रत्येक माँ अपने बच्चे को सामने बिठाए और कहे कि जो आज स्कूल में सीखा उसे बताओ। तो यह तरीका भी उसे पढ़ने के लिए प्रेरित करने में कारगर हो सकता है।

शोभा जी के विद्यालय में टीएलएम सामग्री हमेशा बच्चों के बीच ही रहती है। उनके कार्यालय में बच्चे किसी भी समय आ-जा सकते हैं। उनके विद्यालय में रंग, पेंसिल और अन्य स्टेशनरी हमेशा उपलब्ध रहती है। बच्चे चित्रकारी भी करते हैं और कागज से वस्तुएँ भी बनाते हैं। वे इस बात को भी जानती हैं कि हर बच्चा महत्वपूर्ण है और हर बच्चा सीख सकता है। पढ़ाते समय भी वे हर बच्चे से बात करती हैं और प्रश्न पूछती हैं। प्रश्न पूछते समय बच्चे का उत्साहवर्धन करती हैं जो कि बच्चे के लिए हितकर है। बच्चों से बात करने पर बच्चे एकदम जवाब देते हैं। 

यहाँ बच्चे चहके-महके से हैं। खेल स्कूल का अभिन्न हिस्सा है। सुबह की सभा में भी सभी बच्चे बारी-बारी से प्रतिभाग करते हैं। स्कूल के काम भी बच्चों के बीच बाँट रखे हैं जिससे बच्चा विद्यालय को अपना समझता है और उससे जुड़ा रहता है। शोभा जी विशेष रूप से ध्यान रखती हैं कि कौन बच्चा ज्यादा प्रतिभाग कर रहा है और कौन कम।   

उम्मीद की किरण कहीं से भी आए वो प्रकाश सब जगह करती है। उम्मीदों की किरणें प्रसारित करते ऐसे शिक्षक ही हमारे सरकारी शिक्षा तंत्र में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। ये परिवर्तन एकाएक नहीं आ सकते इसके लिए इस तरह के छोटे-छोटे प्रयास करने होंगे। हर ओर से ऐसे प्रयासों के किरण पुंज निश्चय ही प्रकाश फैलाएँगे।

(शोभा बिष्ट से पूरन जोशी की बातचीत पर आधारित)


अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देहरादून,उत्‍तराखण्‍ड द्वारा प्रकाशित ‘ उम्‍मीद जगाते शिक्षक : 2’ से साभार।

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